मुस्लिम गुटों से कत्ल की धमकियों का रुश्दी पर कोई असर नहीं

मशहूर लेखक सलमान रुश्दी को मारने के लिए ईरान की सरकार ने 33 लाख डॉलर के इनाम की घोषणा की है. सालों से मौत के साये में जी रहे रुश्दी लेकिन इसे भी हंसी मजाक में ले रहे हैं.

सैटेनिक वर्सस नाम की किताब रुश्दी के लिए अजाब बनी हुई है. लेकिन मुस्लिम गुटों से कत्ल की धमकियों का रुश्दी पर कोई असर नहीं पड़ा है. असर अगर हो भी रहा हो तो वह दिखाते नहीं. उन्हें 1989 में वेलेन्टाइन्स डे की याद दिलाएं, तो भी नहीं. इसी दिन उन्हें पता चला कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह खोमैनी ने उनकी किताब को इस्लामविरोधी बताकर उन के खिलाफ फतवा जारी किया है.

आज भी रुश्दी की जान को खतरा है. हाल ही में ईरान ने उनको कत्ल करने वाले को 33 लाख डॉलर इनाम देने की बात कही है. लेकिन वो कहते हैं कि शायद उनके कातिल को यह पैसे मिलें ही न, क्योंकि ईरान सरकार के पास शायद उतना पैसा नहीं है.

आदर्श? बिलकुल नहीं

भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक रुश्दी इस हफ्ते बर्लिन पहुंचे जहां उन्होंने अपनी आत्मकथा जोसेफ एंटोन पेश की. रुश्दी की इस किताब का नाम उन्होंने अपने पसंदीदा लेखकों जोसेफ कॉनराड और एंटोन चेखोव से ली है. जब वे फतवों से बचने के लिए छिप रहे थे तो उन्होंने यही नाम अपनाया था. अपनी आत्मकथा को उन्होंने एक दूसरे शख्स की कहानी के तौर पर लिखा है. शुरुआत में तो पाठकों को शायद समझ न आए लेकिन इसमें एक कलाकार का हुनर भी दिखता है और रुश्दी अपनी जिंदगी को कुछ हटकर देख पाते हैं.”यह एक आत्मकथा है, तो आपको सच कहना होगा.” रुश्दी कहते हैं कि यह एक ऐसी घटना है जिसमें एक असली व्यक्ति था. रुश्दी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर्श भी माना जाता है लेकिन वे खुद इस वर्णन से पीछे हटते हैं, “मैं अपने को स्टैचू ऑफ लिबर्टी नहीं मानता. मैं बस एक व्यक्ति हूं.” खतरे में रहने के बावजूद वे बिना किसी सुरक्षा के बर्लिन पहुंचे हैं. उनका कहना है कि पिछले दस सालों में उन्हें कोई खतरा नहीं महसूस हुआ है.

खतरे के खिलाड़ी

सबसे बड़ा खतरा शायद टल चुका है लेकिन रुश्दी अब भी हीरो हैं. एक लेखक के तौर पर वे फतवे के साये में अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को बखूबी बयान करते हैं. और यही नहीं, उनकी किताब में उनका खोया प्यार, उनके संघर्ष और शराब के नशे में धुत उनके पिता के साथ उनके संबंधों के बारे में भी पता चलता है.रुश्दी की बातचीत से शांति झलकती है और बदले की भावना की तो कोई बात ही नहीं, “मैं इस चक्कर में नहीं पड़ा.” अगर रुश्दी बदले के बारे में सोचते तो भी इसकी वजह को समझा जा सकता था. जापानी भाषा में सेटैनिक वर्सस के अनुवादक को मार दिया गया. इटली का अनुवादक घायल हुआ और नॉर्वे के प्रकाशक को गोली मारी गई थी. 13 साल तक रुश्दी की आजादी पर पाबंदी रही और उन्हें पुलिस सुरक्षा में रहना पड़ा. विल्सन और वॉटसन जैसे नामों को अपनाना पड़ा. उस वक्त भी उन्होंने अपने बच्चों से करीबी संबंध रखने की कोशिश की. अपने परिवार के बारे में बात करते हुए रुश्दी कुछ थमते हैं और उनकी आवाज भावुक हो जाती है.

