मोदी के आने की आहट पाक की बेचैनी, नेपाल की उम्मीदें

डा. श्वेता दीप्ति:मित्र राष्ट्र भारत में चुनावी समर की घोषणा हो चुकी है । सभी छोटी-बडी पार्टियाँ रणभूमि में उतर चुकी हैं । जनतंत्र से लेकर संचारतंत्र तक चुनावी बुखार से पीडिÞत है और इस मौसमी बुखार का असर हर ओर दिखाई दे रहा है । इससे हम कैसे अछूते रह सकते हैं क्योंकि, पडÞोसी देश की हवा का असर तो हम पर भी कुछ कम नहीं होता है । यहाँ अगर छींक भी आती है तो दोष उधर से आनेवाली हवा के मत्थे ही मढ जाता है । खैर, भारत के चुनावी नब्ज को पकडÞने की कोशिश सिर्फराजनीतिज्ञ ही नहीं नेपाल की आम और खास दोनों प्रकार की जनता कर रही है ।
भारतीय राजनीति के पटल पर पिछले एक वर्षसे जो उथल-पुथल मची हर्ुइ है और अरविंद केजरीवाल जिस तरह आम आदमी पार्टर्ीीे नेता बनकर सामने आए हैं, वह भारत या नेपाल ही नहीं विश्व के लिए भी दिलचस्पी का विषय बना हुआ है । आम जनता की बातें करें तो, उन्हें केजरीवाल और उनकी बातें अच्छी लग रही हैं, या यूँ कहें कि जनता की दुखती रग को पकडÞ कर केजरीवाल नायक बने हुए हैं । किन्तु नायक बनना और नायकत्व निभाना और बात है । ‘आप’ सशक्त रूप में उभर कर सामने तो आ रही है, किन्तु वह भी जानती है कि अभी केन्द्रीय शक्ति बनने की स्थिति में वह नहीं है । इसलिए वह महज सौ सीटों की ही कल्पना कर रही है । इसके लिए अभी वह सिर्फदूसरों की कमजोरियों को दिखा रही है, उन कमजोरियों का ‘आप’ दूर कैसे करेगी यह फिलहाल उन्हें पता नहीं है । यह पार्टर्ीीफलहाल दिशाहीन कुनबे की तरह है, जिसके पास जनता से मिले अपार र्समर्थन का जोश तो है, मगर कोई मजबूत राजनीतिक सोच एवं रणनीति नहीं है । modi 3d
लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि जनता अर्श से र्फश तक पहुँचाने का दमखम रखती है और जीत का खुमार भी उतार सकती है । यह भी एक सच है कि जनता भावना में बहती है, और यह कई बार चुनावी मैदान में सिद्ध भी हो चुका है । एक समय था जब भारत, गाँधी परिवार से इस कदर भावनात्मक रूप में जुडÞा था कि उन्हें उनके द्वारा की गई गलतियाँ भी नजर नहीं आती थी । वो शायद इसलिए कि कई वर्षों से गुलाम भारत ने जो आजादी की साँस ली थी, उसमें इस परिवार का जो योगदान था, वह अविस्मरणीय था । जिसका फायदा आज तक उन्हें मिलता रहा है । किन्तु अब हवा बदल चुकी है आज की पीढÞी अधिक व्यवहारिक है और वह जिन समस्याओं से जूझ रही है उसे वह नजरअंदाज कर ही नहीं सकती, उनका मोह भंग हो चुका है । दूसरी ओर भाजपा भी भावनाओं से खेलती आई है, पर आज भाजपा की नहीं, मोदी की लहर है । ऐसे में ‘आप’ भी कमोवेश भावनाओं के हथियार का ही प्रयोग कर रही है, तो क्या आज जनता अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर उसके साथ भावनाओं में बहेगी – उन्हें नया प्रयोग चाहिए या स्थायीत्व – यह फैसला उन्हें स्वयं करना है ।
विश्व का दूसरा बडÞा चुनाव भारत में होने जा रहा है । अनुमान है कि इस बार के चुनाव में लगभग ३०हजार करोडÞ खर्च होंगे । चुनाव में कार्पोरेट जगत की संलग्नता स्पष्ट रूप में साबित हो चुकी है । सेंटर फोर मीडिया स्टडीज के अध्ययन से यह पता चला है कि ५४३ साँसदों को चुनने में आए खर्च का ग्राफ इसलिए बढÞा है कि  कार्पोरेट जगत इसमे पैसा पानी की तरह बहा रहा है । बात चाहे जो भी हो, प्रत्यक्ष रूप में यह भले ही नजर नहीं आता है कि यह मार आम जनता पर ही पडÞ रही है किन्तु, यह सच है कि कमर तो इनकी ही टूटती है ।
