मूल ध्येय से विमुख वर्तमान शिक्षा प्रणाली

डा. पुष्पज राय ‘चमन’
शिक्षा ही जीवन है । इसी तरह जीवन भी शिक्षा हैं सुक्ष्म विन्दु से विराट सिन्धु की लम्बी यात्रा की दौरान चाहे अनचाहे सामना करना पडेÞ हरेक परिस्थिति हमारी पाठशाला है और उससे उत्पन परिणाम शिक्षा । हमारे भीतर मुल रूप से मौजुद गुण और सम्भावनाओं का आविष्करण, परिष्करण और प्रकटीकरण ही वस्तुतः शिक्षा है । बाह्य जगत में जो गोचर हमें दृष्टिगत होता है या जो अगोचर वा अज्ञेय है वह सम्पूर्ण ज्ञान बीज रूप में हमारे भीतर मौजुद होता है । उपयुक्त वातारण निर्मित होते ही सम्भावित गुण अभिव्यक्त हो आता है ।
हरेक पत्थर या चट्टान के भीतर मूर्ति छिपी हुई रहती है, आवश्यता होती है सिर्फ इच्छित मूर्ति को अविष्कृत करने की । जो भीतर मौजुद न हो उसकी अभिव्यक्ति की सम्भावना कदापि नहीं की जी सकती है । संसार मे उपलब्ध ज्ञान विज्ञान की सम्पूर्ण विद्या वस्तुतः विराट को सूक्ष्म रूप मे छिपाये उसी बीज की अल्प अभिव्यक्ति है । हरेक युग में कुछ महापुरुष होते हैं जिसका तादात्मय उस मूल बीज से हो जाता है । मूल बीज से साक्षात्कार होते ही जानना कुछ शेष नहीं रह जाता है और उसकी यात्रा पूर्ण हो जाती है ।
भीतर छिपे मूर्ति को अविष्कृत करने की प्रक्रिया ही शिक्षा है । जो भीतर मौजुद गुणवत्ता की प्रकटीकरण की सम्भावना को अवरुद्ध कर दे वह शिक्षा कदापि नहीं हो सकता है । वर्तमान शिक्षा प्रणाली शिक्षा के मूल ध्येय से विमुख हो मनुष्य के भीतर मौजुद गुणवता की प्रगटीकरण की सम्भावना को न सिर्फ अवरुद्ध करता है वल्कि उस गुणवता को भी क्षयीकरण की ओर मुड़ने के लिए बाध्य करता है ।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली और उसे उपलब्ध अव तक के परिणाम पर विहंगम दृष्टि डाले तो स्पष्ट अनुभुत होता है । इसकी वजह से निसर्ग से प्राप्त प्रतिभा की असीम सम्भावनाओं को हम शनैः शनैः कुण्ठित होने के लिए विवश कर स्वर्णिम भविष्य को ठुकराने के कार्य के अतिरिक्त कुछ नही कर रहे हैं । यही वजह है जो कभी हम विश्व में जगत गुरु के रूप मे विश्व के सिरमौर थे तो अभी भिक्षुओं की पंक्ति मे बैठने लायक भी नही है । जिस मिट्टी की सुगन्ध से शान्ति, समृद्धि और परमानन्द का अमुल्य सन्देश प्रवाहित होता था आज उसी मिट्टी तले बारुद सुलग रही है, वसुधैव कुटुम्वकम का उद्घोष करने वाला हृदय आज विषाक्त हो सहोदर के प्रति वैमनश्यता से भर गया है, ज्ञान विज्ञान की पराकाष्ठा पर आसीन चेतना आज अधोमुखी हो भस्माशुर की चेतना से अनुप्राणित हो रहा है ।
परिणाम यदि अच्छे नही हो तो स्वतः सिद्ध होता है कार्य गलत था । वह कार्य अनायास हो या नियोजित बिना गलत हुए गलत परिणाम कदापि नहीं आ सकता है । इसी तरह वर्तमान शिक्षा प्रणाली के कारण हम समृद्ध होने की बजाय विरासत के प्राप्त सम्पदा यदि खोते जा रहे हैं तो हमें सोचने के लिएÞ विवश होना पडेगा अन्यथा परिणाम इससे भी बदतर होना सुनिश्चित है ।
