मेरी पश्चिम नेपाल की यात्रा

प्रकाशप्रसाद उपाध्याय
विगत फरबरी महीने के अंक में मैंने पश्चिम नेपाल की यात्रा का वृत्तांत प्रस्तुत किया था, लेकिन स्थानाभाव के कारण पूरा नहीं लिख पाने के कारण आज उसे पूर्णता प्रदान करने की कोशिश कर रहा हूँ । नेपाल ऐसे कई दर्शनीय पर्यटकीय महत्व के स्थलों से भरा है जहाँ पर्यटकों को इन नैसर्गिक सुंदरता का आनंद उठाने का अवसर मिलता है । पोखरा, मुक्तिनाथ और देश के विभिन्न अँचलों में अवस्थित पर्यटकीय महत्व के स्थलों की अधिकता उनकी यात्रा को खुशी से भरने में नही चुकती ।
मैंने अपने विगत लेखों में कई बार पोखरा की चर्चा की है, क्योंकि यह पर्यटकीय नगरी होने के अतिरिक्त पश्चिम नेपाल के लिए प्रवेश द्वार भी है । उन लेखों से पाठकों को पोखरा के बारे में कई जानकारियाँ मिली ही होंगी । लेकिन इस नगरी की मेरी चर्चा तब तक पूर्णता नहीं पा सकती जब तक इस नगरी की सुंदरता को निखारने या इसे पर्यटन के क्षेत्र में ख्याति दिलाने वाले व्यक्ति या प्रशंसकों की भूमिका की चर्चा न की जाय । अतः आज कुछ शब्द ऐसे पुरुषों के प्रति भी समर्पित करने की आवश्यकता महसूस कर रहा हूँ जिन्होंने देश–विदेश के पर्यटकों के लिए पोखरा जैसे प्राकृतिक सुंदरता से भरे क्षेत्र को अतिरिक्त पर्यटकीय स्थल बनाने और सँवारने की सरकार की सोच को दिशा और गति देने का कार्य किया । तत्कालीन श्री ५को सरकार के बडाहाकिम के रूप में नियुक्त कुशल और विद्वान तेजबहादुर प्रसाई ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निर्वाह की और पोखरा को काठमांडू के अतिरिक्त दूसरा गंतव्य स्थल के रूप में विकसित करने में सफलता प्राप्त की । अन्नपूर्णा हिमालय के हिमाच्छादित श्रृँखलाओं, माछापुच्छ«े पर्वत की अलौकिकता और फेवाताल के मनोहर भलक के कारण पोखरा एक सुंदर नगर होने के कारण वहाँ तत्कालीन राजा महेन्द्र ने अपने भ्रमण काल में रहने के लिए जहाँ रत्न मञ्जरी नामक प्रासाद का निर्माण कराया वहीं ब्रिटेन की महारानी की साल २०१७ फाल्गुन १५गते की यात्रा ने इस नगरी के महत्व को चार चाँद लगाने का काम किया । इस प्रकार प्रसाई के प्रशासन काल में पोखरा का पर्यटन की दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीयकरण हुआ । इसके अतिरिक्त पोखरा ब्रिटिश और भारतीय सेना से अवकाश प्राप्त सैनिकों की नगरी होने के कारण भूतपूर्व सैनिकों ने भी इस पर्वतीय नगरी कों स्वच्छ और सुंदर बनाने में भी अहम भूमिका निर्वाह की है । इस स्थान की सुंदरता, अनुकूल मौसम और पश्चिम नेपाल का प्रवेश द्वार होने के अलावा उस इलाके के विभिन्न जिलों में सेवानिवृत्त जीवन बिता रहे भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों को पेंशन वितरण में सहायता पहुँचाने की दृष्टि से गुरुंग बाहुल्य इस नगर में भारत सरकार ने यहाँ एक पेंशन कैंप की स्थापना की है,जहाँ इस पंक्तिकार को सन् १९७७के दिनों में भारतीय सेनाध्यक्ष जेनरल टी.एन.रैना के भ्रमण के सिलसिले में आने, विक्टोरिया क्रॉस विजेता कई वीरों से लेकर अनेक पूर्व सैनिकों से मिलकर इन्टरव्यू लेने और इस संबंध में ऑल इण्डिया रेडियो से प्रसारण हेतु कार्यक्रम बनाने के लिए आने का अवसर प्राप्त हुआ था ।