लेकिन अपने ऊपर अत्याचार के राजनीतिक पहलुओं पर बात करते करते फिर उनकी आवाज में वही तिरस्कार और व्यंग्य वापस आ जाते हैं. कहते हैं कि फतवे के बाद उनकी जिंदगी राजनीति में क्रैश कोर्स जैसी थी, “मुझे याद है जब मैं (उस वक्त के जर्मन विदेश मंत्री) क्लाउस किंकेल से मिला और उन्होंने कहा कि एक आदमी के लिए हम अपनी विदेश नीति नहीं बदल सकते. उस वक्त जर्मनी ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था.”

और डेनमार्क के लिए भी फेटा चीज का निर्यात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से बड़ा था. लेकिन अखबारों में रुश्दी ने हमेशा उनके साथ एकजुटता दिखाने वाले लोगों के बयान भी पढ़े. रुश्दी कहते हैं कि उनकी किताब दोस्ती और एकजुटता की कहानी भी है.

स्वतंत्र समाज

जोसेफ एंटोन रुश्दी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक दलील है. कहते हैं, “अगर आपको किसी चीज से आपत्ति है, तो यह आपकी परेशानी है. एक किताब से अपने को अपमानित महसूस करना मुश्किल है, आपको इसके लिए बहुत मेहनत करनी होगी. जब आप किताब बंद करते हैं, तो किताब आपको अपमानित करने की शक्ति खो देती है.”

और जहां तक दूसरे बयानों पर प्रतिबंध के समर्थन की बात है, मिसाल के तौर पर मुस्लिमों के खिलाफ बनी फिल्म पर, तो रुश्दी कहते हैं कि दुनिया जटिल है और एक आजाद समाज का मतलब है कि लोग जो चाहेंगे, वही लिखेंगे और बोलेंगे और वह सारे काम करेंगे जिसे कई और लोग नाराज होंगे, “और कोई रास्ता नहीं है.”

आज भी रुश्दी की जान को खतरा है. हाल ही में ईरान ने उनको कत्ल करने वाले को 33 लाख डॉलर इनाम देने की बात कही है. लेकिन वो कहते हैं कि शायद उनके कातिल को यह पैसे मिलें ही न, क्योंकि ईरान सरकार के पास शायद उतना पैसा नहीं है.

आदर्श? बिलकुल नहीं

भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक रुश्दी इस हफ्ते बर्लिन पहुंचे जहां उन्होंने अपनी आत्मकथा जोसेफ एंटोन पेश की. रुश्दी की इस किताब का नाम उन्होंने अपने पसंदीदा लेखकों जोसेफ कॉनराड और एंटोन चेखोव से ली है. जब वे फतवों से बचने के लिए छिप रहे थे तो उन्होंने यही नाम अपनाया था. अपनी आत्मकथा को उन्होंने एक दूसरे शख्स की कहानी के तौर पर लिखा है. शुरुआत में तो पाठकों को शायद समझ न आए लेकिन इसमें एक कलाकार का हुनर भी दिखता है और रुश्दी अपनी जिंदगी को कुछ हटकर देख पाते हैं.”यह एक आत्मकथा है, तो आपको सच कहना होगा.” रुश्दी कहते हैं कि यह एक ऐसी घटना है जिसमें एक असली व्यक्ति था. रुश्दी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर्श भी माना जाता है लेकिन वे खुद इस वर्णन से पीछे हटते हैं, “मैं अपने को स्टैचू ऑफ लिबर्टी नहीं मानता. मैं बस एक व्यक्ति हूं.” खतरे में रहने के बावजूद वे बिना किसी सुरक्षा के बर्लिन पहुंचे हैं. उनका कहना है कि पिछले दस सालों में उन्हें कोई खतरा नहीं महसूस हुआ है.

