मैथिल संस्कृति में दशहरा और दर्गापूजन विगत से वर्त्तमान तक:
डा. गङ्गाप्रसाद अकेला

प्राचीनकाल से ही होते आये आध्यात्मिक, साँस्कृतिक, लौकिक एवं सामाजिक पर्व आदि के आयोजन की दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि मैथिल संस्कृति -जो हमारे देश के पूरब में झापा जिला से पश्चिम में तर्राई-मधेश के रौतहट जिला तक और पडोसी देश भारत के विहार प्रान्त के उत्तरी भू-भाग के सहरसा, पूणिर्याँ, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजपफरपुर और पटना तक के कुछ भाग तक फैली हर्ुइ है), को विश्व का अग्रणी संस्कृति माना जाता है, क्योंकि कोई भी महीना ऐसा नही है, जिसमें कम-से-कम तीन पर्व-कृष्णपक्ष की एकादशी, शुक्लपक्ष की एकादशी और पूणिर्मा नही मनाया जाता है। क्षेत्र की दृष्टि से मिथिलाञ्चल का अधिकांश भू-भाग पडोसी देश भारत में पड्ने पर भी प्राचीन त्रेता युग में मिथिला की राजधानी जनकपुरधाम, नेपाल में ही था, जिसके नरेश राजषिर् एवं ब्रहृाषिर् जनक थे-जिसकी पुष्टि वाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत ‘रामचरितमानस’ आदि महाकाव्यों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि मैथिल संस्कृति नेपाल की सबसे प्राचीन, समृद्ध, गौरवशाली और विविधता से परिपर्ूण्ा प्राथमिक और प्रारम्भिक संस्कृति है। इतना ही नहीं जिस वक्त आधुनिक नेपाल का कोई नामो-निशान तक नहीं था, उस वक्त से ही मैथिल संस्कृति नेपाल के मिथिला क्षेत्र में रहती आयी है। इस दृष्टि से जनकपुरधाम और नेपाल के मिथिला क्षेत्र के निवासी मैथिल समुदाय नेपाल के आदिकाल के नागरिक हैं और उसी समय से -त्रेता युग में) नेपाल में विजया दशमी भव्य रुप से भगवती दर्ुगा की पूजा आराधना करते आये हैं।
प्रत्येक वर्षआश्विन शुक्लपक्ष के प्रथम दिन से प्रायः प्रत्येक गृहस्थ परिवार के घर में विधिवत् ‘घटस्थापना’ अर्थात् गृहदेवता रहने वाले कक्ष में विभिन्न स्थलो से मिट्टी लाकर उसपर नई मिट्टी के घडे मंे जल भरकर औंर उसमें विधिवत् सामान रखकर ऊपर से आम का कलश रखकर ‘कलश’ स्थापना किया जाता है और उसी तिथि से प्रातः और सायंकाल नियमित रुप से नवमी तिथि तक विधिवत् पूजा पश्चात् ‘दर्ुगा सप्तशती’ वा ‘रामचरितमानस’ का नियमित पाठ भी किया जाता हैं।
साँस्कृतिक विशिष्ट आयोजन की दृष्टि से पहले मिथिलाञ्चल के अधिकांश गाँवों में विजया दशमी की पूरी अवधि भर सुबह-शाम नियमित दर्ुगापूजन के लिये प्रचलन अनुसार की मर्ूर्त्तियाँ बनाने वा कुम्भकार द्वारा बनवाने का काम आश्विन शुक्लपक्ष के शुरु होने से कम-से-कम १० दिन पहले से ही विधिवत् प्रक्रिया अनुरुप शुरु कर दिया जाता था। दर्ुगापूजन के लिये गाँव में निर्धारित स्थान वा मन्दिर में मध्यभाग में भगवती दर्ुगा की महिषासुर्रमर्दन का दृश्यसाथ सिंह के ऊपर सवार भव्य मर्ूर्त्ति, दोनों ओर क्रमशः महालक्ष्मी, महासरस्वती, सिद्धिदाता गणेश, कार्त्तिकेय, कही-कहीं महाकाली, रेवन्त आदि देवी-देवताओं की मर्ूर्त्तियाँ मिट्टी से तैयार किया जाता है जो प्राय ः शुक्लपक्ष के प्रथम दिन तक सम्पन्न हो जाता है।
