मोदीः मत जाना मधेश

कुमार सच्चिदानन्द:भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अठ्ठारहवें र्सार्क-सम्मेलन में सहभागिता के उद्येश्य से नेपाल की दूसरी यात्रा की । र्सार्क सम्मेलन  भी सफल रहा और यह यात्रा भी सफल रही । हाथ मिले, दिल भी मिले लेकिन दिल में कुछ टीस भी देकर वे गए । एक बात तो निश्चित है कि नरेन्द्र मोदी का राजनैतिक और राजनयिक पक्ष जितना सशक्त है, उनका धार्मिक पक्ष भी उतना ही सबल है ।

सरकारी पक्ष उन्हे जानकी मंदिर के परिसर में महज कुछ सरकारी नुमाइन्दों के बीच सीमित कर ना चाहता था जबकि आम जनता बारहबीघा के खुले मै दान में उनका अभिनंदन कर ना चाहती थी । टकराव की यही जमीन उनका जनकपुर -भ्रमण स्थगन का कारण बना ।

यह उनके धर्मभावस्नात मन की ही पुकार थी कि अपनी पहली यात्रा में उन्होंने पशुपति दर्शन किया और दूसरी यात्रा में माँ जानकी और महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली की यात्रा करने की इच्छा जतलायी । साथ ही उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा की फेहरिस्त में मुक्तिनाथ का भी नाम था । तीनों ही स्थानों पर उनकी इस यात्रा को लेकर अपार जन-उत्साह था । अपनी पहली यात्रा में मोदी ने परिपक्व राजनय का परिचय देते हुए न केवल नेपाल की जनता का मन जीता वरन भारत के नाम पर विदकनेवाले राजनेताओं के दिलों पर भी अपने प्रभाव का झंडा फहराया । लेकिन भावुकता और मित्रता का यह ताना-बाना इतना गहरा नहीं था जो विश्वास की चादर बन सके । इसलिए सत्ताधारी दलों और उनके नेताओं को इतना भरोसा नहीं था कि मोदी मधेश की संभावित राजधानी में ऐसा कुछ नहीं कहेंगे कि मधेश की अवगुंठित चिंगारी से राख उडÞÞेगी । इसलिए सरकारी पक्ष उन्हें जानकी मंदिर के परिसर में महज कुछ सरकारी नुमाइन्दों के बीच सीमित करना चाहता था जबकि आम जनता बारहबीघा के खुले मैदान में उनका अभिनंदन करना चाहती थी । टकराव की यही जमीन उनका जनकपुर-भ्रमण स्थगन का कारण बना ।
मोदी के इस यात्रा-स्थगन से सरकार खुश-यह सोचकर कि मोदी से मधेश का संवाद नहीं होने दिया, गृह मंत्रालय प्रसन्न यह सोचकर कि मोदी जो कल भारतीय गणतंत्र के प्रधानमंत्री बने, उसके वैश्विक स्तर पर चल रहे वक्तव्यों के अश्वमेध के घोडेÞ की लगाम थामने का साहस और कोई नहीं तो उसका निकटतम पडÞोसी नेपाल तो कर ही सकता है और माता जानकी की धरती पर उनके स्वागत की जिम्मेवारी लिए मंत्री भी खुश कि अपने विवेकशून्य स्वागत गतिविधियों के द्वारा आगामी सरकार में एक अदना मंत्रालय की ग्यारेण्टी तो उन्होंने करा ही ली है साथ ही यह भी संकेत दिया है कि अपने मधेश विरोधी छवि के कारण भविष्य में वे राजनीति के शर्ीष्ा पर पहुँच सकते हैं । लेकिन इन सबके बीच कसक रही तो उन लाखों सीमांचल की जनता के हृदय में जो न केवल मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व से प्रत्यक्ष होना चाहते थे बल्कि भौतिक पर्ूवाधार के आधार पर निहायत पिछडÞे इस क्षेत्र के विकास के प्रखर लौ का भी सपना देख रहे थे । लेकिन हालात तो यह थी ‘हम तो डूबे ही सनम, तुमको भी ले डूबेगे ।’ परिणाम जो हुआ वह जग जाहिर है । न तो भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा हर्ुइ और न ही विकास की किरणें फूटीं । लेकिन जिस डर से मोदी की प्रस्तावित यात्रा को विवादास्पद बनाया गया वह अन्ततः काठमाण्डू के ट्रमा सेण्टर में फूट पडÞा जिसमें उन्होंने इन क्षेत्रों के भ्रमण का निहितार्थ भी प्रकट किया और विकास का एक अवसर इन क्षेत्रों के हाथ से गुमने का भी संकेत दिया ।
Modi (1)एक बात तो साफ है कि मोदी अगर इन क्षेत्रों का भ्रमण करते तो उनकी कुछ योजनाएँ प्रत्यक्ष होती और इसका लाभ इन क्षेत्रों के साथ-साथ किसी न किसी रूप में नेपाल को भी होता ।  लेकिन नेपाल की आन्तरिक राजनैतिक गतिविधियाँ इस ढंग से विकसित हर्ुइ कि कि उन्हें अपनी इस धर्मयात्रा को तत्काल स्थगित करना पडÞा । यद्यपि उन्होंने इन क्षेत्रों की जनता से इस अवसर के खोने के लिए क्षमा माँगी, निकट भविष्य में इस यात्रा को अंजाम देने का वादा भी किया लेकिन कब इसका संकेत न तो उन्होंने दिया और न ही इस मुद्दे पर सरकार की ओर से ही कोई बयान आया । इन समस्त घटनाक्रमों से एक बात तो साफ हो गयी कि मोदी के हाथ नेपाल की ओर सदाशयता से बढÞे हैं जिसका प्रमाण महज कुछ महीनों में हुए दर्जनों समझौते हैं । मगर हमारी आन्तरिक राजनीति आशंकाओं के मकडÞजाल में इतना उलझी है कि वह अवसर और मौके को समझ नहीं पाती ।
भारतीय प्रधानमंत्री की प्रस्तावित यात्रा को विवादास्पद बनाने में चाहे नेपाल सरकार का जो दृष्टिकोण रहा हो लेकिन तर्राई में इसकी काफी नकारात्मक प्रतिक्रिया हर्ुइ । अपनी ही सरकार के प्रति वीरगंज से लेकर जनकपुर तक पर््रदर्शन हुए, झडÞपें हर्ुइ और कुछ मंत्रियों के पुतले भी फूँके गए । जो दीवानगी लोगों में मोदी को लेकर देखी गई वह देश के नेताओं के प्रति भी ‘नभूतो नभविष्यति’ की अवस्था जाहिर कर रही थी । कारण स्पष्ट था कि तीव्र विकास की रोशनी से कोसों दूर नेपाल और उसमें भी मधेश की धरती न केवल उन्हें विकासपुरुष के रूप में देख रही थी बल्कि उनके व्यक्तित्व की उदात्तता और वाणी का ओज भी उन्हें प्रभावित कर रहा था । इसलिए आमलोग न केवल विकास की दृष्टि से उनके स्वागत के लिए तैयार थे बल्कि राजनेता के रूप में लोकप्रियता के वैश्विक मानदण्ड को छू रहे श्री मोदी को अपनी आँखों के समक्ष देखना और सुनना चाह रहे थे । इसमें न केवल नेपाल वरन भारत के सीमांचल की जनता भी थी । लेकिन नेपाल सरकार के अदूरदर्शी कदमों के कारण भावना और विकास का यह अवसर हाथ से गया । जैसा कि ट्रमा सेण्टर के उद्घाटन के क्रम में उन्होंने कहा भी कि वे सडÞक मार्ग से यात्रा इसलिए करना चाहते थे वे स्वयं अनुभव करना चाहते थे कि नेपाल और भारत से यहाँ आने वाले नागरिकों को क्या समस्या होती है और इसका समाधान क्या हो सकता है ।IMG_20141127_175239 IMG_20141127_175740
