मोदी बने भारत के महानायक

कुमार सच्चिदानन्द:राजनीति का धर्म’ और र्’धर्म की राजनीति’ दोनों अलग-अलग चीजें हैं । राजनीति में धर्म का सम्मिश्रण जहाँ व्यक्ति को निष्ठावान, सच्चरित्र और कर्त्तव्यनिष्ठ बनाता है वहीं धर्म में राजनीति का सम्मिश्रण व्यक्ति को धार्मिक अतिवाद की ओर अग्रसर करता है । भारतीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी का उदय तो बहुत पnarendra_modi_image_with_quote_wallpapersहले हो चुका था, लेकिन उनके प्रगतिशील कदमों की आहट विगत बारह वर्षों से सुनाई दे रही थी । लेकिन भारत के विगत संसदीय चुनाव में भारतीय जनता पार्टर्ीीे प्रधानमंत्री पद के प्रस्तावित उम्मीदवार के रूप में उन्हें जो ऐतिहासिक सफलता मिली, उसमें किसी न किसी रूप में राजनीति में धर्म के तत्वों का समावेश है, जिसके कारण विरोधियों के आरोपों को बेबुनियाद सिद्ध करते हुए उन्होंने न केवल प्रचण्ड बहुमत और ऐतिहासिक सफलता हासिल की वरन अति नम्रता का परिचय देते हुए, संसद में कदम रखने से पहले उसकी सीढिÞयों पर माथा टेककर एक तरह से यह संदेश दिया गया कि, लोकतंत्र का यह वास्तविक मंदिर है और इसका सम्मान और संरक्षण किसी न किसी रूप में होना ही चाहिए । उनके इस कदम से विरोधी भी स्तब्ध, अवाक् और तर्कशून्य हैं । यह एक विडम्बना ही रही है कि उनके विरोधियों द्वारा उन्हें धर्म के पुरोधा के रूप में प्रचारित किया गया, राजनैतिक रूप में उन्हें अलग-थलग करने की कोशिश की गई । लेकिन भारत की जनता ने उन्हें प्रचण्ड बहुमत देकर एक तरह से यह संदेश दिया कि मौजूदा समय इस देश के लिए महज ं बेबुनियाद प्रलाप और मिथ्या प्रचार का नहीं, विकास और देश के स्वाभिमान का है । इसलिए जो व्यक्ति इस दिशा में गतिशील दिखा उसके प्रति उसने अपना विश्वास दिखलाया ।
लोकतंत्र में सत्ता का परिवर्तन आर्श्चर्यजनक नहीं माना जाता । यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । लेकिन जिस रूप में यह भारत में घटित हुआ वह आर्श्चर्य का भाव उत्पन्न करता ही है । क्योंकि विगत दस वर्षों में सत्ता पर काबिज रहने वाली पार्टर्ीीो एक तरह से जनता ने पूरी तरह नकार दिया है और देश का नेतृत्व करने वाली र्सवाधिक प्राचीन तथा र्सवाधिक समय सत्ता पर काबिज रहने वाले दल को ऐतिहासिक असफलता का स्वाद चखना पडÞा । यह घटना सिद्ध करती है लोकतंत्र में जब हमारी राजनीति और pmkabitaइससे जुडÞे लोग स्वयं को र्सवशक्तिमान मान लेते हैं, तो आम जनता के पास उसे जमीन दिखलाने का कम-से-कम एक हथियार तो है जिसे समय आने पर वह उपयोग करती है और यही परिवर्तन का कारक बनती है । निश्चित ही नरेन्द्र मोदी ने इस असंतोष को गति और दिशा दी और उसे एकmodi ke guru मुकाम दिया । लेकिन यह विजय उन करोडÞों भारतवासियोंं के असंतोष की सकारत्मक विजय है, जिसके तहत उसने एक भ्रष्टाचारमुक्त और तीव्र विकासोन्मुख भारत का सपना देखा और श्री मोदी के प्रति अपना विश्वास व्यक्त किया । इसलिए प्रधानमंत्री के रूप में उनसे अपेक्षाएँ भी गहरी हैं और इसी अनुपात में उनकी चुनौतियाँ भी अधिक हैं । लेकिन यह भी माना जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री के रूप में उनका चयन भारत की जनता की महज भावुकता नहीं बल्कि एक सोची समझी रणनीति रही और उद्धारक या त्राता के रूप में लोगों ने उनके प्रति अपना विश्वास व्यक्त किया ।
