मोदी, नेपाल और मधेशी

ramashishरामाशीष:भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नेपाल के दो दिनों के सद्भावना भ्रमण पर ३ अगस्त को काठमांडू पहुंचे और उसी दिन अपने अति सुमधुर सरल आत्मीयतापर्ूण्ा, सारगर्भित और समस्या-समाधान युक्त हिन्दी भाषण से न केवल ५७५ सदस्यीय नेपाली संविधान सभा के सभासदों को गद्गद् कर दिया । अपितु रेडियो को कान लगाए बैठे लाखों श्रोताओं और टीवी दर्शकों सहित सामान्य नेपाली जनता का भी मन मोह लिया, मंत्रमुग्ध कर दिया । उनके भाषण के हर वाक्य पर सभासदों की तालियों की गडÞगडÞाहटों से ‘संविधान सभा भवन’ बार-बार गूंज उठता था ।
वास्तविकता तो यह है कि नेपाली जनता के दिलो-दिमाग में पैदा हो चुके मोदी-प्रेम का पता तो उनके भाषण से पहले ही चल चुका था । जब, संबोधन करने के लिए वीरेन्द्र सभागृह आते वक्त उनकी एक झलक पाने के लिए घंटों से इन्तजार कर रही आम नेपाली जनता ने भाव-विहृवल होकर ”हर हर मोदी – घर घर मोदी” का गगनभेदी नारा लगाया । और, करतल घ्वनि के साथ ‘नरेन्द्र मोदी जिन्दावाद’ के नारे से आकाश को गंुजायमान कर दिया । एक सामान्य ‘रेलवे टी-ब्वाय’ से सवा सौ करोडÞ की आबादीवाले देश, भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे मोदी ने नेपाली जनता के इस अगाध प्रेम को भांप लिया । और, सुरक्षा-व्यवस्थाओं की परवाह किए बिना, प्रधानमंत्री के काफिले की गाडÞी से नीचे उतरकर नेपाली मां-बहनों, वाल-वृद्धों और युवकों का अभिवादन स्वीकार किया । वह नेपाल और भारत सरकार की पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था की परवाह किए बिना ही ‘चीन निर्मित कोदारी राजमार्ग’ पर कई बार ‘बुलेट प्रुफ कार’ से नीचे उतरे और भीडÞ में घुसकर अति उत्साहित युवकों सहित उपस्थित लोगों से हाथ भी मिलाया ।Modi 7
प्रधानमंत्री मोदी ने सभासदों को संबोधित करते समय ‘नेपाली राजनीतिक क्षेत्र में वषर्ाें से की जा रही भारत विरोधी राजनीतिक खेती की दुखती रगों पर भी हाथ डाला और ‘बार-बार र्सार्वभौम नेपाल’ का उच्चारण कर, भारत विरोधियों को गहरा झटका दिया । इसी प्रकार उन्होंने नेपाल को भगवान बुद्ध की जन्मभूमि बताते हुए नेपाल के भारत विरोधियों की इस आशंका का भी निवारण कर दिया कि ”भारत का दावा है कि भगवान बुद्ध भारत में जन्मे थे’ । इसी प्रकार उन्होंने नेपाल को ‘गणतांत्रिक लोकतंत्र’ से संबोधित कर यहां के राजवादियों द्वारा फैलाये जा रहे उस दुष्प्रचार को भी धूल-धूसरित कर दिया जिसमें यह फैलाया जा रहा था कि ”चूंकि प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रह चुके हैं’ और उनकी पार्टर्ीीभारतीय जनता पार्टर्ीीा मातृ-संगठन भी, आरएसएस । ही है, इसलिए भारत की मोदी सरकार, ‘विश्व के एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल’ की राजगद्दी पर राजा ज्ञानेन्द्र फिर से विराजमान करा सकती है ।
मोदी ने अपने चालीस मिनट के संबोधन में जहां, यहां के माओवादियों का ‘युद्ध से बुद्ध’ और शस्त्र से शास्त्र का मार्ग अपनाने के लिए मुक्त कंठों से अभिवादन किया और ऋषि मन से ‘संविधान निर्माण’ के कार्य को जल्द से जल्द पूरा करने की सलाह दी वहीं दूसरी ओर इस कार्य में भारत के हर सहयोग की पेशकश भी की । इसके साथ ही उन्होंने विश्व भर में हो रहे राजनीतिक खून-खराबे और नरसंहार में लगी ताकतों, माओवादियों और नक्सलियों को नेपाल से शिक्षा लेते हुए शान्ति एवं लोकमंत्र के रास्ते से जनता को सुख शांति पहुंचाने की अपील की ।
