मैं संघीयता का विरोधी नहीं हूं, पर बहुत जल्द मधेश का भ्रम टूटेगाः डॉ.सी.के. राउत

अभी मधेश में दो धार समानान्तर में चल रही है, एक है उनका जिसे मधेश ने चुना था और अपने प्रतिनिधि के रूप में केन्द्र में भेजा था, दूसरी

CK Raut

डा.सी.के. राउत

धार है डा.सी.के. राउत की जिन्हें कुछ दिनों पहले तक वैज्ञानिक या फिर एक उग्र लेखक के रूप में जाना जा रहा था । किन्तु आज सी. के. राउत अचानक एक सशक्त आवाज के रूप में उभर कर सामने आ रहे हैं, जिसके साथ पूरा मधेश हो ना हो किन्तु, युवाशक्ति जरूर है । आज उन्हें मधेश के मसीहा के रूप में जाना जा रहा है । कुछ तो है इनके व्यक्तित्व में कि सत्ता पक्ष भी चितिंत नजर आ रही है । सत्ता पक्ष यह निर्णय नहीं कर पा रही कि, इनके साथ किया क्या जाय ? जब किसी रैली को सम्बोधित करने की बात होती है तो डा. राउत की गिरफ्तारी हो जाती है और फिर तत्काल छोड़ दिया जाता है । एक अस्पष्ट नीति सरकारी तंत्र की ओर से दिख रही है । यह एक नाम सरकार के लिए साँप–छुछँुदर वाली स्थिति पैदा किए हुए है जिसे ना निगला जा रहा है और ना ही उगला जा रहा है । डॉ. राउत से उनकी कार्यनीति और मधेश की परिस्थिति पर हिमालिनी–संपादक श्वेता दीप्ति से हुई बात–चीत का संक्षिप्त ब्योरा–
० स्वतन्त्र मधेश का नारा लेकर आप एकला चलो की नीति अपनाए हुए हैं, यह कहाँ तक कारगर सिद्ध होगी ?
– मैं अब अकेला नहीं हूँ, शायद जब चला था तो अकेला था पर, अभी मधेश की जनता मेरे साथ है । मैं जो आवाज उठा रहा हूँ मधेश को लेकर, यह आवाज पूरी मधेशी अवाम की है, इसलिए वो मेरे साथ हैं । और यह माँग नई नहीं है, हाँ इसे कभी पुरजोर आवाज नहीं मिली और न ही प्रभावशाली तरीके उठाया गया । एक भय और त्रास उनके मन में था पर अब वो सशक्त हो रहे हैं । अपनी पहचान और अधिकार के लिए सजग हो रहे हैं । आज अगर यह एक घर की आवाज है तो कल यह सम्पूर्ण मधेश की आवाज बनने वाली है ।
० क्या आपको नहीं लगता कि आपको कोई मंच की आवश्यकता है या अभी आप सिर्फ भीड़ जुटाने का काम कर रहे हैं ?
– मैंने कहा न कि मैं अकेला नहीं हूँ जनशक्ति मेरे साथ है और ऐसे में मंच भी स्वतः तैयार हो जाता है । रही भीड़ जुटाने की बात तो आपने देखा होगा कि बिना किसी प्रचार–प्रसार के जनता स्वतःस्फूर्त रूप में मेरे साथ हो लेती है और यह मेरा मनोबल बढ़ाता है । मधेश की जनता जग रही है अपने अधिकार को पहचान रही है जिसे अब कोई शक्ति दबा नहीं सकती ।
० आपकी कोई कार्यशैली या नीति जिसके तहत आप आगे बढ़ रहे हैं ?
– जी हाँ हम सोची समझी कार्यनीति के तहत आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि बिना किसी पूर्वाधार और योजना के आगे बढ़ने पर असफल होने का डर रहता है । हमारी पहली नीति है संजीवनी की, यह हमारा पहला चरण है, जिसके तहत हम अभी  अपने कदम आगे बढ़ा रहे हैं । संजीवनी का अर्थ होता है वह औषधि जो मृतप्राय को भी जिन्दा कर दे । मधेश सदियों से शोषित, दमित और मृतप्राय है । मैं इसे अभी जाग्रतावस्था में लाने की कोशिश में लगा हूँ क्योंकि औरों को जगाने से पहले स्वयं को जगाने की आवश्यकता है । आत्मा जगती है तो चेतना आती है और तभी आपको क्या मिला है और आप क्या पाने के अधिकारी हैं यह समझते हैं । इसलिए संजीवनी के साथ हम इस प्रयास में लगे हैं कि मधेश यह जाने कि वह किस तरह औपनिवेशिक शासन में जी रहा है । जागरुकता के बाद संगठन का चरण आएगा जिसमें हम बहुत जल्द प्रवेश करने वाले हैं । संजीवनी का चरण भी साथ–साथ चलता रहेगा । स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन की घोषणा दो वर्ष पहले ही हो चुकी थी । हमारा प्लेटफार्म तैयार है और जनता हम से जुड़ रही है । हम यूँ ही आगे नहीं बढ़ना चाहते हम सजग और सचेत जनता को  साथ लेकर आगे बढ़ने को तत्पर हैं ।