खतरे के खिलाड़ी

सबसे बड़ा खतरा शायद टल चुका है लेकिन रुश्दी अब भी हीरो हैं. एक लेखक के तौर पर वे फतवे के साये में अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को बखूबी बयान करते हैं. और यही नहीं, उनकी किताब में उनका खोया प्यार, उनके संघर्ष और शराब के नशे में धुत उनके पिता के साथ उनके संबंधों के बारे में भी पता चलता है.रुश्दी की बातचीत से शांति झलकती है और बदले की भावना की तो कोई बात ही नहीं, “मैं इस चक्कर में नहीं पड़ा.” अगर रुश्दी बदले के बारे में सोचते तो भी इसकी वजह को समझा जा सकता था. जापानी भाषा में सेटैनिक वर्सस के अनुवादक को मार दिया गया. इटली का अनुवादक घायल हुआ और नॉर्वे के प्रकाशक को गोली मारी गई थी. 13 साल तक रुश्दी की आजादी पर पाबंदी रही और उन्हें पुलिस सुरक्षा में रहना पड़ा. विल्सन और वॉटसन जैसे नामों को अपनाना पड़ा. उस वक्त भी उन्होंने अपने बच्चों से करीबी संबंध रखने की कोशिश की. अपने परिवार के बारे में बात करते हुए रुश्दी कुछ थमते हैं और उनकी आवाज भावुक हो जाती है.

लेकिन अपने ऊपर अत्याचार के राजनीतिक पहलुओं पर बात करते करते फिर उनकी आवाज में वही तिरस्कार और व्यंग्य वापस आ जाते हैं. कहते हैं कि फतवे के बाद उनकी जिंदगी राजनीति में क्रैश कोर्स जैसी थी, “मुझे याद है जब मैं (उस वक्त के जर्मन विदेश मंत्री) क्लाउस किंकेल से मिला और उन्होंने कहा कि एक आदमी के लिए हम अपनी विदेश नीति नहीं बदल सकते. उस वक्त जर्मनी ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था.”

और डेनमार्क के लिए भी फेटा चीज का निर्यात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से बड़ा था. लेकिन अखबारों में रुश्दी ने हमेशा उनके साथ एकजुटता दिखाने वाले लोगों के बयान भी पढ़े. रुश्दी कहते हैं कि उनकी किताब दोस्ती और एकजुटता की कहानी भी है.

स्वतंत्र समाज

जोसेफ एंटोन रुश्दी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक दलील है. कहते हैं, “अगर आपको किसी चीज से आपत्ति है, तो यह आपकी परेशानी है. एक किताब से अपने को अपमानित महसूस करना मुश्किल है, आपको इसके लिए बहुत मेहनत करनी होगी. जब आप किताब बंद करते हैं, तो किताब आपको अपमानित करने की शक्ति खो देती है.”

और जहां तक दूसरे बयानों पर प्रतिबंध के समर्थन की बात है, मिसाल के तौर पर मुस्लिमों के खिलाफ बनी फिल्म पर, तो रुश्दी कहते हैं कि दुनिया जटिल है और एक आजाद समाज का मतलब है कि लोग जो चाहेंगे, वही लिखेंगे और बोलेंगे और वह सारे काम करेंगे जिसे कई और लोग नाराज होंगे, “और कोई रास्ता नहीं है.”

आज भी रुश्दी की जान को खतरा है. हाल ही में ईरान ने उनको कत्ल करने वाले को 33 लाख डॉलर इनाम देने की बात कही है. लेकिन वो कहते हैं कि शायद उनके कातिल को यह पैसे मिलें ही न, क्योंकि ईरान सरकार के पास शायद उतना पैसा नहीं है.