आश्विन शुक्लपक्ष की प्रथम तिथि के प्रातः से ही गाँव के पुरोहित द्वारा विधिवत् पूजन प्रारम्भ हो जाता है। पूजा समाप्त होने के वाद घरी-घंटे बजाकर आरती की जाती है, जिस वक्त गाँवभर के बच्चे-बूढे तथा महिलायें भी वहाँ जमा होकर आरती ग्रहण किया करते हैं, सबों को प्रसाद वितरण किया जाता है। यह क्रम प्रत्येक दिन सुबह और शाम को नवमी तिथि तक चलता रहता है। षष्ठी तिथि तक प्रायः हरेक मर्ूर्त्तियों की आँखें खोल दिये जाते हैं केवल भगवती दर्ुगा का बाँकी रहता है इधर पूजा समिति के लोग पुरोहित को साथ लेकर युग्म बेल की खोज पंचमी तिथि तक कर लिये जाते है। षष्ठी तिथि के अपराहृन में हाथी-घोडा और भव्य बाजा-गाजा के जुलुश साथ गाँव वासियों का समुदाय उस स्थल तक पहुँचता है और पुरोहित -पंडित) द्वारा हाथीपर चढकर युग्म बेल का पहले विधिवत् पूजा करके उसको नये पीले बस्त्र में बाँधकर फिर उसको धूप-आरती दिखाने के वाद ‘विल्वाभिमंत्रण’ कर लौट जाता है। उसी तिथि से दर्ुगापूजन के स्थलपर अपरान्ह में भव्य मेला तथा रात में साँस्कृतिक कार्यक्रम वा नाटक मंचन होता है। सप्तमी तिथि को प्रात ः काल ही फिर उस जगह पर जाकर ‘विल्वाभिमंत्रण’ किये युग्मबेल को विधिवत पूजा के बाद एक पवित्र डोली में रखकर दर्ुगामन्दिर के प्रांगण में लाया जाता है, जहाँ पहले से ही लिप-पोतकर पूजा करके छाग वलि देने की तैयारी रहती है। ‘युग्मबेल’ के पहुँचते उसे पवित्र स्थल पर र्सवप्रथम कुष्माण्ड वलि, माषवलि अािद देने के बाद छागवलि भगवती के नाम पर देकर उससे निकले प्रथम खून की वूँद को एक मट्टी के सखे में रखकर वलि देने वाला व्यक्ति तेजी से दर्ुगामन्दिर भीतर प्रवेश करके भीतर रहे एकमात्र कुम्भकार को देता है जिसको काले रंग में भगवती दर्ुगा की आँखें खोलता है और तब मन्दिर का द्वार खोलने के वाद एक प्रमुख महिला द्वारा नयी पीली साडी में विधिवत् सामान रखकर भगवती दर्ुगा का खोंछि भरा जाता है। विजयादशमी की तिथि तक प्रत्येक दिन भव्य मेला और प्रत्येक दिन रात में भव्य साँस्कृतिक कार्यक्रम वा नाटक अभिमंचन होता है। विजयादशमी तिथि की शाम को वा कहीं-कही उसके दूसरे दिन प्रतिमाओं को जलप्रवाह करने के वाद दर्ुगापूजन कर्ीर् इतिश्री हो जाती है। ‘कोजाग्रात पूणिर्मा’ मनाने वाले स्थलपर मात्र प्रतिमाओं को मन्दिर में रखा जाता है और पूणिर्मा तिथि को कोजागरा की विधि सम्पन्न करने के वाद मर्ूर्त्तियांे को जलप्रवाह किया जाता है। इस प्रकार का गौरवमय इतिहास विगत में रहा था। वर्तमान और भविष्य में रहेगा। जिसमे सम्प्रति बहुत हृास आ चुका है फिर भी मिथिला में पूरे दशहरा भर दर्ुगापूजन विधिवत् प्रत्येक गृहस्थ परिवार में प्रायः अबतक मनाया जाता हैं।   ििि

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