० अन्य मधेशी दलों और संघीयता के विषय पर आप क्या कहना चाहेंगे, क्या आप संघीयता विरोधी हैं ?
– नहीं मैं संघीयता विरोधी नहीं हूँ किन्तु, मैं यह जानता हूँ कि मधेश की समस्या का हल संघीयता तो बिल्कुल नहीं है । इसलिए हम आजाद मधेश के एजेण्डे के साथ आगे बढ़ रहे हैं । मैं एक उदाहरण दूँ आपको कि अभी मधेश में जो सेना परिचालित है वो मधेश की नहीं है उसमें ९५ प्रतिशत सेना बाहर की हैं । कल अगर संघीयता मिल भी जाती है तो ये औपनिवेशिक सेना मधेश से जाने वाली नहीं है । दूसरी समस्या जो है वो आप्रवासन को लेकर है अभी मधेश में एकतरफा अप्रवास अर्थात पहाड़ी मूल के लोगों का वहाँ आना और बस जाना है । कुछ सालों से यह तीव्र गति से बढ़ा है और यह एकतरफा बढ़ रहा है । सन् १९५१ में मधेश में पहाड़ियों की संख्या सिर्फ ६ प्रतिशत थी परन्तु २००१ में यह ३३ प्रतिशत तक बढ़ा है यह चिन्ता का विषय है । यह दोनों ओर से होता तो कोई बात नहीं थी पर आज आदिवासी, जनजाति आदि की जमीन पर शासक वर्ग के लोगों का कब्जा है और ये भूमिहीन हो चुके हैं । यह जो स्थिति है वह संघीयता दूर नहीं कर सकती है । और मधेश के जो प्रतिनिधि सत्ता के गलियारे में हैं या उसके बाहर हैं उसकी स्थिति और नीयत दोनों मधेश के सामने है । अगर संघीयता मिल भी जाती है तो, उसके बाद भी बहुत जल्द मधेश का भ्रम टूटने वाला है क्योंकि मधेश चलाने वाले हाथ यही होंगे, सोच इनकी ही होगी और संचालन कहीं और से होगा ।
० मधेश जिस दौर से गुजर रहा है, क्या आपको नहीं लगता कि इसके जड़ में कहीं–ना–कहीं अशिक्षा और गरीबी है ?
– नहीं, मैं यह नहीं मानता अशिक्षा और गरीबी तो अपनी जगह है पर मधेश की इस हालत का जिम्मेदार यहाँ का उपनिवेशवाद है जिसने मधेश को कभी बढ़ने ही नहीं दिया है । मधेश आज तक शोषित होता आया है बस इसे अब आजाद कराना है । मधेश आज तक परतंत्र है और यही कारण है कि ना तो आज तक उसका विकास हुआ ना वहाँ से गरीबी का उन्मूलन हुआ और ना ही सही वातावरण तैयार हो सका है । इसलिए हम सब इस के जड़ में जाना चाहते हैं पेड़ की डालियों या उसकी फुनगियों को हरा–भरा कर के जड़ को मजबूत नहीं कर पाएँगे । अगर जड़ मजबूत होता है तो उसकी डालियाँ भी स्वतः मजबूत होंगी । आपको पता होगा कि मधेश अन्न का भण्डार है, सबसे अधिक अनाजों की पैदावार यहाँ होती हैं और गौर करने वाली बात यह है कि सबसे अधिक भुखमरी गरीबी और कुपोषण मधेश में ही है । १९ प्रतिशत जनता इसकी शिकार है और यह आँकड़ा पहाड़ से दोगुणा है । मधेश का अनाज नेपाल खाता है और वहीं की यह स्थिति है इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है कि मधेशियों का उसपर अधिकार नहीं है वह सब बाहर चला जाता है । मधेश के पिछड़ेपन का मूल कारण उपनिवेशवाद ही है ।
० संजीवनी, संगठन और उसके बाद ? क्या उपलब्धि की कोई समय–सीमा निर्धारित है ?
संजीवनी, संगठन और उसके बाद का चरण है संघर्ष और फिर उसकी उपलब्धि । संघर्ष लम्बा चलने वाला है क्योंकि इतनी आसानी से हमें वो मिलने वाला नहीं है जो हम चाहते हैं । ८ से १२ साल की समय सीमा हमने सोची थी किन्तु हम योजना तो बनाते हैं पर सब उसके अनुसार ही होता जाय यह आवश्यक नहीं, क्योंकि व्यवधान तो उत्पन्न होता है । इसलिए यह लड़ाई कितनी लम्बी चलेगी फिलहाल कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है । किन्तु हम अब रुकने वाले भी नहीं हैं और पीछे हटने वाले भी नहीं हैं । आठ वर्ष की अवधि हमने तैयारी के लिए सोच रखा था पर यह समय सम्भवतः कम है ऐसा लग रहा है । इसलिए अभी समय लगेगा ।
