मोदी की चीन यात्रा और नेपाल: कुमार सच्चिदानन्द

kumar sachitanandश्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में एक वर्ष की यात्रा पूरी की । इस अवधि में राष्ट्र–निर्माण की दिशा में वे और उनकी सरकार ने अनेक कदम उठाए । लेकिन विदेशों में भारत की शक्ति, सामथ्र्य, सम्मान और संभावना के उद्घोष का उनका अभियान जारी है । इस एक साल की अवधि में उन्होंने लगभग अठ्ठारह देशों की यात्रा की । यह भी सच है कि चीन और भारत दो पारम्परिक दोस्त और दुश्मन हैं लेकिन अतीत के दुखदायी अनुभवों को ठण्डे बस्ते में डालकरं विगत सोलह से उन्नीस मई तक उन्होंने चीन की यात्रा की । इस यात्रा में उनका भरपूर स्वागत–सत्कार हुआ, द्विपक्षीय राजनैतिक एवं व्यापारिक समझौते हुए । लेकिन सन् १९६२ के भारत–चीन युद्ध के अविश्वास की काली छाया सम्पूर्ण यात्रा में विद्यमान रही । सीमा समस्या के समाधान की चर्चा तो हुई लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए । गौरतलब है कि सीमा सम्बन्धी मुद्दे आपसी सम्बन्धों के प्रमुख आधार होते हैं लेकिन ये पहलू लगभग अनछुए ही रहे । महत्वपूर्ण यह है कि इसको हाशिए पर रख दोनों ही देशों ने समय की नब्ज को समझते हुए अग्रगामी कदम बढाए । ये कदम अपने लिए उत्पादन और बाजार तलाशने की दिशा में है । यह सच है कि ये दोनों देश एशिया की दो महाशक्तियाँ हैं और विश्व का सबसे बड़ा बाजार भी । इसलिए सामरिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टियों से पूरे विश्व की नजर इन पर है । यही वह बिन्दु जहाँ खड़े होकर ड्रैगन और बाघ एक दुूसरे को अंकमाल करने की अवस्था में हैं ।For Kumar Sachidanand (2) For Kumar Sachidanand (3) For Kumar Sachidanand (4) For Kumar Sachidanand (1)
यह सच है कि नेपाल इन दो महाशक्तियों के बीच भौगोलिक दृष्टि से एक छोटा सा भूपरिवेष्ठित राष्ट्र है । राजनैतिक अस्थिरता के साथ–साथ विनाशकारी प्राकृतिक आपदा के कुप्रभावों को भी यह झेल रहा है और आगामी चार पाँच वर्ष इस देश के लिए अत्यधिक चुनौतीपूर्ण हैं । क्योंकि एक ओर इसे एक सम्यक् अ।ैर संतुलित संविधान देकर भेदभावमुक्त और समरस समाज निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाने की चुनौती है तो दूसरी ओर महाभूकम्प के महाविनाश के कुप्रभावों से देश को निकालने और विस्थापितों के पुनर्वास की कठिन चुनौती से भी इसे जूझना है । इसके लिए अर्थ संकलन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है क्योंकि आन्तरिक स्रोत–संसाधन की बदौलत यह देश इस समस्या से उबरने में सक्षम नहीं । इसलिए राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर सरकार संसाधन जुटाने का अभ्यास कर रही है । लेकिन इन सब के साथ यह भी आवश्यक है कि देश का आर्थिक विकास पर इसका कुप्रभाव नहीं पड़े । भारत और चीन के सुधरते व्यापारिक समबन्धों से यह अपेक्षा की सकती है कि नेपाल भी इस अवसर का लाभ उठा सकेगा । लेकिन इसके लिए जिस तरह की कूटनैतिक दूरदर्शिता और प्रौढ़ता की जरूरत महसूस की