आधुनिक शिक्षा पद्धति के प्रर्वतक लार्ड मेकालय का उद्देश्य भी इस शिक्षा पद्धति को लागु करने के पीछे विरासत में प्राप्त अमुल्य सम्पदा को धाराशाही कर कालान्तर में विलुप्त करना ही था सन् १८३५ फेब्रभरी २ में बेलायत के संसद में ीयचम ःबअबगबिथ का दिया हुआ मन्तव्य भाषण से उनका इरादा स्पष्ट होता हैं ।

ीयचम ःबअबगबिथ का उद्देश्य सफलीभूत होते हुए देखा जा रहा है । विरासत मे प्राप्त असीम संभावनाओं से युक्त मस्तिष्क की क्षमता क्षत—विक्षत हो विकृत और विषाक्त हुआ जा रहा है । तार्किक निर्णय शक्ति, ग्रहण शक्ति और सृजनात्मक शक्ति का उपयोग न होने के कारण साथ ही यान्त्रिक पुनरावृृति जबरन आरोपित करने के कारण मस्तिष्क का नैसर्गिक स्मरण शक्ति क्षीण होता जा रहा है । नैतिक और चारित्रिक रूप में जीवन को निष्प्राण कर मनुष्य को रोबोट बना देना ही इस शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य है और अव तक का उपलब्ध परिणाम के विकास क्रम भावी दिशा बोध भी करा रहा है ।
जीवन से पूर्णरूपेण विमुख जीविकामुखी वर्तमान शिक्षा प्रणाली से ऐसी योग्यता प्राप्त होती है कि आजीवन दिनरात रोजीरोटी की तलाश और इन्तजाम में ही जीवन गुजर जाती हैं फिर भी चैन से सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती । कुल मिलाकर इस शिक्षा मनुष्य को मालिक नहीं दास मात्र बना सकने में सक्षम है । स्वयं अर्थात जीवन से विमुख कर रोटी, कपड़ा और मकान की क्षुद्रतम आवश्यकताओं में जीवन में बलिदान कर देना शिक्षा का उद्देश्य और अब तक का परिणाम रहा है । जो काम संसार के सभी जीव येन केन प्रकारेण कर ही लेते हैं उन्हीं क्षुद्रतम आवश्यकताओं की अंधी दौड़ में हम निसर्ग से प्राप्त पुरुष से पुरुषोत्तम होने की विराट संभावना को अनाहक बली चढ़ा देते हैं ।
स्वयं की निजता से विमुख होने के कारण ही आज शिक्षा डिग्री तो प्रदान करता परन्तु उसमे संवेदना, संस्कार, विवेक और उध्र्वमुखी मौलिक जाग्रत चेतना का सर्वथा अभाव होता है । आलीशान महल, वाहन और फैशनेवुल पहिरन में सजे मनुष्य बोलने, एवम् नित्य क्रियाक्रम करने तक का साधारण मानवी संस्कार खोते जा रहा है । परहित के लिए स्वयं का हित ही नही स्वयं को आहुति देने की स्वतः स्र्फूत भाव, गुरु को गोविन्द से श्रेष्ठतर स्थान एवं सम्मान देने की वह विलक्षण आदर, स्वयं भगवान को घर पर दस्तक देते समय माता—पिता को सेवारत बालक द्वारा तत्क्षण भगवान से मिलने से इंकार करना जैसे उत्तम सेवा एवं अदम्य साहस एवं विमल अंतश्चेता, एक ही तीर से विशाल, वृक्ष के सम्पूर्ण पत्ते ही नहीं कृष्ण के पांव तले छिपाये गये पत्ते तक को बिंध देनेवाले बराबरी का अलौकिक शक्ति, सुर्य की गति तक को रोक सकने की सामथ्र्य ही नहीं इच्छा मृत्यु तक की क्षमता से विभुषित वह कालजयी पुरुष का असीम शक्ति हमारी ही मिट्टी की उपज है । आखिर वह जन्म के साथ नही आया अपितु वह वही पाठशाला, विद्यार्थी, गुरु, परिवार और समाज के सामुहिक परिश्रम की उपज है ।
