मेरा गाँव

माना ऊँची ऊँची गगन चुम्बी इमारते नहीं ।पर मेरे गाँव में रौनक आजभी हैं पिज़ा बर्गर की संस्कृति नहीं चौपालों की शान आज भी है । गाडी मोटर का शोर नहीं । पर बैलो के गले की घंटी का शोर आज भी है ।

इन शहरों की गलियां
और मेरे गाँव की बस्ती ।003

यहाँ संगमरमर की ज़मी
पर फिसलते से अरमान ।

गाँव में गोबर के फर्श पर
लीपकर बसते मेरे अरमाँ ।

यहाँ पिज़ा बर्गर की चकाचौंध
सी रंगीन शामें ………..।

गाँव की चौपालों पर हुक्कों
की गुड़गुड़ाहट में ठाहको की आवाजें ।

यहाँ तन दिखाने की हौड़
वहाँ तन छुपाने को पैबंद लगाती सभ्यताएं ।

ए शहर तू बड़ा बहुत है ……
पर हर नुक्कड़ चौहराहे पर अकेला खड़ा है ।

मेरे गाँव में तुझ सी शानों शौकत नहीं है
पर आकर देख वाह प्यार बसता बहुत है ।

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