जा रही है वह यहाँ के राजनैतिक वृत्त में नहीं देखी जा रही है । चीन और भारत को दो ध्रुवों पर खड़ा कर राजनेता और राजैतिक दल अपना स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश करते हैं और इस अन्तर्विरोध को हवा देकर यहाँ का संचार तंत्र अपना बाजार ढूँढता है । निश्चय ही द्विपक्षीय–त्रिपक्षीय सम्बधों की दिशा में यह सबसे बडा घातक मनोविज्ञान है । इस बात को समझा जाना चाहिए कि अगर हमें कुछ प्राप्त करना है तो दाता के हृदय में संवेदना जगाने की पहल होनी चाहिए । घृणा के मेघ से सहयोग की बूँदें तो नहीं ही बरस सकती ।
अनेकता के विभिन्न आयाम हैं । जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और देशकाल की सीमाएँ हमें विभाजित करतीं हैं । महानता इस बात में है कि सीमाओ से ऊपर उठकर हम उस साझा तन्तुओं की तलाश करें जो हमें एक सूत्र में बाँध सके । भारतीय प्रधानमंत्री श्री मोदी ने अपनी विगत चीन यात्रा में बोधि वृक्ष का पौधा चीनी राष्ट्रपति सी जिनपिंग को भेंट किया । देखने में यह सहज सी घटना लगती है लेकिन यह उस सांस्कृतिक विरासत को याद करना है जो कभी भारत और चीन को एक कड़ी में जोड़ता था । श्यान शहर से अपनी यात्रा प्रारम्भ करने के उनके दो निहितार्थ थे । प्रथम कि अहमदावाद की तर्ज पर यह चीनी राष्ट्रपति का  गृहनगर था, दूसरा कि इस शहर का सम्बन्ध प्रख्यात चीनी यात्री ह्वेनसांग से था जिसका भारत से ऐतिहासिक रिश्ता रहा है । रिश्तों के इस ऐतिहासिक जंगल में भटकने का अर्थ उनके लिए निश्चय ही यह रहा है कि इसके द्वारा एक ओर तो देश की सांकृतिक गरिमा का अन्तर्राष्ट्रीयकरण करना वे चाहते हैं, दूसरी ओर इस सांस्कृतिक सूत्र में विरोधियों को भी बाँधने का प्रयत्न करते हैं ।
नेपाल में एक वर्ग ऐसा है जो मानता है कि नेपाल के आन्तरिक मामलों में भारत का अनापेक्षित हस्तक्षेप होता रहा है । इस आशंका से राजनैतिक दल भी प्रभवित होते हैं और इसी को सकारात्मक रूप में लेते हुए देश में अलोकतांत्रिक शक्तियाँ व्यवस्था परिवत्र्तन की कपोल कल्पना करती नजर आती हैं । गौरतलब है कि भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है । चीन के प्रति अगर वह सशंकित है तो मात्र इसलिए नहीं कि उसके साथ उसके युद्धजन्य अतीत रहे हैं बल्कि इसलिए भी कि वहाँ एक गैर लोकतांत्रिक सरकार है । लोकतांत्रिक शक्तियों का सबलीकरण भी चीन के लिए दबाबमूलक हो सकता है । इसके लिए यह भी आवश्यक है कि लोकतांत्रिक शक्तियों का सम्यक् विकास भी हो । यह लोकतंत्र और विकास का मिश्रण चीन की जनता में लोकतंत्र के प्रति आकर्षण और विश्वास पैदा कर सकता है । यही कारण है कि चीन के बाद उन्होंने मंगोलिया की यात्रा की जहाँ संघीय गणराज्य है और वहाँ की ९५ फीसदी जनता बौद्ध है । उन्होंने न कवल मंगोलिया की यात्रा की वरन उन्हें आर्थिक सहयोग भी किया । इसका निहितार्थ यही है कि एक ओर तो वे लोकतांत्रिक शक्तियों की सफलता और विकास चाहते हैं और दूसरा कि बदले हुए सन्दर्भों में सम्राट अशोक के ‘धम्मविजय’ की नीति पर