इसके साथ ही उन्होंने नेपाल की सरकार और नेताओं से नेपाल में विद्यमान जलस्रोतों का विकास कर इसका भरपूर लाभ उठाने की अपील की और स्पष्ट कर दिया कि ‘नेपाल में उत्पादित बिजली, भारत मुफ्त में नहीं लेगा । उन्होंने कहा आज हम आपका अंधेरा दूर रहे हैं लेकिन दस वषर्ाें के बाद आप भारत का अंधेरा दूर करेंगे । इसी के दौरान उन्होंने नेपाल को मामूली ब्याज पर १० हजार करोडÞ रूपये के ऋण सहयोग करने की भी घोषणा की । मोदी ने मुक्त कंठ से कहा दोनों देशों के संबंधों में आनेवाली बाधाओं तथा आपकी हर आशंका को दूर करने के लिए भारत तैयार है, आप हमारे सामने लाइए, हम सभी शंकाएं दूर करेंगे । मालूम हो कि मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए नई दिल्ली पहुंचे नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को भी आश्वासन दिया कि वह कोई एक परियोजना का कार्यक्रम उनके पास भिजवाएं, वह उसे एक गिफ्ट के रूप में सम्पर्ूण्ा भारतीय लागत से पूरा कराएंगे ।
यह एक संयोग ही था कि प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन से ठीक पहले नेपाल के एबीसी टेलीविजन के न्यूज रूम से मुझे एक फोन काँल मिला और मुझसे ‘लाइभ इन्टरव्यू’ देने का आग्रह किया गया । तद्नुसार, मैं लगभग साढÞे तीन बजे स्टूडियो पहुंचा और ‘चार बजे के समाचार प्रसारण के साथ ही मेरे लाइभ इन्टरव्यू का प्रसारण भी शुरू हुआ । इन्टरव्यू के दौरान एबीसी के वरिष्ठ पत्रकार किरण बाबू महट्टा का घुमा फिराकर एक सवाल बार-बार आया, और वह था कि ‘क्या मोदी जी के नेपाल भ्रमण से नेपाल में सक्रिय ‘राजावादियों के ”राजा को फिर से गद्दी आरोहण कराने” के प्रयास को बल मिलेगा – और, मेरा एक ही नपा तुला उत्तर था कि अब यहां के राजा से लेकर राजावादी नेताओं तक के राजनीतिक एक्सरे प्लेटर्,र् इसीजी । और इको कार्डियोग्राम मोदी जी के पास है । अब नेपाल और नेपाली नेताओं के बारे में पूरी तरह जाननेवाले भारतीय नेताओं, राजनयिकों और पत्रकारों की कमी नहीं है । अब कोई भी प्रयास भारत को बरगला नहीं सकेगा । लेकिन, हां, मोदी जी के नेपाल भ्रमण और उनके हिन्दू आचरण से हिन्दुत्व को अवश्य ही बल मिलेगा । इससे दोनों ही देशों की जनता के बीच सद्भाव और आत्मीयता की वृद्धि अवश्य होगी ।
मोदी जी ने दूसरे दिन, अर्थात श्रावण महीने के अन्तिम सोमवार को पर्ूव निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार भगवान पशुपति नाथ के मंदिर में आयोजित विशेष पूजा में भाग लिया, मंदिर के भारतीय भट्टों और अन्य पुजारियों से प्रसाद-आशर्ीवाद ग्रहण किया जो नेपाल भारत के इतिहास में पहली घटना थी । स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी से लेकर इंद्रकुमार गुजराल तक ने नेपाल का भ्रमण किया लेकिन उनमें से किसी ने भी भगवान पशुपतिनाथ मंदिर में पर्ूण्ा शास्त्रीय विधि से पूजा अर्चना नहीं की थी । मोदी के इस आचरण ने विश्व के सम्पर्ूण्ा हिन्दू समाज का मनोबल उंचा किया । उनके इस आचरण का कदापि यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि ‘इससे प्रखर भारत विरोधी कमल थापा जैसे तत्व की ‘हिन्दू सक्रियता की आडÞ में गद्दीविहीन हो चुके राजा ज्ञानेन्द्र को फिर से गद्दीनसीन कराने के अभियान को बल मिलेगा ।
मेरे इंटरव्यू का अन्त हुआ और संविधान सभा में मोदी जी का संबोधन शुरू हो गया । उक्त चैनेल के अधिकांश पत्रकार स्टूडियो में जमा हो गए थे और मोदी जी के भाषण के हर वाक्य को ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बताते हुए खुशी से उछल रहे थे । मैं भी स्टूडियो में बन्द रहा । और, मोदीजी के भाषण के बाद मेरे इन्टरव्यूकर्ता किरण जी ने यह टिप्पणी करते हुए मुझे विदा किया कि ‘मोदीजी के भाषण में वह सब कुछ सुनने को मिला, जिसका अनुमान, आप इन्टरव्यू के दौरान लगा चुके थे, आपको साधुवाद । मैंने उनसे कहा नेपाल को भली-भांति जानने समझनेवाला भारत का कोई भी नेपाल-हितैषी वही सुझाव-सलाह-विचार एवं सहयोग देगा जो मोदी जी ने दिल खोलकर दिया है ।
