”  मेरा पता”

”  मेरा पता”
आरती आलोक वर्मा
1
तुम मुझे मेरा पता बतलाओगे? या बतलाओगे तुम मुझे मेरे होने के मायने,
ना-ना मैं ये उम्मीद नहीं करतीना ही देती हूँ ये हक तुम्हे
जैसे तुम नही दिया करते हो

हक मुझे ही मेरा ,जैसे

नही होने देते हो ,मेरे हिस्से की जिंदगी मेरी
वैसे ही मै भी नहीं दूंगी हक तुम्हे
की बताओ तुम मुझे मेरा ही पता ।

2
सुनो ,तुमने खिसका ली है हर दफ़ा
जमीन मेरे पैरों के नीचे से
तुमने फाड़ दिया है हर दफ़ा
मेरा आसमान मेरे ही सर पर
सम्भव है कुछ एक वस्तु, पल
परिस्थितियों पर हो गया हो
वश तुम्हारा, चल गई हो
मनमानी तुम्हारी परन्तु,
इतने से ही खत्म नहीं होती
कहानी ..।
3
इतिहास साक्षी है,
बलात् हथियाये हुए और
हठात् अपनाये हुये
कभी ना हुये हैं सदा के लिए किसी के

युग बदला है और बदल गई हैं मान्यतायें
बहुत सारी,
सुनो जमीन-आसमान को
फ़तह करने वाले हुक्मरानों सुनों
ये कदम मेरे हैं,सर मेरा है
मैं मेरी हूँ, तो तय नहीं है
सदा की तरह अब भी की
तुम मुझे बताओ
मेरे होने के मायने
मेरा पता ।।

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