मुस्लिम महिलाएँ क्यों पिछड़ी हुई है ? क्या हो सकता है इसका समाधान ?

मुस्लिम महिलाओं ने पढ़ना–लिखना प्रारम्भ कर दिया है । यद्यपि शिक्षा की गति बहुत धीमी है, तथापि महिलाओं ने शिक्षा के महत्व को अनुभव कर लिया है । कुछ महिलाएं राजनीतिज्ञ भी हैं । परन्तु अभी ऐसी महिलाओं की संख्या उत्साहवर्धक नहीं है ।

परिवर्तन प्रकृति और जीवन का शाश्वत नियम है । मुस्लिम महिलाओं को भी अपने परिवेशगत परिवर्तनों के अनुसार ढलना होता है । परिवर्तन तेज हो या धीमी, अच्छा हो या बुरा, पूरा हो या अधूरा । पर परिवर्तन परिवर्तन है । संस्कृति भी अपरिवर्तनीय नहीं है क्योंकि संस्कृति स्वयं गतिशील है, इसलिए स्त्री या पुरुष किसी का जीवन भी गतिहीन नहीं हो सकता । आज इस्लाम संस्कृति एक संक्रांति के दौर से गुजर रही है और यह परिवर्तन संस्करण एवं स्वांगीकरण के रूप में दिखाई दे रहा है ।
यह संरचनात्मक परिवर्तन सामाजिक अन्तरक्रियाओं का परिणाम है, जिसमें दबाव भी अनुभव किए जाते हैं, लाभ भी उठाये जाते हैं और उत्तरदायित्व भी पहचाने जाते हैं । मुस्लिम महिलाएं बाह्य लागों के सम्पर्क में आ रही हैं । वे उनके साथ सरकारी, गैरसरकारी, संवैधानिक निकाय, राजनीतिक आदि क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं । इस अन्तरक्रिया से अन्तरपरिवर्तन होते हैं । अतः मुस्लिम महिलाओं में पारिवारिक, कौमी तथा सामाजिक संस्थागत, संचरनागत परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं ।
मुस्लिम महिलाओं ने पढ़ना–लिखना प्रारम्भ कर दिया है । यद्यपि शिक्षा की गति बहुत धीमी है, तथापि महिलाओं ने शिक्षा के महत्व को अनुभव कर लिया है । कुछ महिलाएं राजनीतिज्ञ भी हैं । परन्तु अभी ऐसी महिलाओं की संख्या उत्साहवर्धक नहीं है ।
आज जबकि मुस्लिम महिलाएं संपूर्ण कौमी जिन्दगी के हर क्षेत्र में अपने लिए जगह पैदा कर रही है, बहुत से दिमागों में यह सवाल पैदा हो रहा है कि मुस्लिम महिला संपूर्ण रूप से क्यों पिछड़ी हुई हैं ? क्या इस पिछड़ेपन का कारण उनका धर्म या उनका विशिष्ट सामाजिक ढांचा या कोई और बात ? इन्हीं कतिपय प्रश्नों पर हम यहां चर्चा कर रहे हैं ।
प्रस्तुतिः विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’

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