आदर्श? बिलकुल नहीं

भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक रुश्दी इस हफ्ते बर्लिन पहुंचे जहां उन्होंने अपनी आत्मकथा जोसेफ एंटोन पेश की. रुश्दी की इस किताब का नाम उन्होंने अपने पसंदीदा लेखकों जोसेफ कॉनराड और एंटोन चेखोव से ली है. जब वे फतवों से बचने के लिए छिप रहे थे तो उन्होंने यही नाम अपनाया था. अपनी आत्मकथा को उन्होंने एक दूसरे शख्स की कहानी के तौर पर लिखा है. शुरुआत में तो पाठकों को शायद समझ न आए लेकिन इसमें एक कलाकार का हुनर भी दिखता है और रुश्दी अपनी जिंदगी को कुछ हटकर देख पाते हैं.”यह एक आत्मकथा है, तो आपको सच कहना होगा.” रुश्दी कहते हैं कि यह एक ऐसी घटना है जिसमें एक असली व्यक्ति था. रुश्दी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर्श भी माना जाता है लेकिन वे खुद इस वर्णन से पीछे हटते हैं, “मैं अपने को स्टैचू ऑफ लिबर्टी नहीं मानता. मैं बस एक व्यक्ति हूं.” खतरे में रहने के बावजूद वे बिना किसी सुरक्षा के बर्लिन पहुंचे हैं. उनका कहना है कि पिछले दस सालों में उन्हें कोई खतरा नहीं महसूस हुआ है.

खतरे के खिलाड़ी

सबसे बड़ा खतरा शायद टल चुका है लेकिन रुश्दी अब भी हीरो हैं. एक लेखक के तौर पर वे फतवे के साये में अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को बखूबी बयान करते हैं. और यही नहीं, उनकी किताब में उनका खोया प्यार, उनके संघर्ष और शराब के नशे में धुत उनके पिता के साथ उनके संबंधों के बारे में भी पता चलता है.रुश्दी की बातचीत से शांति झलकती है और बदले की भावना की तो कोई बात ही नहीं, “मैं इस चक्कर में नहीं पड़ा.” अगर रुश्दी बदले के बारे में सोचते तो भी इसकी वजह को समझा जा सकता था. जापानी भाषा में सेटैनिक वर्सस के अनुवादक को मार दिया गया. इटली का अनुवादक घायल हुआ और नॉर्वे के प्रकाशक को गोली मारी गई थी. 13 साल तक रुश्दी की आजादी पर पाबंदी रही और उन्हें पुलिस सुरक्षा में रहना पड़ा. विल्सन और वॉटसन जैसे नामों को अपनाना पड़ा. उस वक्त भी उन्होंने अपने बच्चों से करीबी संबंध रखने की कोशिश की. अपने परिवार के बारे में बात करते हुए रुश्दी कुछ थमते हैं और उनकी आवाज भावुक हो जाती है.

लेकिन अपने ऊपर अत्याचार के राजनीतिक पहलुओं पर बात करते करते फिर उनकी आवाज में वही तिरस्कार और व्यंग्य वापस आ जाते हैं. कहते हैं कि फतवे के बाद उनकी जिंदगी राजनीति में क्रैश कोर्स जैसी थी, “मुझे याद है जब मैं (उस वक्त के जर्मन विदेश मंत्री) क्लाउस किंकेल से मिला और उन्होंने कहा कि एक आदमी के लिए हम अपनी विदेश नीति नहीं बदल सकते. उस वक्त जर्मनी ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था.”

और डेनमार्क के लिए भी फेटा चीज का निर्यात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से बड़ा था. लेकिन अखबारों में रुश्दी ने हमेशा उनके साथ एकजुटता दिखाने वाले लोगों के बयान भी पढ़े. रुश्दी कहते हैं कि उनकी किताब दोस्ती और एकजुटता की कहानी भी है.

स्वतंत्र समाज

जोसेफ एंटोन रुश्दी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक दलील है. कहते हैं, “अगर आपको किसी चीज से आपत्ति है, तो यह आपकी परेशानी है. एक किताब से अपने को अपमानित महसूस करना मुश्किल है, आपको इसके लिए बहुत मेहनत करनी होगी. जब आप किताब बंद करते हैं, तो किताब आपको अपमानित करने की शक्ति खो देती है.”

और जहां तक दूसरे बयानों पर प्रतिबंध के समर्थन की बात है, मिसाल के तौर पर मुस्लिमों के खिलाफ बनी फिल्म पर, तो रुश्दी कहते हैं कि दुनिया जटिल है और एक आजाद समाज का मतलब है कि लोग जो चाहेंगे, वही लिखेंगे और बोलेंगे और वह सारे काम करेंगे जिसे कई और लोग नाराज होंगे, “और कोई रास्ता नहीं है.”networkdesk

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