आखिर कहाँ खो गयी वह अमूल्य धरोहर, आखिर क्यों इतिहास में प्रत्यक्ष घटित वह सत्य घटना हमें किसी कवि की कल्पना प्रतीत होती है । परम उँचाइयों के निकट एवं पराकाष्ठा पर अठखेलियाँ खेलती उध्र्वमुखी चेतना आखिर क्यों सुशुप्त एवं अधोमुखी हो गई । आखिर क्यों अपने पूर्वज प्रदत विरासत को हम संभाल सकने मे असक्षम हो गये । कारण साफ है, हमें उस सम्यक शिक्षा से वंचित होना पड़ा और इस के लिए राज्य जिम्मेवार है ही इस से कम समाज और परिवार का दोष नहीं आका जा सकता है । क्योकि शिक्षा का केन्द्र सिर्फ विद्यालय ही नही है अपितु कमोवेश विद्यालय से अत्यधिक समय जहां गुजारना पड़ता है अर्थात परिवार या समाज वह भी है ।
शिक्षा का सच्चा आधार है मानव मन का अध्ययन । वर्तमान शिक्षा पद्धति मानव मनोविज्ञान के अपूर्ण धरातलीय ज्ञान पर अवलंवित है । शिक्षा नीरस, तनाव, उत्पन्न करने वाला ही नही रटने के दोष से मुक्त होना चाहिए । सरस होना एकाग्रता की प्रमुख शर्त है । एकाग्रचित हुए बिना हम शिक्षा ग्रहण करने मे सक्षम कदापि नहीं हो सकते । कुछ सिखाया नहीं जा सकता, नही आरोपित किया जा सकता है, आभ्यन्तरिक ज्ञान को प्रकट करने का अभ्यास ही वस्तुतः सच्चे शिक्षण का सिद्धान्त होता है । हर एक विद्यार्थी को अपनी प्रकृति, निजता के अनुसार सुशुप्त प्रतिभा को विस्तार करना चाहिए । हरेक मानव निसर्ग से ही कोई न कोई विशिष्ट प्रतिभा लेकर पैदा होता है । शिक्षा का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए उसे खोजना, विकसित करना और किसी उदात्त उपयोग के लिए पूर्ण करना ।
शिक्षा किसी मशीन द्वारा निर्मित इमारत नहीं है अपितु यह मानव मन मे उपजे स्वतः स्फूर्त जिज्ञासा है, गहन भाव और अवाहन है । अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा और मिलेट्री जैसी अनुशासन के नाम पर वर्तमान शिक्षण पद्धति विद्यार्थियों के साथ अत्याचार बरपा रही है जिसका परिणाम है विकृत चिन्तन और संवेदना का सर्वथा क्षयीकरण । इसके बजाय आत्म अनुशासन को कैसे जाग्रत किया जाय इस पर दृष्टि केन्द्रित करनी होगी । हमें ऐसी शिक्षा पद्धति विकसित करनी होगी जिससे रेडिमेड डाक्टर, इन्जिीनीयर, वैज्ञानिक और साहित्यकार पैदा न हों अपितु वह जीवन्त, जाग्रत अन्वेषी हो और इसके लिए आवश्यक है हमारी शिक्षा की नींव अपनी ही सता, अपने मानस और आत्मा के अनुरूप हो ।

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