मेलम्ची में चीन का धोखा

चीन के ठेकेदार ने एक बार फिर से अपनी दादागिरी का पर््रदर्शन करते हुए नेपाल के नियम-कानून एवं सुरक्षा पद्धतिको ठेंगा दिखा दिया है। मेलम्ची पेय पानी परियोजना के सुरुङ्ग निर्माण का ठेक्का लिए चीन के निर्माण कम्पनी के द्वारा निर्धारित मापदण्ड एवं शर्ता के अनुसार काम नहीं पुरा करने के कारण नेपाल सरकार ने उसके साथ हुए ठेक्का अनुबन्धों को समाप्त कर दिया तथा मेलम्चीस्थित उसके उपकरणों को अपने कब्जे में ले लिया। आक्रोशित चीन के ठेकेदार एवं कामदारों ने नेपाल की सरकार से बातचीत करने एवं नेपाल के कानून के जरिए अपनी बात रखने के बजाय बहाँ ड्यूटी पर तैनात नेपाली सुरक्षा कर्मियों से उलझना ही बेहतर समझा। नेपाली सुरक्षाकर्मियों के साथ हर्ुइ उनकी झडÞÞपको नेपाल के राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने अपने मुख्य पृष्ठ में प्र्रमुखता के साथ प्रकाशित किया। नेपाल के कुछ सरकारी अधिकारी, राजनीतिज्ञ एवं कुछ पत्रकार चीनभक्ति के गुण गातेे नहीं थकते जब कि चीन के नागरिक एवं ठेकेदार नेपाल सरकार तथा यहाँ के सुरक्षाकर्मी एवं न्यायपालिका तक की परवाह नहीं करते।
हुआ यों कि सन् २००९ के फरबरी में चिनी निर्माण कम्पनी चाइना रेलबे १५ ब्यूरो ग्रुप एवं चीन के हीं सीएमआईसी इन्जिनियरिङ्ग काँरपोरेसन के संयुक्त उपक्रम में मेलम्ची पेय पानी परियोजना का २६.५ किलोमिटर लम्बी सुरुङ्ग की खुदाई का सम्झौता हुआ था। सम्झौता के अनुसार सन् २०१३ के सितम्बर से पहले हीं इसे पूरा हो जाना था परन्तु काम शुरु होने के तीन वर्षमें महज ६ किलोमिटर तक ही सुरुङ्ग का निर्माण हो सका। जबकि इस लक्ष्य की पर्ूर्ति लिए प्रति माह ७०० मिटर सुरुङ्ग की खुदाई होनी चहिए। परियोजना पूरी हो जाने के बाद काठमाण्डू के लोग दैनिक १७ करोड लिटर पानी की खपत कर पाते।
नियत समय पर काम नहीं कर पाने के बाद चीनी कम्पनी चाइना रेलबे १५ ब्यूरो ग्रुप ने अतिरिक्त २००% पैसे की मांग की है। ऊपर से एक वर्षका अतिरिक्त समय भी। अगर ठेकेदारों की नई शर्ते मान ली जाती हैं तो सिर्फसुरुङ्ग के निर्माण में ही ३८० करोडÞ नेपाली रुपये से बढकर ९०० करोडÞतक खर्च हो जाता। अपनी आदत के अनुसार चीनी कम्पनी ने इस बार भी भेरिएसन अर्डÞर के जरिए अतिरिक्त पैसे एवं समय की माँग की। अन्य देशों में अनुबन्ध के अनुसार काम पूरा नहीं करने वाली कम्पनीको सजा दी जाती है, उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। परन्तु नेपाल में चीनी कम्पनी को भेरिएसन अर्डÞर के नाम पर अतिरिक्त पैसा एवं वक्त भी मिल जाता है। इस बार चीनी कम्पनी की सारी कसरतें बेकार हर्ुइ जब नेपाल के शहरी विकास मन्त्रालय ने इनके नये शर्ताें पर विचार करने के बजाय अनुबन्ध को ही तोडÞ डÞाला और क्षतिपर्ूर्ति के लिए इनके उपकरणों को भी अपने नियन्त्रण में ले लिया। आक्रोशित चीनी निर्माण कम्पनी नें नेपाली सुरक्षाकर्मी से ही झडÞप किया।