भारत की चर्चा हो और उसके पडÞोसी पाकिस्तान की चर्चा न हो तो चर्चा अधूरी लगती है । इस्लामाबाद के हफीज चाचडÞ के रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में जहाँ भी मोदी की चर्चा होती है, उसमें अजीबोगरीब बातें निकलकर सामने आती हैं । देश में सबसे नकारात्मक छवि उन्हीं की है । आम धारणा है कि मोदी सबसे ज्यादा विवादास्पद और मुस्लिम विरोधी नेता हैं । गुजरात दंगों में मुसलमानों की हत्या के लिए उन्हें ही दोषी माना जाता है । इसके अलावा यह बात भी उभर कर आ रही है कि अगर मोदी सत्ता में आते हैं तो भारत पाक रिश्तों में और भी मजबूती आएगी । पाक सरकार की नीति इस सम्बन्ध में स्पष्ट है कि भारत में कोई भी सरकार बने, फैसला उनके हाथ में है कि वह इस्लामाबाद से कैसे सम्बन्ध रखना चाहती है । पाक सकारात्मक रूप से उसका साथ देने के लिए तैयार है । पाकिस्तान के ही उसमान काजी कई सालों से विकास के क्षेत्र से जुडÞे हुए हैं और दक्षिण एशिया के मामलों में गहरी नजर रखते हैं । उनके मुताबिक पाक एस्टेबलिशमेंट-फौज और सरकार) और मीडिया भारत में राइट विंग के दलों की सरकार की छवि कुछ अधिक ही डरावनी पेश करते हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से भारत-पाक के बीच बेहतर सम्बन्ध नई दिल्ली में राइट विंग दलों की सरकार में हुए हैं । यह बात देर्साई और बाजपेयी सरकार में हमें देखने को मिली थी । उनका मानना है कि भाजपा अगर मुस्लिम विरोधी राजनीति करती है तो यह उसका आन्तरिक मामला है और लोकतांत्रिक देश धर्म या अपनी विचारधारा की बुनियाद पर विदेश नीति नहीं चला सकते हैं । वरिष्ठ पत्रकार अशरफ खान समझते हैं कि भारतीयों ने अगर मोदी को प्रधानमंत्री के लिए चुना है तो, वह पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता बेहतर ढंग से कर सकते हैं और भारत में जब भी राइट विंग दलों की सरकार आई है तो पाक के साथ मुश्किल मुद्दों पर बातचीत में प्रगति हर्ुइ है क्योंकि वो कभी भी बडÞे फैसले से घबराते नहीं हैं । जानेमाने विश्लेषक अरशद मेहमूद को नहीं लगता कि मोदी के आने से पाक पर कोई बुरा असर पडÞेगा । उनके अनुसार मोदी भारत के बिजनेस क्लास का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनकी कोशिश होगी कि दोनों देशों के व्यापारिक संबंध बेहतर हों और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिले । वह कहते हैं कि पाक की सोच और विदेश नीति में यह सबसे बडÞी खराबी है कि वह चाहते हैं कि अफगानिस्तान में हमारी मर्जी की सरकार बने और भारत में भी, यह तो दुश्मनी बढÞाने वाली बात है । वहीं जर्मन मीडिया हाउस डायचवेले ने भारतीय चुनाव के हवाले से पाक के हर सूबे का र्सर्वे किया तो वहाँ के लोगों के बीच से यह बात भी उभर कर सामने आई कि वहाँ कि आम जनता चाहती है कि अगर मोदी सरकार में आते हैं तो पाक को भारत से रिश्ता तोडÞ लेना चाहिए । कराची के पत्रकार अबूजार शरीफ का मानना है कि मोदी का एक प्रभावशाली नेता के रूप में अभ्यूदय दक्षिण एशिया के लिए घातक होगा । खैर, यह पाक जनता की सोच है ।