विदेशी पर्यटकों को निकट से अन्नपूर्ण हिमालय का अवलोकन कराने और पर्वतीय क्षेत्रों की सुंदरता से अवगत कराने के उद्देश्य से पोखरा से पदयात्रा मार्ग का भी निर्माण किया गया है, जो अन्नपूर्णा बेस कैंप ट्रैकिंग रुट के नाम से जाना जाता है । पोखरा से आगे निकलने पर कई रमणीय स्थल मिलते हैं जिनकी नैसर्गिक सुंदरता से पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और बार–बार इन क्षेत्रों की यात्रा में आते रहते हैं ।
पोखरा से आगे मध्यपश्चिमाञ्चल क्षेत्र के कई नगरों से गुजरते हुए राह में हरिआली भरा बर्दिया राष्ट्रीय निकुञ्ज देखकर मन आह्लादित होता रहा । लगभग ९७० वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले इस अभयारण्य में चीतल, बाघ और गैंडे के अतिरिक्त कई वन्य जन्तुओं को प्राकृतिक वातावरण में भ्रमण करते हुए देखा जा सकता है । किसी समय में बर्दिया के घने जंगल राजाओं के लिए शिकार के प्रमुख क्षेत्र हुआ करते थे । पोखरा, नेपालगंज एवम् देश के विभिन्न जिलों के बड़ाहाकिम पद पर आसीन तेजबहादुर प्रसाई ने अपनी २७२ पृष्ठ की आत्मकथा ‘फर्केर हेर्दा’में ऐसे शिकारों के संबंध में रोचक जानकारियाँ दी है, जो उन शासकों के लिए शिकार खेलने के अलावा देश की राजनीतिक मामलों पर विचार विमर्श करने का प्रमुख बिंदु भी हुआ करता था ।
अपनी सुदूर पश्चिम की नियात्रा के सिलसिले में मैं धनगढ़ी भी पहुँचा । रास्ते में प्रसिद्ध कर्णाली नदी पड़ती है । यह देश की एक प्रसिद्ध नदी है और इस नदी के नाम पर देश के १४ अंचलों में एक अंचल का नाम कर्णाली अंचल रखा गया है । इस नदी के ऊपर बनी ५०० मीटर लंबी पुल केबुल स्टेड ब्रिज ९अबदभि कतबथभम दचष्मनभ०के नाम से जानी जाने के कारण एक विशेषता लिए हुए है । एक जापानी कंपनी के सहयोग से पूरी की गई इस पुल का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला द्वारा १५ दिसंबर सन् १९९३ में किया गया था । सुदूर पश्चिम के कैलाली जिला स्थित लम्की चुहा नगरपालिका के चिसापानी नामक स्थान पर निर्मित इस पुल पर चलते हुए लगता था निकटवर्ती पहाडि़यों से बहती तेज ठंढी हवा मानो शरीर के संतुलन को बिगाड़ने के लिए आमाद है । डर लगता था कहीं सिर के ऊपर का कैप तेज हवा के झोंकों से उड़ न जाय । साथ में यात्रा कर रहे एक फोटोग्राफर मित्र रमेश पुड़ासैनी ने बताया कि इस स्थल से लगभग ३५–४० कि.मी. की दूरी पर कर्णाली और भेरी नदी का संगम स्थल है, जहाँ से यह जलधारा एक होकर बहती हुई यहाँ तक आती है पर कुछ दूर जाकर फिर दो पृथक नामों से बहने लगती है ।pokhra
