मुस्लिम महिला लोकतांत्रिक अधिकार चाहती है – चुन्नी खातुन ‘सोनिया’

वर्तमान परिवेश में मधेशी, दलित, जनजाति तथा हिमाल, पहाड़ की जनजाति एवं दलित महिलाएं सदियों से उत्पीडि़त, उपेक्षित एवं शोषित हैं । उनकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक अवस्था दयनीय है ।

Sonia Khatun

चुन्नी खातुन ‘सोनिया’, अध्यक्ष, एआईएम

इन महिलाओं में मुझे कहना होगा कि मुसलिम महिला की अवस्था अत्यंत दयनीय व हर क्षेत्रों पिछड़ी हुई हैं । यहां तक की अपने परिवार से भी वे शोषित एवं पीडि़त हैं । क्योंकि वे स्वतंत्र रूप से राजनीति में भाग नहीं ले सकती हैं । रोजगार भी नहीं कर सकती हैं । यहाँ तक कि उनकी लड़कियां पढ़ाई भी नहीं कर सकती हैं । हम देखते हैं कि मुसलिम समाज धर्म पर आधारित समाज है । वैसे कुरान में महिला को पवित्र स्थान दिया है । कुरान ने महिला को अपनी मर्यादा में रहकर हर काम करने के लिए कहा है यदि महिला योग्य हो तो । कुरान में कही गयी बात को अनुशरन इसलिए करनी पड़ती है कि कुरान को हम लोग ‘कोड ऑफ लाइफ’ मानते हैं । लेकिन अभी परिवार या समाज पितृसतात्मक होने की वजह से स्वतंत्र रूप से कोई कार्य नहीं सकती है । इसके लिए वे अपने परिवार से ही सामाजिक न्याय के लिए लड़ रही हैं ।
अब सवाल है कि क्या हो इसका समाधान तो मुझे लगता है कि उन्हें खुद को आत्मविश्वास को जगाना होगा क्योंकि हमारे परिवार समुदाय व समाज की अगुआई करने की धारणा रखते हें । उनकी धारणा से अपनी धारणा को मिलना ही पड़ेगा । एक कहावत है कि जहां समस्या है, वहां समाधान भी है । स्वाभिमानी ढंग से बसर करने के लिए खुद का आत्मविश्वास बढ़ाना होगा । खुद में हौसला को बुलंद करना होगा । अगर परिवार हमारा बाधक है, तो समाधान भी परिवार ही है । इसी प्रकार समुदाय बाधक है, तो समाधान भी समुदाय ही है ।
जहां तक परदे की बात है, तो मुझ लगता है कि परदा सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के लिए ही नहीं । परदा हर समुदाय की महिला को चाहिए । परदा एक मर्यादा है और उस मर्यादा को अंदर रहना चाहिए । कुरान की दृष्टि से देखा जाए तो यह वैज्ञानिक और सामाजिक भी है । परदा कोई कार्य करने से नहीं रोका है । तर्क किया जाता है कि कुरान की व्याख्या संकुचित है । मुझे लगता है कि कुरान की व्याखया सही ढंग से की जाए तो समाज इससे बहुत फायदा ले सकता है । अगर महिला धार्मिक शिक्षा लेती है, तो खुद–ब–खुद एकेडमी शिक्षा के लिए भी दम रखती है । इसके साथ–साथ इन्हें उच्च शिक्षा भी हासिल करनी होगी । लेकिन गरीबी की वहज से वह उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाती है और परिवार व समाज भी उच्च शिक्षा के लिए बाधक बन जाते हैं ।
आज हम इक्कीसवीं सदी में हैं । इक्कीसवीं सदी की महिला लोकतांत्रिक अधिकार चाहती, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकार चाहती है । इसके लिए यह जरूरी है मुस्लिम महिला के पिछड़ेपन को हटाने के लिए आर्थिक रूप में सशक्त किया, राजनैतिक रूप से आरक्षित किया जाए शैक्षणिक छात्रवृत्ति की व्यवस्था की जाए । तभी इनकी स्थिति में सुधार हो सकेगी । दूसरी तरफ समाज में मौजूदा कुरीतियों के विरुद्ध उन्हें स्वयं आगे बढ़ना होगा

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