२७०० करोडÞ रुपये की लागत से बनने वाली इस परियोजना का भी अपना हीं इतिहास है। सन् २००१/०२ में इसका भौतिक कार्य शुरु हुआ। उम्मीद कि गई कि सन् २००६/०७ में ही इसका निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा तभी तो पर्ूवप्रधानमन्त्री स्व. कृष्णप्रसाद भट्टर्राई ने कहा था कि मेलम्ची के पानी से वे काठमाण्डÞू में हीं विपक्षीयों के मुंह धो डÞालेंगे। सन् २०११/१२ के मई माह में पूरी होने की उम्मीद भी समाप्त हो गई। अब तक सल्लाहकारों के नाम पर इसके दाता लोग ६०० करोडÞ से अधिक रुपये अपने-अपने देश में ले गए हैं। एशिया विकास बैंक, जाइका, जेभिकबी, ओपेक, नौडिर्Þक डÞेभलपमेन्ट फण्डÞ एवं स्वयं नेपाल का भी इस में निवेश है।
६० मेगावाट के त्रिशूली- ३ “ए” पनविजली परियोजना के निर्माण का जिम्मा भी चीन के ही. गेजुआ वाटर एण्डÞ पावर ग्रुप अफ कम्पनी को मिला है। इस परियोजना के २०% काम पूरा होने के वाद कम्पनी ने नेपाल सरकार के समक्ष अजूवा प्रस्ताव रखा है। वर्षत के मौसम में अतिरिक्त ३० प्रतिशत विद्युत् निर्माण करने की इजाजत इसे मिले। नेपाल सरकार अब तक वषर्ात में उत्पादन करती आई विजली का भण्डारण नहीं कर पा रही है और यूंही ये वरवाद हो रही है। फिर भण्डÞारण क्षमता का विकसित किए बिना ही अतिरिक्त ३० प्रतिशत विजली के उत्पादन का अर्थ समझ से परे है। अगर शर्ते मान ली जाती हैं तो ३०० करोडÞ रुपये का अतिरिक्त भार एवं ३ वषर्ाेंको अधिक समय नेपाल सरकार को सहन करना होगा। नुवाकोट जिले में स्थित इस परियोजना का विरोध स्थानीय स्तर पर भी हुआ है। ऊर्जा मन्त्रालय, ऊर्जा प्राधिकरण के अधिकारीं एवं कतिपय विज्ञों की राय को अनसुना कर नेपाल के ऊर्जा मन्त्रालय के शर्ीष्ा अधिकारी इस प्रस्ताव पर विचार करने को आमाद हो गए। और वाजाफता इसके अध्यययन के लिए एक समिति भी बना दी गई है जो अपनी राय सरकार को देगी। स्मरणीय है कि कतिपय ऊर्जा विज्ञों ने इस प्रस्तावको विचार के लायक मानने से ही इनकार कर दिया और सरकार द्वारा गठित कमीटी में बैठने से खुदको अलग कर लिया। पर्ूवऊर्जा मन्त्री गोकर्ण्र्ाावष्ट के समय भी यह प्रस्ताव आया था परन्तु इमानदार विष्ट ने इस प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया था। चमेलिया विद्युत परियोजना में तो भेरिएसन अर्डर के नाम पर चीनी निर्माण कम्पनी गेजुआ ने ५८ करोडÞ रुपया ले भी लिया और अतिरिक्त पैसे की माँग जारी है। १४ मेगाबाट वाली कुलेखानी ३ में भी १६ करोडÞ भेरिएसन अर्डÞर के नाम पर पैसा ले लिया। २०११ के दिसम्बर में इसे पूरा होना था परन्तु अब तक महज ४० फीसदी ही काम हुए हैं। सन् २०१४ से सितम्बर से पहले यह पूरा नहीं  हो सकेगा। १०९ करोडÞ रुपये के इस परियोजना में भेरिएसन अर्डर के नाम पर ५०० करोडÞ रुपये तक खर्च होना तय है।
पोखरा विमान स्थलका निर्माण भी विवाद से परे नहीं है। चीन के ही एक्जिम बैंक के ऋण सहयोग से यह बनना है। इपीसी टेण्डर से इसका काम होना है। तीन चीनी कम्पनी ने ही आवेदन किया। शुरु में १६०० करोडÞ रुपये में यह काम चीनी कम्पनी को मिला फिर यह २८०० करोडÞ का टेण्डÞर हो गया।