मोदी की इस यात्रा को विवादास्पद बनाने के पीछे चाहे सरकार का जो भी दृष्टिकोण रहा हो मगर आमलोगों की धारणा साफ है कि नेपाल के सरकारी तंत्र में मधेश के प्रति जो आन्तरिक औपनिवेशिक भावना भरी हर्ुइ है, जिसकी चर्चा तक विगत दौरे में भारतीय प्रधानमंत्री ने नहीं की थी, वह न कहीं मोदी के मुँह से फूट न पडÞे । मधेश में आन्तरिक स्तर पर अपनी राजनैतिक-सांस्कृतिक पहचान की स्थापना की जो भावना सुलग रही है, भूले से उसका ज्रि्र  न मोदी के मुँह से हो जाए । सही मायने में हमारे राजनेता इस बात को भूल गए थे कि भारत के संसदीय आमचुनावों में प्रचार अभियान का नेतृत्व करते हुए श्री मोदी ने रिकार्ड रैलियों और आमसभाओं को संबोधित किया, सपने भी बाँटे और विपक्षियों पर प्रहार भी किया लेकिन कहीं भी अपने वक्तव्यों के कारण विवादों के घेरे में नहीं आए । आज विश्व के र्सवाधिक लोकप्रिय नेता के रूप में उनकी छवि विकसित हर्ुइ है तो उसमें उनके संतुलित वक्तव्य, शीघ्र निर्ण्र्ााऔर्रर् इमादार प्रयास का योगदान है । शायद हमारा शासन तंत्र इस बात को नहीं समझ पाया कि मोदी एक सावधान वक्ता हैं और उन्होंने अगर बोलने की सोच ली है तो बोलेंगे ही, धरती चाहे जनकपुर की हो या काठमाण्डू की, दिल्ली तो उनकी अपनी धरती है ही  । यह बात तो जाहिर है कि जिस भय से सरकार भाग रही थी वह अन्ततः ट्रमा सेण्टर में फूट ही पडÞा जहाँ मधेश की भी बात हर्ुइ और माओवादियों की भी ।
अपनी पिछली यात्रा में मोदी ने न तो मधेश की चर्चा की थी और न ही मधेशी दलों के नेताओं से एकाकी बातचीत ही की थी जिसके कारण एक निराशा की स्थिति मधेश में भी व्याप्त हर्ुइ थी । यह नेपाल की पारम्परिक राजनीति और सरकार के लिए सकारात्मक इसलिए था क्योंकि मधेश के प्रति इनके दृष्टिकोण में एकाधिक आन्दोलन और दर्जनों शहादत के बाद भी कोई परिवर्त्तन नहीं आया । पिछली संविधानसभा में मधेशी दलों की घोर पराजय से मौजूदा सरकार और उसमें सहभागी दल एक तरह से यह मान बैठे हैं कि मधेश के मुद्दे लगभग समाप्त हो चुके हैं । सघीयता सम्बन्धी उनके संयुक्त प्रस्ताव का जो खाका सामने आया है उसका निहितार्थ भी यही है । इन दलों को आशंका थी कि सडÞकमार्ग से मधेश की यात्रा के बाद मधेश का सच उजागर हो सकता है और श्री मोदी की जो सोच मधेश निरपेक्ष नेपाल का आया है, वह परिवर्तित न हो जाए तथा ‘मधेश और मधेशी शब्द’ उच्चरित कर वे यहाँ का सारा खेल न बिगाडÞ दें । लेकिन ट्रमा सेण्टर के उद्घाटन के क्रम में श्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि ऐसा संविधान बने जिसमें नेपाल के हर कोने में रह रहे