मैंने देखा कि भारत नेपाल के सामने थर-थर काँप रहा है : सुरभि

(गुस्ताखी माफ ये सिर्फ एक सपना है इसे हकीकत ना समझें और न ही दिल से लगाएँ)

सुरभि, बिराटनगर,२६ जून, (व्यंग्य) |
सबसे पहले तो मैं माफी ही माँग लूँ कि, इसे पढ़कर भारत समर्थकों को नाराज होने की जरुरत नहीं है और न ही भारत विरोधियों को खुश होने की आवश्यकता क्योंकि, जो मैं शेयर करने जा रही हूँ वो महज एक सपना है और सपने तो अपने होते नहीं, उनका क्या है वो तो छलावा हैं भ्रमित करते हैं, आँखों में बसते हैं और क्षण में टूट भी जाते हैं । इसलिए गुस्ताखी माफ ।
हाँ तो मैं कल रात के सपने की बात कर रही हूँ । बुरा हो इस सीमा सुवेदी का जिसने आधी रात में विडियो जारी कर के कितनों की नींद उड़ा दी । कमबख्त मैं भी उसी को सोचते–सोचते सो गई और तब जो सपना मैंने देखा उसके लिए तो सीमा सुवेदी को धन्यवाद देने का मन करता है, पर ये फिर कभी, अभी तो मैं वो बताऊँ जो मैंने देखा । मैंने देखा कि, भारत नेपाल के सामने थर–थर काँप रहा है और नेपाल अपना सीना और मस्तक हिमालय की तरह, नहीं–नहीं, सगरमाथा की तरह उठाकर कह रहा है कि “अगर अपनी खैर चाहते हो तो दार्जिलिंग के नेपालियों की माँग स्वीकार करो नहीं तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा । हमारे तीन–तीन नेपाली वहाँ मारे जा चुके हैं । तुम्हें हमारा डर नहीं, हम अपनी सीमाएँ बन्द कर देंगे, नाकाबन्दी कर देंगे, पानी का बहना रोक देंगे ।” मजा तो तब आया जब इतनी धमकी से ही भारत के तो पसीने छूटने लगे । बेचारा नतमस्तक हो कर कहने लगा, “माई बाप हमारी इतनी मजाल कहाँ कि हम आपकी आज्ञा टाल सकें । अति शीघ्र आपकी आज्ञा का पालन होगा । बस माई बाप अब तो आप खुश ?” पर नेपाल अब भी तना खड़ा था उसने कहा “इतना ही नहीं ये सीमा सुवेदी की इतनी हिम्मत कैसे हो गई कि वह हम बहादुरों को गाली दे । उसे तत्काल देश निकाला करो ।” भारत ने थोड़ी हिम्मत जुटाते हुए कहा, “देश निकाला कैसे करुँ फिर तो वो आपके देश में आ जाएगी क्योंकि आप ही कह रहे हैं कि दार्जिलिंग में बसने वाले सभी नेपाली हैं ?” शायद बात नेपाल के समझ में आ गई थोड़ी नरमी के साथ कहा अच्छा ठीक है उससे कहो कि माफी माँगे । “अरे इसमें कौन सी बड़ी बात है,” भारत ने तुरन्त जवाब दिया “उसके विडियो को थोड़ा एडीट कर लीजिए बस माफी भी हो जाएगी, आजकल तो ये सब आम बात है इसके लिए क्यों परेशान होना जनाब ?” पर न जाने कहाँ से भारत को थोड़ी हिम्मत आ गई उसने डरते–डरते हिम्मत जुटाते हुए धीमी आवाज में कहा कि “हजूर जरा आप मधेशियों पर भी अपनी कृपा दृष्टि डाल देते आज तक पचास से भी ज्यादा मधेशी मारे जा चुके हैं,” इतना सुनना था कि नेपाल ने गरजती आवाज में कहा, “खामोश ये हमारा आन्तरिक मामला है, इसमें दखल देने का तुम्हें कोई हक नहीं, अपनी सीमा में रहो । हम मधेश के साथ कुछ भी करें तुम्हें बोलने का हक नहीं । हम उन्हें गाली दें, मौत दें या अधिकारविहीन रखें ये हमारी मरजी ।”



सपने में ही सही, सचमुच मजा आ गया नेपाल की हिम्मत देखकर, परन्तु बुरा हो इन डीजे वालों का, ये शादी ब्याह का मौसम भी जानलेवा होता है । बलि का बकरा जो बन रहा होता है, वो अपनी ही आनेवाली जिन्दगी भर की गुलामी का जश्न मना रहा होता है और उसके चक्कर में हम जैसों की नींद की भी बलि चढ़ जाती है । इतना हसीन सपना पल में चकनाचूर हो गया उनकी कानफाड़ू संगीत से और मैं इस सुख से वंचित रह गई कि प्रतिउत्तर में भारत ने क्या कहा ? अर्थात् कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा की तरह यह सपना भी अगले सपने के लिए क्रमशः रह गया ।

 

 

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