बात रही मधेशियों की, दूसरे दिन, अर्थात ४ अगस्त की । उस दिन प्रधानमंत्री मोदी, विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से अलग-मिलनेवाले हैं, इसकी सूचना बाहर आ चुकी थी । काठमांडू स्थित भारतीय पत्रकारों एवं नई दिल्ली से यहां आए मीडियाकर्मी के साथ ही नेपाली मीडियाकर्मी भी, हयात होटल के प्रधानमंत्री कक्ष में प्रवेश करनेवाले और वहां से वापस आनेवाले नेताओं पर टकटकी लगाए बैठे थे । प्रधानमंत्री मोदी ने माओवादी नेता पुष्पकमल दहाल एवं बाबूराम भट्टर्राई से लेकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीएमाले) तथा राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टर्ीीे नेताओं से अलग-अलग भेंट की । जबकि, मोदी ने भारतीय सीमा से लगे तर्राई -मधेश) की टुकडÞों में विभाजित पार्टियों के मधेशी नेताओं से एक साथ भेंट किया ।
मधेशी नेताओं को दी गई भेंट में माओवादी पृष्ठभूमि के पर्ूव विदेश मंत्री उपेन्द्र यादव, नेपाली कांग्रेस पृष्ठभूमि के पर्ूव गृह तथा उपप्रधानमंत्री विजय कुमार गच्छदार, नेपाली कांग्रेस पृष्ठभूमि के ही महंथ ठाकुर, उपेन्द्र यादव की पार्टर्ीीे फूटकर बनी पार्टर्ीीे नेता तथा पर्ूव मंत्री जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता, महंथ ठाकुर की पार्टर्ीीे अलग हो चुके नेता तथा पर्ूव मंत्री महेन्द्र यादव, जयप्रकाश गुप्ता की पार्टर्ीीे फूटकर अलग हुए राजकिशोर यादव, महान त्यागी तथा भारत मित्र स्व. गजेन्द्र नारायण सिंह द्वारा स्थापित ”नेपाल सद्भावना पार्टर्ीी को आधे दर्जन से भी अधिक टुकडÞों में बांटने में सफल हुए पर्ूव मंत्री राजेन्द्र महतो तथा अनिल कुमार झा शामिल थे । महंथ ठाकुर के पर्ूव पीए तथा नेपाली कांग्रेस के सभासद अमरेश कुमार सिंह और एनेकपा -माओवादी) सभासद् प्रभु साह की भी घुसपैठ हो गई थी । क्योंकि, उक्त दोनों ही मधेशी सभासदों को उनकी अपनी पार्टर्ीीे डेलीगेशन में कोई जगह नहीं दी गई थी ।
मालूम हो कि पिछले चुनाव में बुरी तरह हार चुके अपनी-अपनी पार्टर्ीीे अध्यक्ष राजेन्द्र महतो, अनिल कुमार झा और राजकिशोर यादव, समानुपातिक सीटों पर अपनी पत्नियों को बिठा चुके हैं जबकि महंथ ठाकुर ने अपने एक रिश्तेदार को समानुपातिक सीट सौंप दिया है । उक्त नेताओं के इन अनैतिक कृत्यों के कारण आज न केवल मधेश आन्दोलन मुरझाया हुआ दिखने लगा है अपितु मधेश राजनीति से धन्नासेठ बन चुके उक्त सभी मधेशी नेताओं के प्रति मधेशियों में भारी घृणा और निराशा की भावना घर कर चुकी है ।
शायद यही कारण था कि मोदी-कक्ष से बाहर निकलने पर, मधेशी नेताओं के चेहरे पर न तो कोई प्रसन्नता दिखती थी और न ही कोई उत्साह । फलस्वरूप, हयात रिजेन्सी होटल में मोदी कक्ष के बाहर भारी संख्या में उपस्थित नेपाली -पहाडÞी) रिपोर्टरों और पत्रकारों में भारी खुशी दिखायी दे रही थी । उनलोगों के बीच चर्चा का एक ही विषय था कि- मोदी जी ने ठीक किया, उन्होंने इन मधेशियों को अलग से तो भेंट नहीं ही दी, और सामूहिक भेंट में भी जल्द से जल्द संविधान बनाने तथा पहाडी-मधेशी की भावना नहीं भडÞकाने की सलाह दी ।