लोगों को लगे कि उसके भी फूल की खुशबू इस संविधान रूपी गुलदस्ते में है । कभी मधेशियों को न लगे कि उसे पूछनेवाला कोई नही और कभी पहाडिÞयों और माओवादियों को भी न लगे कि उसे भी पूछनेवाला कोई नहीं । संबिधान इस तरह का बने जिसमें हर आदमी की आवाज, आकांक्षा और सपना हो । इसके लिए उन्होंने सहमति के द्वारा संविधान बनाने की बात कही और यह नसीहत भी दी कि अगर बहुमत के द्वारा संविधान बनता है और पहले प्रारूप में सबको अपनत्व का एहसास नहीं होता तो बडÞी कठिनाई सामने आ सकती है । इस कठिनाई को सरकार और संख्या के दंभ पर राजनीति करनेवाले किस रूप में लेते हैं, कहा नहीं जा सकता लेकिन जमीनी हकीकत यही है और इसका ज्ञान एक मित्र राष्ट्र का प्रतिनिधि होने के नाते उन्होंने करा ही दिया है । अब यह हम पर निर्भर करता है कि इसे हम कूटनैतिक मर्यादा का उल्लंघन माने या शालीन सलाह ।
दूसरी ओर लुम्बिनी का भ्रमण स्थगित होने के पीछे इन कारणों के अतिरिक्त विदेशी प्रभाव की चर्चा भी संचारतंत्र और सामाजिक संजाल में है । कहा गया है कि भारत के सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य जयदेव राणाडे चीन के बढÞते प्रभाव के कारण भारतीय प्रधानमंत्री का लुम्बिनी भ्रमण स्थगित होना मानते हैं । उनका मानना है कि चीन का यह दृष्टिकोण रहा है कि अगर भारतीय प्रधानमंत्री का लुम्बिनी भ्रमण होता है तो वहाँ भारत का प्रभाव बढÞेगा, चीन की योजनाएँ कमजोर होंगी जो उसे गँवारा नहीं । भारतीय मंत्रीमंडल के पर्ूव सहसचिव और नई दिल्ली स्थित चाइना एनलाइसिस सेण्टर के अध्यक्ष रह चुके श्री रणाडे का यह भी मानना है कि नेपाल में चीन का प्रभाव सीमाओं का अत्रि्रमण कर रहा है । इसलिए नेपाल को दी जानेवाली सुविधाओं की कटौती के साथ-साथ काठमाण्डू को सावधान करने की अनुशंसा भी उन्होंने सरकार से की है । वे वर्त्तमान सरकार के अर्थ, संचार और परराष्ट्र मंत्रियों को मोदी की यात्रा स्थगन का जिम्मेवार मानते हैं । मोदी केी मुक्तिनाथ की यात्रा के सम्बन्ध में तो पहले ही यह समाचार प्रकाश में आया था कि चीन के कूटनैतिक नियोग ने अनौपचारिक रूप से इस यात्रा के प्रति अपनी असहमति जतलायी थी ।
इन सारे परिदृश्यों को देखते हुए यह तो माना जा सकता है कि श्री मोदी की लुम्बिनी और मुक्तिनाथ को लेकर नेपाल की सरकार चीन के कूटनैतिक दबाब में थी और जनकपुर यात्रा के सर्ंदर्भ में वह मधेश के मुद्दे को लेकर दबाब में थी । यात्रा स्थगित कराना उनका उद्येश्य था, बहाना बना जनकपुर में उनका नागरिक अभिनंदन और र्सार्वजनिक संबोधन । इसलिए कहा जा सकता है कि योजित रूप में इसे विवादास्पद बनाया गया । इससे सरकार को लाभ क्या हुआ यह अलग समीक्षा का विषय है मगर ट्रमा सेण्टर मे दिए गए मोदी के वक्तव्यों का रंग नेपाल की राजनीति में देखा जाने लगा है । र्सार्क सम्मेलन के लिए मोदी के