कदम बढ़ाते नजर आते हैं । मंगोलिया की यात्रा से उन्होंने चीन को यह भी संकेत दिया है कि अगर भारत के प्रभाव क्षेत्र के देशों में चीन अपनी गतिविधियाँ बढ़ाता है तो उसके प्रभाव क्षेत्र के देशों में भारत भी अपनी भूमिका का विस्तार कर सकता है । फिर नेपाल के साथ भारत का सम्बन्ध धार्मिक और सांस्कृतिक के साथ–साथ अनेक आयामी हैं । इसलिए यहाँ लोकतांत्रिक शक्तियों का अशक्तिकरण उसका उद्देश्य ही नहीं हो सकता ।
आज विश्व का राजनैतिक परिदृश्य बदल रहा है । शीतयुद्ध की काली छाया से विश्व निकल चुका है और बाजारवाद के प्रभाव में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के समीकरण बनते और बिगड़ते हैं । इसलिए विदेशनीति को तरल और प्रवाहमय बनाने की आवश्यकता है । यह सच है कि प्रत्यक्ष रूप से कोई ध्रुव हमें देखने को नहीं मिलता लेकिन आर्थिक और सामरिक दृष्टिकोण से नए समीकरण तो बनने और विगड़ने लगे हैं । खासकर यूक्रेन का रूस में विलय के बाद यह प्रक्रिया तीव्र हुई है । ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियाँ जो अमेरिका के बढ़ते दबदबे से स्वयं को कुण्ठित महसूस कर रही थी, आज रूस की ओर आकर्षित हुई है । लेकिन ऐसे भी देश हैं जो चीन के बढ़ते दबदबे से आशंकित हैं । जापान और वियतनाम आदि को हम इसी श्रेणी में गणना कर सकते हैं । स्वाभाविक रूप से ये अमेरिका के अधिक करीब हैं । भारत उभरती हुई एशियायी शक्ति है । चीन के साथ उसके गहरे सांस्कृतिक सम्बन्ध तो रहे हैं लेकिन चीन के द्वारा की गयी ऐतिहासिक भूल की पीड़ा तो उसके मन में अभी भी बरकरार है । इसके बावजूद समय की आवश्यकता को समझते हुए भारत चीन के साथ सम्बन्धों को सुधारते हुए आर्थिक मोर्चे पर अनेक समझौते कर रहा है । ऐसा भी नहीं है कि वह चीन से डरा हुआ है और ऐसा भी नहीं कि वह चीन को घेरने की कोशिश कर रहा है । वस्तुतः तीव्र विकास की गति प्राप्त करने के लिए दोनों देश एक दूसरे के पूरक के रूप में आगे बढ़ना चाहते हैं और इस शताब्दी को एशिया की शताब्दी में बदलने के लिए दोनों समभाव से काम करना चाहते हैं ।
भारतीय पं्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की विगत चीन यात्रा में दोनों पक्षों के बीच जो व्यापारिक आर्थिक समझौते हुए हैं, उससे यह बात तो बिल्कुल साफ है कि आपसी असहमतियों को दरकिनार कर ये दोनों ही देश आगे बढ़ना चाहते हैं । नेपाल की स्थिति इन दोनों राष्ट्रों के बीच भूपरिवेष्ठित राष्ट्र की है । चीन और नेपाल की सीमा पर विशाल हिमालय पर्वतमाला अपनी सम्पूर्ण दुरूहताओं के साथ खड़ी है जो दोनों देशों के बीच स्थिति को सहज होने नहीं देती । दूसरी ओर भारत के साथ तीन ओर से इसकी सीमाएँ खुली हैं और दोनों देशों के नागरिकों का अबाध अवागमन होता है । हमारी राजनीति शब्दों में तो इस यथार्थ से वाकिफ दिखलाई देती है मगर व्यवहार में इससे पूर्णतया अनभिज्ञ दिखलाई देती है । यही कारण है कि नेपाल के प्रति भारत के हर कदम को विवादास्पद बना दिया जाता है । इसमें यहाँ के राजनीतिज्ञों के साथ–साथ यहाँ का संचार तंत्र भी महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करता है । गौरतलब है कि सम्बन्धों को अगर सुदृढ़ करना चाहते हैं और उसे गतिशील दिशा भी देना चाहते हैं तो विषवमन को रोकना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए । बाजार को नजर में रखकर राजनीति और संचार का व्यापार अगर हम चलाना चाहते हैं तो यह प्रवृत्ति सम्बन्धों को गतिशीलता प्रदान नहीं कर सकती । एक सकारात्मक पक्ष यह है कि कि जिस तरह नेपाल क संचारतंत्र भारत विरोध का मिशन चला रहे हैं और पिछले दिनों जिस तरह इन्होंने भारतीय संचार तंत्र पर प्रहार किया, अगर इस मोविज्ञान से भारतीय संचारतंत्र भी संचालित हो ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो सकती है जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते ।
नेपाल में कुछ मीडिया हाउस सक्रिय हैं जिनका उद्देश्य भारतविरोधी प्रोपगंडा करना है । ऐसे हाउसों से सम्बन्धित जो अखबार हैं मोटे तौर पर उसके किसी भी पन्द्रह दिनों का अंक उठाकर देखा जाए तो उसमें दो–चार भारत विरोधी लेख मिल ही जाएँगे । निश्चित है कि इसके लिए इन संचार तंत्रों ने लेखकों को पाल रखा है । इनका प्रमुख उद्देश्य होता है कि भारत के साथ भ्रम पैदा कर लोगों को गुमराह करे । यह स्थिति आज से नहीं लगभग तीस वर्षाेंं से चली आ रही है । लेकिन नेपाल में मोदी के इस भाषण ने तीस साल के इस अथक प्रयास पर पानी फेर दिया । नेपाल की जनता मोदी की उदार भावना पर मुग्ध हो गई । इस बात से नेपाल में भारत विरोधी सम्पूर्ण तंत्र बौखलाए हुए थे । एक बार फिर जब महाभूकंप के बाद मोदी सरकार ने नेपाल के दर्द को समझा और त्वरित रूप से उद्धार और राहत की दिशा में युद्ध स्तर पर ‘ऑपरेशन मैत्री’ प्रारम्भ किया और आम लोग भारत के इन सदाशयता भरे सहयोग की प्रशंसा करने लगे तो इन्हें अपना जाल टूटता हुआ नजर आया । इसलिए इन्होंने इस अवसर का भी उपयोग भारत को आरोपित करने के लिए किया । कुछ हजार पाठक भी इस बहकावे में आ गए । आम नेपालियों पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा । इन्होंने फिर पैतरा बदला और सारा दोष भारतीय मीडिया पर मढ़ दिया । सामाजिक संजाल पर एक बहस ही चल पड़ी और सीमाओं को लाँघती हुई आलोचनाएँ देखने और पढ़ने को मिली । कुछ भारतीय पत्रकार भी इस भ्रम को हवा दे रहे थे । इससे स्पष्ट है कि ये शक्तियाँ किसी न किसी रूप में और कहीं न कहीं से संचालित हैं । नेपाल के सरकार की चुनौती यह है कि वे सम्बन्धों की नजाकत को समझे और स्थिति को प्रतिकूल होने से बचाने का प्रयास करे ।