इस विजय-यात्रा में राजनीति की विसात चाहे जितनी बिछायी गई हो, लेकिन इसकी जमीन तो उसी दिन से तैयार होने लगी थी, जब काँमनवेल्थ खेलों की तैयारी के लिए पर्ूवाधार विकास के क्रम में व्यापक रूप से भ्रष्टाचार के मामले सामने आए थे और लिप्त नेताओं और मंत्रियों के प्रति सरकार रक्षात्मक नजर आयी थी । ऐसा लग रहा था की पूरी सरकार भ्रष्टाचार के पंक से पंकिल है । इसी मुद्दे को आधार बनाकर समाजसेवी अन्ना हजारे ने अपने नेतृत्व में सशक्त जनान्दोलन का सूत्रपात किया था और जिसे देशभर से व्यापक र्समर्थन मिला था । लेकिन इसे संबोधन करने के बजाय सरकार द्वारा इसे कमजोर करने की कोशिश की गई और इनके कुछ बेलगाम वक्ताओं और प्रवक्ताओं ने इसकी तर्कहीन अपव्याख्या आरंभ की । लोकतंत्र की यह विशेषता होती है कि इसमें वाक्-स्वतंत्रता तो होती है, इसके तहत राजनैतिक बयानबाजी भी होती है, वाक्-चातर्ुय भी दिखलाए जाते हैं और नए-नए तर्क आकर्षा भी उत्पन्न करते हैं लेकिन जो तर्क जन-मन की भावनाओं को नहीं छू पाते उसके प्रति विपरीत प्रतिक्रिया होती है । इन विपरीत प्रतिक्रियों ने भी किसी न किसी रूप में इस चुनाव के परिणामों को प्रभावित किया है । यह अलग बात है कि अन्ना के आन्दोलन से एक अलग राजनैतिक दल भी उभरा, जिसे दिल्ली के विधानसभा चुनाव में व्यापक सफलता भी मिली लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर लोगों ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया और भारतीय जनता पार्टर्ीीे प्रति अपना विश्वास व्यक्त किया ।
नरेन्द्र मोदी को भारतीय राजनीति में उनकी विजय यात्रा को मंजिल पर पहुँचाने और उन्हें शिखर पुरुष बनाने के लिए किसी न किसी रूप में सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ भी सक्रिय थीं । भारत के योग गुरु बाबा रामदेव, जो अपने योग शिविरों में विगत सरकार के प्रति असंतोष व्यक्त करते थे और जब उन्होंने सरकार के विरुद्ध स्वतंत्र रूप से आवाज उठायी तो, सरकार ने उनके साथ न केवल अमानवीय वर्ताव किया बल्कि उन्हें आन्दोलन के समस्त कार्यक्रमों को वापस लेने के लिए विवश किया । यद्यपि भ्रष्टाचारमुक्त और विकासोन्मुख भारत का सपना वे भी देख रहे थे और इसे राजनैतिक रंग देने के लिए इन्होंने भारत स्वाभिमान मंच के द्वारा जन-जागरण का ms-6 narendra modi-sushma swaraj rajnath singh wth Modiअभियान तो बहुते पहले ही प्रारंभ कर दिया था । लेकिन अवसर आने पर इन्होंने भी अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोडÞी और विगत सरकार के प्रति लगातार वैचारिक आघात किए । किसी-न-किसी रूप में उनके इस प्रयास ने भी इन चुनावों के परिणाम को प्रभावित किया । ऐसा नहीं था कि इसमें सिर्फहिन्दू धर्मावलंबी शामिल थे बल्कि अन्य सम्प्रदायों के लोगों का भी इसमें योगदान था । इसका प्रमाण यह था कि जब उनकी विजय यात्रा हरिद्वार से दिल्ली के लिए निकली तो उसमें अन्य सम्प्रदाय के लोग भी बढÞ-चढÞ कर हिस्सा ले रहे थे । यह एक ऐसी घटना है जो यह संकेत करती है कि मौजूदा समय में साधु सन्तों की भूमिका भी बदल रही है और वे भी राजनैतिक रूप से जनमत निर्माण करने में महत्वपर्ूण्ा भूमिका निर्वहन कर सकते हैं । इस परिवर्तन में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने उनकी तुलना गाँधी और जयप्रकाश नारायण तक से कर डÞाली क्योंकि इस परिवर्त्तन में उन्होंने अपना योगदान तो दिया लेकिन पद की कोई अपेक्षा या लोलुपता नहीं दिखाई । इस विजय को उन्होंने दानवत्व की पराजय और देवत्व की विजय की संज्ञा दी ।
विगत चुनाव में साम्प्रदायिकता भी एक बडÞा मुद्दा बनकर सामने आई । एनडीए से अलग भारतीय जनता पाटीं के कुछ र्समर्थक दलों को छोडÞ लगभग सारे भारत के राजनैतिक दलों ने भाजपा को साम्प्रदायिक दल और नरेन्द्र मोदी को सम्प्रदायिकता के वाहक तथा कट्टरपंथी के रूप में प्रचारित किया । लेकिन जनता गुमराह नहीं हर्ुइ । उनके पास विगत सरकार की निर्दय कुंडली से निकलने का दूसरा कोई माध्यम नहीं था । यह सच है कि तीसरी शक्ति जो विभिन्न प्रदेशों में बिखरी हर्ुइ हैं, वह भी अपने आप को विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रही थी । लेकिन इनके प्रति र्समर्पण एक तरह से अस्थिरता को निमंत्रण देना था । क्योंकि इन क्षेत्रीय क्षत्रपों की महत्वाकाँक्षा इतनी प्रबल है कि उनमें समन्वय और संयोजन संभव नहीं था । सत्ता के सिवा राष्ट्र निर्माण की कोई निश्चित योजना और निश्चित दृष्टिकोण भी इनके पास नहीं था । इसलिए भारतीय जनता ने इन दलों के प्रति अपना र्समर्थन और विश्वास व्यक्त नहीं किया और एक तरह से सम्पर्ूण्ा भारतीय राजनीति को यह संदेश दिया कि साम्प्रदायिकता आदि जैसे मुद्दे अतीत के विषय हो चुके हैं । राष्ट्र का विकास और निर्माण अधिक महत्वपर्ूण्ा है । नरेन्द्र मोदी जमीन से जुडÞे हुए नेता हैं । मुख्यमंत्री के रूप में राजनीति का गहरा अनुभव उनके पास है । अपने मुख्यमंत्रीत्व काल में गुजरात में न केवल उन्होंने अच्छा विकास दर प्राप्त किया बल्कि उसे निरन्तरता भी दी । इसलिए लोगों ने आँख मूँदकर अपना भरोसा उनके प्रति जतलाया ।
मोदी की इस विजय में कहीं-न-कहीं उनके बेबाक व्यक्तित्व की भी भूमिका महत्वपर्ूण्ा रही है । यद्यपि वे इससे पर्ूव भारत के एक प्रान्त के मुख्यमंत्री मात्र थे और आकस्मिक रूप से उन्होंने प्रधानमंत्री पद तक की यात्रा की क्योंकि भाजपा में ही अनेक ऐसे वरिष्ठ नेता थे जो इस पद के दावेदार थे मगर पार्टर्ीीौर र्समर्थक संगठनों ने उन पर ही बोली लगाई । उनके जीवन, चिन्तन और दर्शन के अनेक अनछुए पहलुओं का अभी प्रकाश में आना शेष है, लेकिन जितनी बातें अब तक सामने आयी है उससे स्पष्ट है कि वैचारिक दृढÞता और स्पष्टता उनके व्यक्तित्व के आवश्यक गुण हैं । व्यक्तित्व कर्ीर् इमानदारी उन्हें संबल प्रदान करती है । यही कारण है कि इतने लंबे चुनावी अभियान में विपक्षी कहीं भी उन्हें घेरने की स्थिति में सक्षम नहीं दिखे । प्रयास तो हुआ लेकिन वे बेदाग बाहर निकलते रहे । अब तक जो बातें प्रकाश में आयी हंै उससे स्पष्ट है कि बचपन में आर्थिक अभावों के बीच वे पले-बढÞे । इस जीवन संर्घष्ा ने उनके व्यक्तित्व को मजबूती प्रदान की । बाल विवाह तो हुआ था लेकिन राष्ट्र के प्रति र्समर्पण के कारण दाम्पत्य जीवन को उन्होंने स्वीकार नहीं किया । एक पत्नी को छोडÞकर दूसरे को ग्रहण करना जहाँ मनुजत्व