नेपाल आगमन की पर्ूव संध्या में पुनर्जीवित राष्ट्रीय मधेशी मोर्चा एक छतरी के नीचे से अपनी आवाज बुलंद करने लगे हैं । नेकपा माओवादी नेता मोदी की सलाह समझने की नसीहत सरकार को देने लगे हैं । जो सरकार अब तक सहमति सफल न होने पर बहुमतीय प्रक्रिया द्वारा संविधान निर्माण के लिए संकल्पबद्ध दिखलाई दे रही थी, आज राष्ट्रीय सरकार का लाँलीपाँप  बाईस दलीय मोर्चा को दिखला रही है । सरकार में सहभागिता या वर्जना का मुद्दा तो अलग है मगर कवायद शुरू है ।
नेपाल का जो मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य है उससे साफ है कि आगामी ८ गते, माघ तक संविधान का आना अनिश्चित है क्योंकि इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अब तक संविधान का मसौदा र्सार्वजनिक हो जाना चाहिए था मगर सहमति हो नहीं पा रही और बहुमतीय प्रक्रिया में जाने पर अलग तरह की चुनौतियाँ है जिसे झेलने के लिए सरकार मानसिक रूप में तैयार नहीं । दूसरी ओर जो शक्तियाँ अब तक हाशिये पर थी उसमे नई ऊर्जा देखने के मिल रही है । एक बात तो तय है मौजूदा सरकार के अब तक जो कदम रहे हैं उससे स्पष्ट होता है कि उनके एकांगीक निर्ण्र्ााें से उत्पन्न होनेवाली परिस्थितियों के प्रति वे भी संवेदनशील नहीं हैं । एक ओर राज्यों के विभाजन सबन्धी जो खाका उनके द्वारा सामने आया वह तो विवादास्पद बना ही दूसरी ओर सरकार ने ६१  नगरपालिकाएँ सृजित करने का निर्ण्र्ाालेकर एक तरह से स्थानीय निकायों के चुनाव की ओर कदम बढÞा दिए हैं और राष्ट्रीय सहमति की सरकार की बात भी इन्हीं चुनावों के मद्देनजर सामने आयी है । सवाल यह है कि अगर सबकुछ हम अन्तरिम संविधान के द्वारा ही कर लेते हैं तो संविधान की जरूरत क्या है और फिर सहमति या बहुमत का अरण्य रोदन क्यों है –
बात साफ है कि सरकार संविधान-निर्माण के प्रति गंभीर नहीं है, इसलिए समस्याओं को सुलझाने की बजाय उलझाने की दिशा में अग्रसर है । संघीयता, शासकीय स्वरूप और अन्ततः मोदी की तीनो धर्मयात्राओं को जिस तरह विवादास्पद बनाया गया वह इसी विचारधारा की पुष्टि करते हैं । अब दोनों पक्षों में जो खींचातानी की अवस्था है उसके आधार पर माना जाए कि क्या इनके बीच समझौते लेनचैर या दिल्ली में होंगे । आज नेपाली राजनीति के जो पक्ष यह कहते हैं कि हम उत्तर-दक्षिण के सिवा राज्यों का विकल्प नहीं दे सकते उन्हें समझना चहिए कि लोकतंत्र समष्टि में विश्वास करता है और यहाँ जनाकाँक्षा महत्वपर्ूण्ा होती है । इसका सम्मान होना चाहिए । संविधान निर्माण के लिए  मोदी के  अनुसार ऋषिमन की आवश्यकता है । इसके अभाव में बनाया गया संविधान र्सवमान्य नहीं हो सकता । अब तो मोदी फैक्टर ने भी काम करना शुरू कर दिया है, बहाना बना जानकी की जन्मभूमि जनकपुर । अब देखना है कि होता है क्या –

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