० अन्य मधेशी दलों का आपको समर्थन नहीं है, क्या आप उनके साथ या किसी और के साथ जाना चाहेंगे ?
मैं अपनी स्पष्ट नीति के साथ आगे बढ़ रहा हूँ जबकि उन दलों के पास कोई स्पष्ट नीति नहीं है कोई कभी किसी ओर जाता है तो कभी किसी ओर । मैं अभी संगठित हो रहा हूँ और बहुत जल्द एक नाम और एक संगठन के साथ सामने आऊँगा । क्योंकि मेरे साथ मधेश–शक्ति है ।
० आप पर आरोप लगाया जाता है कि आपको विदेशों का संरक्षण प्राप्त है या युएनए से जुड़े हुए हैं इस सन्दर्भ में आप कुछ कहेंगे ?
देखिए जब भी किसी राष्ट्र में कोई परिवर्तन की लहर चलती है तो अन्य राष्ट्रों का ध्यान भी आकर्षित होता है । यह एक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा भी बन जाता है जो सहायक ही सिद्ध होता है । हम भी चाहेंगे कि हमें ऐसा समर्थन प्राप्त हो हालाँकि अभी तक तो ऐसा समर्थन नहीं मिला है, समर्थन अगर मिला भी है तो मानवअधिकार के मुद्दे पर या राज्य स्वतन्त्रता के मुद्दे पर । पूर्ण स्वतन्त्रता के विषय पर कोई ऐसा समर्थन अभी तक नहीं मिला है और अगर कल को मिलता है तो यह हमारे लिए सकारात्मक ही होगा । अभी जो मेरा नाम या मेरे कार्यकर्ताओं का नाम युएनए से जोड़ा गया, प्रचार किया गया उससे हमें फायदा ही हुआ है वो गलत करना चाहते हैं पर हमारा इसी बहाने प्रचार–प्रसार हो जाता है ।
० आगे की रणनीति ?
मधेश बार–बार बलिदान देता आया है । किन्तु आज तक उसे उसका प्रतिदान नहीं मिल पाया है । कितने सपूतों ने अपने प्राण दिये । पर हासिल क्या हुआ ? इसलिए हम समस्या की जड़ तक जाना चाह रहे हैं । कितने काँटें हमारे चारो ओर उग रहे हैं और हम अभी उसे एक–एक कर निकालने की कोशिश कर रहे हैं । अभी कल मेरी पेशी है । और मैं प्रायः अपने गाँव की तरफ ही रहता हूँ । ये सिलसिला कब तक चलेगा यह तो पता नहीं पर लडाÞई लम्बी जाने वाली है । हमने माघ आठ का ख्याल कर के अपने को रोका यह सोच कर कि हम पर यह आरोप नहीं लगे कि हमारी वजह से संविधान नहीं आया पर देखिए नेताओं ने देश को क्या दिया ? संघीयता की बात आ रही है, पर मैं बार–बार कह रहा हूँ कि यह मधेश की समस्या का हल नहीं है । जब तक औपनिवेशिकता का अंत नहीं होगा तब तक मधेश की समस्या का हल नहीं होनेवाला है ।
हर आन्दोलन के लिए अर्थ की आवश्यकता होती है आपकी अर्थपूर्ति कहाँ से हो रही है ?
अभी तक हमें ज्यादा पैसों की जरूरत ही नहीं पड़ है । मैं जहाँ जाता हूँ भीड़ जमा हो जाती है और मैं अपनी बात उन तक पहुँचा देता हूँ । जनता खुद हमें बुला रही है और वो स्वयं व्यवस्था करती है । हमने अभी तक कोई ऐसा आयोजन नहीं किया जहाँ बहुत अर्थ की आवश्यकता हो और हमारी लड़ाई अहिंसात्मक है इसलिए भी हमें इसकी कोई खास आवश्यकता नहीं है । मुझे पूरा विश्वास है कि मधेश और मधेशी मेरे साथ हैं, यह साथ ही मेरा मनोबल बढ़ाता है और हमें मानसिक, शारीरिक और आर्थिक शक्ति देता है । यही शक्ति हमारे कार्यकर्ताओं में जोश भरता है और हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है । कोई हिंसा हम नहीं चाहते, बस हमें हमारा अधिकार चाहिए, स्वाभिमान चाहिए और स्वराज्य चाहिए । और मैं मधेशी दलों से भी आह्वान करता हूँ कि वो मेरे खिलाफ दुष्प्रचार ना करें बल्कि हमारे साथ आएँ और खुले मंच पर बहस करें । मैं उम्मीद करता हूँ कि बहुत जल्द हो ना हो पर कामयाबी हमें मिलेगी अवश्य ।

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