मोक्ष के हेतु भूतनाथ भगवान शंकर की आराधना : रविन्द्र झा “शंकर”


प्राचीन काल में एक राजा था, जिनका नाम था इन्द्रद्युम्न, वे बड़े दानी, धर्मज्ञ और सामथ्र्यशाली थे । धनार्थियों को वे सहस्र स्वर्णमुद्राओं से कम दान नहीं देते थे । उनके राज्य में सभी एकादशी के दिन उपवास करते थे । गंगा की बालुका, वर्षा की धारा और आकाश के तारे कदाचित गिने जा सकते हैं । पर इन्द्रद्युम्न के पुण्यों की गणना नहीं हो सकती । इन पुण्यों के प्रताप से वे सशरीर ब्रह्म लोक चले गये । सो कल्प बीत जाने पर ब्रह्मा जी ने उन्हें कहा– राजन । स्वर्गसाधना में केवल पुण्य ही कारण नहीं है । अपितु त्रैलोक्य विस्तृत निष्कलंक यश भी अपेक्षित होता है । इधर चिरकाल से तुम्हारा यश क्षीण हो रहा है, उसे पुनः उज्जवल करने के लिये तुम बसुधातल पर जाओं । ‘ब्रह्माजी के ये शब्द समाप्त भी न हो पाये थे कि राजा इन्द्रद्युम्न ने अपने को पृथ्वी पर पाया । वे अपने निवासस्थल काम्पिल्य नगर में गये और वहां के निवासियों से अपने सम्बन्ध में पूछताछ करने लगे । उन्होंने कहा– ‘हम लोग तो उनके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानते, आप किसी बुद्धु चिरायु से पुछ सकते है । सुनते है, नैमिसारण्य में सप्तकाल्पन्तजीवि मार्कण्डेंय– मुनि रहते हैं, कृपया आप उन्ही से इस प्राचीन बात का पता लगाइये ।
जब राजा ने मार्कण्डेय जी को प्रणाम करके पूछा कि मुने क्या आप इन्द्रद्युम्न राजा को जानते है ? तब उन्होंने कहा, नहीं मैं तो नहीं जानता, पर मेरा मित्र नाड़ीजंहा बक शायद इसे जानता हो, इसलिए चलो, उससे पूछा जाय । नाडीजहा ने अपनी बड़ी विस्तृत कथा सुनायी और साथ ही अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए अपने से भी अति दीर्घायु प्रकार कर्म उलूक के पास चलने की सम्मति दी । पर इसी प्रकार सभी अपने को असमर्थ बतलाते हुए चिरायु गृध्रराज और मानसरोबर में रहनेवाले कच्छप मन्थर के पास पहुँचे । मन्थर ने इन्द्रद्युम्न को देखते ही पहचान लिया और कहा कि, आप लोग में जो यह पाँचवां राजा इन्द्रद्युमन है, इन्हें देखकर मुझे बड़ा भय लगता है, क्योंकि इसी के यज्ञ में मेरी पीठ पृथ्वी की उष्णता से जल गयी थीं । अब राजा की कीर्ति तो प्रतिष्ठित हो गयी, पर उसने स्वर्ग में जाना ठकि न समझा और मोक्ष–साधना की जिज्ञासा की । एतदर्थ मन्थर ने लोमश जी के पास चलना श्रेयस्कर बतलाया । लोमश जी के पास पहुँचकर यथाविधि प्रणामादि करने के पश्चात् मन्थर ने निवेदन किया कि इन्द्रदुम्न कुछ प्रश्न करना चाहते है ।
महर्षि लोमश की आज्ञा लेने के पश्चात् इन्द्रद्युम्न ने कहा– महाराज, मेरा प्रथम प्रश्न तो यह है कि आप कभी कुटिया न बनाकर शीत, आतप तथा वृष्टि से बचने के लिये केवल एक मुठ्ठी तृण ही क्यों लिये रहते है ? मुनि ने कहा, राजा एक दिन मरना अवश्य है फिर शरीर का निश्चित नाश जानते हुए भी हम घर किसके लिये बनाये ? यौवन, धन तथा जीवन ये सभी चले जानेवाले हैं । ऐसी दशा में ‘दान’ ही सर्वोतम भवन है ।
इन्द्रद्युम्न पूछा मुने– ‘यह आयु आपको दान के परिणाम में मिली है । अथवा तपस्या के प्रभाव से मैं यह जानना चाहता हूं ।’ लोमश जी ने कहा, राजन । मैं पूर्व काल में एक दरिद्र शुद्र था एक दिन दोपहर के समय जल के भीतर मैंने एक बहुत बडा शिवलिंग देखा भूख से मेरे प्राण सूखे जा रहे थे । उस जलाशय में स्नान करके मैंने कमल के सुन्दर फूलों से उस शिवलिंग का पूजन किया और पुनः मैं आगे चल दिया, क्षुधातुर होने के कारण मार्ग में ही मेरी मृत्यु हो गयी । दूसरे जन्म में मैं ब्राह्मण के घर में उत्पन्न हुआ । शिवपूजा के फलस्वरूप मुझे पूर्वजन्म की बातों का स्मरण रहने लगा । मैंने जान–बुझकर मूकता धारण कर ली । पिता की मृत्यु हो जाने पर संबंधियों ने मुझे निरा गूंगा जानकर सर्वथा त्याग दिया । अब मैं रात–दिन भगवान शंकर की आराधना करने लगा । प्रभु चन्द्रशेषर ‘शिव’ ने मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और मुझे इतनी दीर्घ आयु दी ।
यह जानकर इन्द्रदुम्न, बक, कच्छप, क्रीध और उलूक ने भी लोमश जी से शिवदीक्षा ली और तप करके मोक्ष प्राप्त किया । – स्कन्दपुराण ।

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