मोतिहारि का हिरो

कौन बनेगा करोडपति में पाँच करोड की राशि जीतने वाले सुशील कुमार को मोतिहारी में करीब-करीब सभी लोग जानते हैं। हनुमानगढी मोहल्ले में उनका घर ढूंढने में हमें कोई परेशानी नहीं हर्इ। कार्यक्रम में उनकी उपलब्धि को देखने के लिए घर के बाहर एक बडा सा पर्दा लगाया गया था। सात बजे से ही लोग जुटना शुरु हो गए थे और साढे आठ बजते-बजते वहाँ अच्छी खासी भीडÞ इकÝा हो गई। कुछ लोग उस पूरी घटना को वीडियो कैमरे और मोबाइल कैमरे में कैद कर रहे थे।
बिजली मजा किरकिरा ना कर दे इसलिए जेनरेटर का इंतजाम भी था, लेकिन उसे थोडी दूर पर रखा गया था ताकि उसकी तेज आवाज से माहौल खराब ना हो। सामने दरी पर ज्यादातर बच्चे बैठे थे। कई लोग खडे थे लेकिन बुजर्ुगों के लिए कर्ुर्सियाँ भी थी। कुछ लोग दूर से भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे।
बम फोडÞने की जीम्मेदारी
सुशील के हर सही उत्तर पर तेज आवाज वाले बम फोडÞने की जीम्मेदारी भाई सुधीर ने अपने कंधों पर ले रखी थी। साथ में रखे लाऊडस्पीकर कार्यक्रम की आवाज दूर-दूर तक पहुँचा रहे थे। पिता अमरनाथ प्रसाद पर्दे के ठीक बगल में एक कर्ुर्सर्ीीर बैठे थे। जैसे ही सुशील फास्टेस्ट फींगर फर्स्ट जीतकर अभिताभ बच्चन के सामने बैठे, हर जगह सीटियाँ बजनी शुरू हो गईं। लोगों ने तालियों से साथ उनका स्वागत किया। जैसे सुशील की जीत उनकी अपनी जीत हो। शुरुआत में सुशील थोडÞा घबराए हुए लगे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने आगे बढÞना शुरू किया। ‘सुशील थोडÞा घबरा रहा था, पर अब स्थिर होकर खेल रहा है’, पिता अमरनाथ ने कहा।
कार्यक्रम में सुशील की बयान की गई कहानी, उनकी मुश्किल जींदगी, उनके संर्घष्ा की मार्मिक कहानी, खुद उनकी ही जुबानी सुनकर लोग खासे भावुक हो जाते थे, लेकिन तालियों के शोर में कोई कमी नहीं आई। सुशील का ये कहना कि उसकी असफलताओं के कारण उनका खुद पर से विश्वास कम हुआ है, उनका खुद से ये पूछना कि क्या उसमें इतनी भी क्षमता नहीं है कि अपना घर बनवा सके, और अपने परिवार की जींदगी में परिवर्तन लाने का जुनून जैसी बातों ने जैसे लोगों की आँखों को नम कर दिया।
भाईयों में अटूट प्यार
सुशील और उनकी पत्नी सीमा के बीच हर्ुइ छींटाकशी पर भी लोग मजे लेकर खिलखिला कर हँस रहे थे। जब लालू यादव की आवाज सुनवाकर सुशील से उसे पहचानने को कहा गया तो लोगों ने लालू यादव कह कर चिल्लाना शुरू कर दिया। सुशील के एक रिश्तेदार ने बताया कि सुशील की कई प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता ने उनके आत्मविश्वास को काफी कम किया था, लेकिन बीबीसी पटना संवाददाता मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि सुशील कुमार की कहानी में एक और गौर करने लायक बात ये है कि सभी भाईयों में अटूट प्यार है और एक दूसरे की चिंता भी जो कि भारतीय समाज में कम होती जा रही है। सुशील का घर अंदर से टूटा-फूटा है। उनके परिवार को मजबूरन एक दूसरे किराए के मकान में रहना पडÞता है। अंदर से करीब आधे से ज्यादा घर की छप्पर टूटी हर्ुइ है। सुशील ने १२.५ लाख का सफर तय कर लिया है। उनके जींदगी के शायद इस सबसे रोचक मोडÞ की बाकी की तस्वीरें कल दिखेंगी।
मोतीहारी में लोगों की जुबान पर सुशील का नाम है। लोगों का कहना है कि सुशील की वजह से लोगों को उनसे बहुत प्रेरणा मिली है। स्थानीय निवासी कृष्ण कुमार कहते हैं कि सुशील की वजह से पढर्Þाई कर रहे बच्चों में एक नई उमंग जागृत हर्ुइ है, कि अगर पढर्Þाई के बल पर सुशील ये सब हासिल कर सकता है तो मैं क्यों नहीं। सुशील के भाई सुधीर बताते हैं कि बच्चों में पढर्Þाई के प्रति जुनून पैदा हो गया है। शिक्षक परमेश्वर प्रसाद सुशील के चचेरे भाई हैं। वो बताते हैं कि सुशील पढÞने में बहुत अच्छे विद्यार्थी नहीं थे, लेकिन काँलेज जाने के बाद उनमें पढर्Þाई के प्रति प्रेम जागा। सुशील ने इंटरमीडिएट दूसरी श्रेणी में पास की, लेकिन बीए उन्होंने फर्स्ट क्लास में पास किया। पोस्टग्रैजुएट भी उन्होंने प्रथम श्रेणी में पास की। नौकरी करने वाले रवि कुमार भी मानते हैं कि पहले लोग काम चलाने के लिए नौकरी या ड्रि्री हासिल कर लिया करते थे लेकिन अब सुशील की जीत के बाद जैसे उन्हें होश सा आया है कि वो जींदगी क्यों बरबाद कर रहे हैं।
प्रहलाद प्रसाद व्यापारी हैं। वो कहते हैं कि आज के दौर में अगर हर घर में ऐसा एक बच्चा हो तो अभिभावकों को कोई कष्ट ही नहीं हो। वो कहते हैं, ‘हालाँकि अभिभावक पढर्Þाई पर जोर देते हैं, लेकिन जो बच्चे भटक जाते हैं, उनके लिए सुशील का जीतना बहुत बडÞा सबक है कि प्रयास कभी मरता नहीं है और कर्म करते रहना चाहिए। अच्छे कर्म का अच्छा नतीजा मिलता है।’ मोतीहारी के कई बच्चों ने हमें बताया कि सुशील की कामयाबी के कारण उन्हें ‘लगने लगा है कि पढर्Þाई का फल मीठा होता है।’
छठ और सुशील की कमी
सुशील के परिवारवालों का कहना है कि ये पहला मौका है कि छठ में सुशील घर पर नहीं है। बीबीसी से मुर्ंबई से बात करते हुए सुशील ने कहा था कि छठ के दौरान परिवार के बीच नहीं होना उन्हें बहुत अखर रहा है। जब ये पूछे जाने पर कि मुर्ंबई में भी तो छठ बहुत धूमधाम से मनाई जाती है, सुशील का कहना था घर में छठ बनाने की बात ही कुछ और है। सुशील के पिता अमरनाथ प्रसाद कहते हैं कि उन्हें सुशील के लिए खुशी तो है लेकिन उन्हें उनकी कमी भी महसूस हो रही है।

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