जबकि, भेंटकर्ताओं में एक सभासद तथा अपनी पार्टर्ीीे अध्यक्ष महेन्द्र यादव का कहना है कि ”मोदी जी ने हम सबों की बातों को गंभीरता से सुना और स्पष्ट रूप में कहा कि मैंने अपने संबोधन में कहा है कि नेपाल का संविधान ऐसी गुलदश्ता साबित हो जिसमें देश के सभी वर्ग को गुलदश्ते में सजाए गए अपने फूल की खुशबू भी महसूस हो । संविधान में कोमा-फुलस्टाप की भी ऐसी गलती नहीं हो जो आगे चलकर विषबीज बनकर विषवृक्ष न बन जाए’ –
नेपाल के मधेशियों की गुलामी जीवन का दशकों से अध्ययन कर रहे काठमांडूवासी बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने अलग-अलग भेंट में ‘नेपाली रिपोर्टरों की खुशीयाली’ के बारे में अपनी गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त की है । उनका कहना है कि काठमांडू घाटी के कुंए में शासक वर्ग का प्रतिनिधित्व करनेवाले इन बेचारे रिपोर्टरों एवं पत्रकारों को शायद जमीनी सच्चाई का ज्ञान ही नहीं है । और, यदि मोदी जी ने इन धनबटोरू-रिश्वतखोर मधेशी नेताओं की कारगुजारियों की पृष्ठभूमि में कुछ रूखी बातचीत भी की हो तो इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें लगभग एक करोडÞ हिन्दी बोलने और समझनेवाले मधेशियों की ‘गुलामी-पीडÞा’ का ज्ञान नहीं है । वास्तविकता तो यह है कि यदि मधेशियों के प्रति नेपाल का एक वर्गविशेष-जाति विशेष का शासन, अपने र्ढाई सौ वषर्ाें के रवैये पर कायम रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब सीमा से लगे बिहार और उत्तर प्रदेश के मधेशियों के रिश्तेदार, नेपाल को जोडÞनेवाली मुख्य सडÞकों पर ‘महात्मा गांधी का निहत्था-सत्याग्रह’ न प्रारंभ कर दे । और, सबसे पहले राजधानी से शासन के डंडे घुमा रहे शासकों का ही नमक-तेल-गैस के साथ ही बिजली का संकट न खडÞी कर दे । यदि यह दर्ुभाग्यपर्ूण्ा स्थिति पैदा हो ही गई तो उस हालत में भारत के प्रधानमंत्री मोदी तो क्या बिहार और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्रियों, राज्य सरकारों के लिए भी हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचेगा ।
स्मरणीय है कि मोहनदास करमचन्द गांधी, ने नीलहे कोठी के अंग्रेज मालिकों द्वारा फटेहाल बिहारी मजदूरों पर किए जा रहे जोर-जुल्म के खिलाफ पश्चिमी चम्पारण की उसी पवित्र धरती से ‘सत्याग्रह’ की शुरूआत की थी जो बीरगंज और रक्सौल से सटी हर्ुइ है । इसी पवित्र भूमि पर शुरू किए सत्याग्रह आन्दोलन से वह ‘महात्मा’ ही नहीं, भारत के राष्ट्रपिता भी कहलाए थे ।
मालूम हो कि मधेशी युवकों का एक बहुत ही बडÞा समूह, एक युवा मधेशी वैज्ञानिक डा.  सीके  राउत के नेतृत्व में संगठित हो रहा है जबकि दूसरी ओर जयप्रकाश गुप्ता भी एक बहुत ही बडÞे शान्तिपर्ूण्ा आन्दोलन की तैयारी में जुटे हुए हैं । उनका कहना है कि लगभग ढर्Þाई सौ वषर्ाें से हम मधेशियों पर शासन करते आ रहे शासक वर्ग, हमें समानता का अधिकार तो दूर, सामान्य अधिकार भी नहीं देगा । क्योंकि, वह तो ‘बिना युद्धेन केशवः’ के ऐंठ-अकडÞ भरे दर्ुयाेधन वाक्य पर अडिग है । इस संविधान सभा से भी हम कोई उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि इस बार की संविधान सभा में तो पक्ष और विपक्ष उन्हीं अल्पसंख्यक जातिविशेष के सदस्यों से भरा पडÞा है । इसलिए हमें संगठित होना ही पडÞेगा । डा. राउत ने खुलेआम स्वतंत्र मधेश की घोषणा कर दी है तथा बांगलादेश के संस्थापक नेता बंगबंधु शेख मुजीबर्ुरहमान की तर्ज पर ‘स्वतंत्र मधेेश’ का उद्घोष करते हुए उसके ‘नेशनल एन्थम -राष्ट्रगान) सहित एक पुस्तिका और मधेश का इतिहास नामक पुस्तक भी प्रकाशित कर दी है, जो सरे आम बंट भी रही है ।

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