इस नदी का पानी इतना ठंडा था कि मुँह धोने के लिए इसे अँजुली में भरते हुए एक सिहरन उत्पन्न हुई । तट पर पूजा करा रहे शिव सेना नेपाल के अध्यक्ष अरुण सुवेदी से जब इस संबंध में बातें की तो उन्होंने बताया कि यह ब्रह्मपुत्र की जलधारा है । मानसरोबर से निकली यह जलधारा नीचे उतरते हुए दो मार्ग अपनाती है । एक भारत की ओर जाती है और ब्रह्मपुत्र के नाम से आसाम होते हुए बहती जाती है और दूसरी नेपाल की ओर आती है । हमारे यहाँ यह कर्णाली नदी के रूप में जानी जाती है । हिमराशि के पिघलकर निकली धारा होने के कारण ही इसका जल इतना ठंढा है । इसे गंगा जल के समान पवित्र और स्वच्छ माना जाता है । अतः यहाँ के लोग इसे गंगाजल के समान पवित्र मानकर अपने–अपने घरों में रखते हैं और पावन कार्यों में इसका उपयोग करते हैं ।
कर्णाली पुल के ऊपर चलने, इस पावन नदी के जल का सेवन कर हाथमुँह धोने और चिसापानी की दुकान में चायपान करने के बाद हम लोग धनगढ़ी की ओर बढ़े । धनगढ़ी नेपाल का एक प्रसिद्ध नगर है । धनगढ़ी जाते हुए मार्ग में कई मठ–मंदिर दिखाई पड़े । पर धनगढ़ी उपमहानगरपालिका के केंद्र में अवस्थित उत्तररामेश्वरम ज्योतिर्लिंग धाम, जो शिवपुरी धाम के नाम से भी प्रसिद्ध है, इस क्षेत्र का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है । वहाँ स्थापित १०८ फीट ऊँचा उत्तररामेश्वरम ज्योतिर्लिंग और उसके साथ ही खड़ा ६४ फीट ऊँचा त्रिशूल इस पावन स्थल के प्रति आसपास के क्षेत्रों के धर्मपरायण लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है । धाम के प्रांगण के अंदर कई मंदिरों का निर्माण हो चुका है तो कुछ मंदिरों और संरचनाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है । भारतीय सीमा के निकट अवस्थित होने के कारण यह धाम शिवरात्री जैसे पावन पर्व के अवसर पर पड़ोसी देश के राज्यों के भक्तजनों के लिए भी तीर्थ स्थल हो रहा है । अतः इसे धार्मिक पर्यटकीय स्थल के रूप में विकसित करने की योजना पर भी काम हो रहा है । काठमांडू से धनगढ़ी के लिए विमान सेवा उपलब्ध होने के अतिरिक्त यह क्षेत्र राजमार्ग से भी जुड़ा है । अतः परिवहन की अच्छी सुविधाओं के कारण इस क्षेत्र में आने वाले पर्यटकों को घुमने, रहने और खाने की सुविधाएं उपलब्ध हैं । आधुनिक और मध्यम वर्गीय होटलें पर्यटकों की सुविधाओं का पूरा ख्याल रखते हैं तो स्थानीय ट्रैवल एजेंसियाँ भी पर्यटकों की उपयुक्त मार्गदर्शन और सुविधाएँ सुलभ कराने में अग्रणी रहते हैं । विमान यात्रा समय की वचत तो कराती है पर प्राकृतिक नजारे को निकट से देख पाने का सुख तो सड़क मार्ग से की जाने वाली यात्रा में ही मिलती है ।
संक्षेप में कहा जाय तो सड़क मार्ग से हुई सुदूर पश्चिम नेपाल की मेरी यह नियात्रा ज्ञानमूलक, संतोषजनक और सुखद रही ।

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