नेपाल की नजर भी इस चुनाव पर टिकी हर्ुइ है । जहाँ पाक, मोदी की हिन्दुवादी छवि से परेशान है, वहीं नेपाल में मोदी की यह छवि मान्य है । यहाँ मोदी बनाम केजरीवाल पर ही बहस होती दिखाई पडÞ रही है । यहाँ यह माना जा रहा है कि काँग्रेस की विदेश नीति नेपाल के मामले में उतनी सफल नहीं मानी जा सकती है । यह विचार हमारे सीमा से जुडÞे भारतीय राज्यों की भी है । साथ ही नेपाल पर बढÞते चीन के प्रभाव को भी वह भारतीय विदेश नीति की असफलता ही मान रहे हैं । फिलहाल यहाँ काँग्रेस की चर्चा नग्ण्य है । सभी मानते हैं कि केजरीवाल लहर है तो सही पर, मोदी के तुफान के सामने फिलहाल टिकने की स्थिति में नहीं है । किन्तु उनकी यह भी इच्छा है कि नेपाल को केजरीवाल जैसे तुफान की आवश्यकता है । फिलहाल नजरें मोदी पर टिकी हैं कि अगर वो सत्ता में आते हैं तो, नेपाल पर इसका क्या प्रभाव पडÞेगा –
विश्लेषकों का मानना है कि भारत में अगर मोदी सत्ता में आते हैं तो, नेपाल भी उनके हिन्दुत्ववादी नजरिए से प्रभावित होगा । क्योंकि नेपाल पहले हिन्दु राष्ट्र था और आज भी यह हिन्दु राष्ट्र बना रहे ऐसी सोच कमोवेश यहाँ है । भारत में मोदी हिन्दुत्व की बात करने वाले एक आक्रामक नेता के रूप में पहचाने जाते हैं ।  पर एक सच्चाई तो है कि, कोई भी नेता जब तक सत्ता से बाहर रहता है, तभी वह ऐसी बातें करता है । लेकिन यह उसे भी पता होता है कि देश चलाना है तो सभी को साथ  लेकर चलना होगा ।
नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे कहते हैं कि, भाजपा नेता राजनाथ सिंह कई बार यह कह चुके हैं कि नेपाल के प्रति भारत की विदेश नीति नाकाम रही है । इस स्थिति में ऐसा लगता है कि मोदी और सिंह के समीकरण का असर नेपाल सम्बन्धी नीतियों पर अवश्य पडÞेगा । पर यह भी जाहिर है कि भारत में सरकार किसी की भी बने, भारत नेपाल के खास मुद्दे पर कोई विशेष अन्तर पडÞने वाला नहीं है । नेपाल के माओवादी पार्टर्ीीे विदेश मामलों के पर्ूव विभागीय प्रमुख राम कार्की यह मानते हैं कि, नेपाल सम्बन्धी नीतियों का निर्धारण भारत के नौकरशाह करते हैं, ऐसे में अगर मोदी आते भी हैं तो उनकी भी एक सीमा होगी । मोदी को भी नेपाल की भावनाओं का सम्मान करते हुए ही नीति निर्धारण करना पडÞेगा क्यों कि पर्ूव में काँग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन ने २००५ में नेपाल की तत्कालीन सी पी एवं माओवादी और नेपाल की मुख्यधारा की राजनीतिक अन्य पार्टियों के साथ १२ मुद्दों पर सहमति जताई थी । जिसके बाद ही नेपाल में राजनीतिक बदलाव हुआ और राजतंत्र खत्म हुआ । नेपाल एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में विश्व के सामने उपस्थित हुआ । अगर इस मुद्दे पर भाजपा कोई बदलाव की बात सोचता है तो निस्सन्देह नेपाल में भारत की छवि खराब होगी ।
किन्तु नेपाल के शाही र्समर्थकों और हिन्दुत्ववादियों के बीच खासा उत्साह है, मोदी को लेकर । राप्रपा के नेता कमल थापा कई बार यह वक्तव्य देकर चर्चित हो चुके हैं कि, भाजपा के कद्दावर नेता राजनाथ सिंह और मोदी चाहते हैं कि नेपाल को हिन्दु राष्ट्र ही होना चाहिए था । किन्तु वो यह भी मानते हैं कि यह फैसला नेपाली जनता करेगी कि वो नेपाल को किस रूप में देखना चाहती है । कई वर्ग हैं जो यह सोचते हैं कि अगर मोदी सत्ता में आते हैं तो, नेपाल के सर्न्दर्भ में भारत की नीति नौकरशाही के स्तर पर नहीं बल्कि राजनीतिक स्तर पर तय होगी । जो शायद कपोलवृक्ष ही साबित हो क्योंकि लगभग एक दशक से भी ज्यादा समय से कोई भारतीय प्रधानमंत्री ने नेपाल का दौरा नहीं किया है जबकि हमारे सभी प्रधानमंत्री अपने-अपने कार्यकाल में भारत दौरा कर चुके हैं । ऐसे में मोदी अगर सत्ता में आते हैं तो उनका नेपाल के प्रति क्या रुख होगा यह तो भविष्य बताएगा, हम तो फिलहाल चुनावी नब्ज टटोल रहे हैं, देखें ऊँट किस करवट बैठता है ।

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