पोखरा विमान स्थल का टेण्डÞर विवादों से परे नहीं रहा। स्थानीय राजनीतिक दलों के नुमाइन्दों ने इस में बडÞे पैमाने पर लेन देन होने का आरोप लगाया। बात निकली तो दूर तलक गई और यह भी र्सार्वजनिक हुआ कि देश के सबसे बडÞे दल के स्थानीय नेता ने अपने आला नेताआंे की जानकारी में यह अलभ्य लाभ हासिल किया है। पोखरा के कुछ लोग धरना एवं भूख हडÞताल पर भी बैठ गए कि ठेके जल्द से जल्द दे दिए जाएं।
दरअसल नेपाल में ठेका हासिल करने के लिए चीनी निर्माण कम्पनी ने अजीव नुस्खा इस्तेमाल किया है। ठेका लेते समय सबसे कम पैसा में ठेका लेते है। बडÞी कम्पनी अपने नाम पर ठेका ले लेती है। सरकार से मिलने वाली शुरुआती रकम बीस प्रतिशत में से चार प्रतिशत अपना नाफा निकाल लेते हैं और काम को किसी कमजोर कम्पनी के हवाले कर देते हैं। इन कमजोर निर्माण कम्पनियों के पास न तो अधिक आर्थिक क्षमता होती है, ना ही आवश्यक उपकरण, ना हीं अनुभव। नतीजा यह होता है कि निर्माण की गति सुस्त हो जाती है, और समय पर काम पूरा नहीं हो पाता। बाद में ये कम्पनियाँ बडÞी चीनी कम्पनी को गुहार लगाती हैं और खेल भेरिएसन आर्डÞर के नाम पर अधिक पैसा ऐंठने का शुरु हो जाता है।
काठमाण्डÞू स्थित चीनी दूतावास अपने निर्माण कम्पनियों के बारे में सिफारिस करता है कि ये कम्पनियाँ सक्षम हैं, सुविधा सम्पन्न हैं तथा अन्तरराष्ट्रिय स्तर पर काम करने में इन्हें महारत हासिल है। परन्तु शुरु में इसी नाम पर ठेक्का लेने के बाद ये बडÞी कम्पनी सब-कन्ट्रयाक्ट के जरिए काम कराती है। विवाद होने के बाद एक चीनी अधिकारी ने कहा कि चीनी निर्माण कम्पनी ठेका हासिल करने के लिए घूस नहीं दिया करती। ये अच्छी बात है। परन्तु नेपाल को समय पर काम चाहिए। नेपाल में अनेकों चीनी कम्पनी ने काम किया है। बढिÞया काम किया है आगे भी करती रहेंगी लेकिन फिलहाल जो कुछ हो रहा है उसे तो अच्छा नहीं कहा जा सकता है। हो सकता है कुछ बडÞी चीनी निर्माण कम्पनियाँ चीनी दूतावास को भी गुमराह कर रही हैं। ऐसे ठेकेदारों से चीन और नेपाल दोनों को र्सतर्क रहना होगा।
पिछले डिÞसम्बर-जनवरी में भी कुछ चीनी नागरिकों ने भक्तपुर के जिला अदालत परिसर में हीं हंगामा मचाया था। अदालत से वाहर अभियुक्त को ले जाते समय रास्ते से हीं चीनी अभियुक्त को छुडÞाने का प्रयास हुआ। स्थानीय प्रहरी कार्यालय में तोडÞफोडÞ भी हुआ तथा नेपाली प्रहरी के साथ हाथापाई भी हर्ुइ। करीब आधा दर्जन पुलिस जख्मी हुए थे। नेपाली पुलिस की यही गलती थी कि गलत तरिके से विदेशी पैसा रखने के आरोप में चीनी नागरिक को पकडÞा गया था। चीनी नागरिकों को अदालत से बाहर पुलिस हिरासत में ले जा रहे थे। पहले भक्तपुर की घटना और फिर यह मेलम्ची की घटना यही दर्शाती है कि चीनी नागरिक नेपाल के कानून को नहीं मानते।

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