इन सम्पूर्ण विवादों में सत्ता की बागडोर सँभाले कुछ वरिष्ठ राजनीतिज्ञ भारत विरोधी नेपाली मीडिया का बचाव करते नजर आए । यह आरोप मढ़ा कि भारतीय हेलीकॉप्टरों ने नेपाल के पत्रकारों को तरजीह नहीं दी । यह उनकी अपनी सीमा और कार्यप्रणाली हो सकती है लेकिन यह तो माना जा सकता है कि अपेक्षाकृत तकनीकी सुविधा सम्पन्न भारतीय संचारतंत्र की सक्रियता से भूकंप पश्चात नेपाल की स्थिति की भयावहता का अन्तर्राष्ट्रीयकरण हो पाया था और त्वरित रूप से विश्व के अनयान्य देश बचाव और राहत के लिए यहाँ पहुँच सके थे । दूसरा पक्ष यह है कि भारतीय हेलीकॉप्टर उद्धार और राहत में नेपाल की सेना की सहायता करने के लिए आए थे और उसी के साथ समन्वय भी कर रहा था । भारतीय समाचार तंत्र समाचार संकलन के लिए आए थे । दोनों सन्यंत्र एक ही देश के थे इसलिए इनमें समन्वय के सूत्र तो हो ही सकते थे लेकिन समाचार संकलन करवाना इनका उद्देश्य नहीं था ।
नेपाली राष्ट्रीयता का उद्गम स्रोत गोरखा माना जाता है । अगर शब्दों के रूप परिवर्तन पर विचार करें तो ‘गोरक्षा’ शब्द से इसकी व्युत्पत्ति मानी जा सकती है जिसका अर्थ ही गायों की रक्षा करना होता है । पाकिस्तान ने राहत सामग्री में गोमांस का मसाला भेजा था जिसे भारतीय चैनलों ने अपनी सुर्खियाँ बनायीं यह उनकी अपनी सोच थी । गौरतलब है कि भारत–पाक की सीमा पर अमन हो या कोहराम, मनोवैज्ञानिक रूप में इन दोनों देशों में युद्ध का मनोविज्ञान होता है । इसलिए भारतीय समाचार तंत्र अपने देश के दर्शकों के लिए समाचार प्रस्तुत कर रहे थे । यह अलग बात है कि महाभूकंप के बाद चार दिनों तक नेपाल में भारतीय समाचार चैनल प्रमुखता से देखे गए क्योंकि विनाश की वास्तविक स्थिति तक इनकी पहुँच ही नहीं थी । इसलिए हीनता–बोध के मनोविज्ञान में इस तंत्र ने भारतीय मीडिया पर पलटवार किया । समझा जा सकता है कि इस प्रवृत्ति का कारक तत्व क्या है और इस पर प्रभाव किसका है ?
इन अर्थहीन विवादों के बावजूद नेपाल के सन्दर्भ में मोदी की चीन यात्रा का एक सकारात्मक पक्ष यह रहा है कि महाभूकम्प के महाविनाश की त्रासदी से निबटने में भारत और चीन दोनों पक्षों ने मिलकर नेपाल को सहयोग करने की प्रतिबद्धता जाहिर की है और सड़क मार्ग से होनेवाले भावी भारत–चीन व्यापार में नेपाल को भी शामिल करने पर सहमति जतलायी है । इसे नेपाल के विदेश नीति की विफलता ही कही जाएगी कि भारत और चीन के बीच होने वाले व्यापार का ट्रांजिट प्वाइंट नेपाल को बनाने के लिए नेपाल की ओर से कई बार बात रखी गई थी मगर इसकी उपेक्षा कर भारत और चीन ने सीधे सड़क मार्ग से जुड़ने का निर्णय लिया है ।
एक बात तो तय है कि भारत और चीन के सम्बन्धों का अपना इतिहास, अपनी आवश्यकताएँ और अपनी चुनौतियाँ हैं । इसे बनाने–बढ़ाने में वे वैश्विक सन्दर्भों में अपनी स्थिति की व्याख्या तो कर सकते हैं मगर नेपाल इसमें कहीं नहीं आता । चूँकि दोनों देशों द्वारा यह भूपरिवेष्ठित राष्ट्र है इसलिए सम्बन्धों को समभाव से व्याख्यायित करना इसकी आवश्यकता है । लेकिन एक की शत्र्त पर पर दूसरे से निकटता या दूरी का पत्ता फेंकना एक तरह से असफल विदेशनीति का ही परिणाम माना जाना चाहिए । आज देश संकट में है, विध्वंश हमारा यथार्थ है, सहयोग हमारी आवश्यकता है । इसके लिए नीतिगत संतुलन समय की माँग है । सस्ती लोकप्रियता के लिए अर्थहीन आलोचनाओं को प्रश्रय देना हमारे लिए विधायी नहीं हो सकता ।

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