है वहीं किसी को न ग्रहण कर निश्चित लक्ष्य के लिए भौतिक सुखों को त्याग देना साधकत्व है । जीवन के इस पक्ष ने उनके व्यक्तित्व में उर्त्र्सग का भाव भरा । फिर हिमालय पर्वतमाला में उनकी साधना की बातें भी सामने आयीं है जिसने निश्चित ही उनके व्यक्तित्व को फौलादी संरचना देने में अपनी भूमिका अदा की । रिश्ते-नातों की कमजोरियों को स्वयं पर हावी न होने देना भी उनके राजनैतिक जीवन की अन्यतम विशेषता रही है । ये सारी घटनाएँ एक ओर उनके धर्म के प्रति प्रतिबद्धता को जाहिर तो करती है किन्तु, राष्ट्र के प्रति उनके र्समर्पण को भी उजागर करती है । कहा जाता है कि भावनाओं की तरलता का प्रभाव सीधा किन्तु प्रभावी होता है । कहीं-न-कहीं उनकी भावनाओं की इसी तरलता में विगत चुनाव में भारत की जनता डूबती उतराती नजर आयी और धर्म, साम्प्रदायिकता और कट्टरता के सारे आरोप खण्ड-विखण्ड होते गए ।
श्री नरेन्द्र मोदी की विजय का मार्ग प्रशस्त करने में पर्ूव प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के व्यक्तित्व का दब्बूपन भी कम महत्वपर्ूण्ा नहीं रहा । एक बात तो निश्चित है कि वे कभी भी मुखर राजनेता नहीं रहे और उनके प्रधानमंत्री बनने में किसी-न-किसी रूप में किसी की राजनैतिक कृपा थी । उनका पहला कार्यकाल इस दृष्टि से आलोचित कम हुआ क्योंकि खुली अर्थव्यवस्था में राष्ट्र को अग्रसर करना था और इस दृष्टि से वे पहले भी सफल वित्तमंत्री रह चुके थे । प्रधानमंत्री के रूप में भी उन्होंने उसी अर्थचिन्तन को निरन्तरता दी । लेकिन पिछले दिनों डाँलर की तुलना में भारतीय रूपए की कीमत में भारी गिरावट और कमरतोडÞ महँगाई उनकी इस विशेषता को भी निगल गई । फिर भारतीय संचार माध्यमों ने एक तरह से उन्हें ‘डमी प्रधानमंत्री’ के रूप में प्रचारित किया, इससे भी उनके व्यक्तित्व की उFmचाई पर नकारात्मक असर पडÞा । दूसरा महत्वपर्ूण्ा तथ्य यह है कि राष्ट्र के नेता के रूप में जनता का स्वाभिमान भी बोलता है । इस दृष्टि से श्री सिंह भारतीय जनता की दृष्टि में नाकारा साबित हुए । वास्तव में भारत की जनता चाहती थी कि लाल किले के प्राचीर से जो व्यक्ति राष्ट्र को संबोधित करे, उसमें राष्ट्र का स्वाभिमान मुखरित हो । इस दृष्टि से उसने नरेन्द्र मोदी को सोलहो आने खरा पाया और उसके प्रति अपना र्समर्थन जाहिर किया ।
आज जब मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन चुके हैं तो उनके समक्ष अनेक चुनौतियाँ भी हैं । र्सवप्रथम तो विपक्षियों द्वारा उन्हें साम्प्रदायिक व्यक्ति के रूप में प्रचारित किया गया । यद्यपि उन्होंने अपनी चुनावी सभाओं में कहा भी था कि उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टर्ीीी जो सरकार बनेगी, वह भारत की सरकार होगी और इसका एक संविधान है जिसके तहत चलना सरकार का दायित्व है । लेकिन अब जब सत्ता की बागडोर उनके हाथ में है तो अपने कार्यकलापों से उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि धर्म के आधार पर वे कट्टर हिन्दू तो हो सकते हैं लेकिन उनकी धार्मिक विचारधारा उनकी शासन-पद्धति को प्रभावित नहीं करेगी । दूसरी ओर उन्हें यह संदेश भी देना होगा कि राजनीति में सफल होने और शिखर पर पहुँचने के लिए व्यक्तिगत धर्म के प्रति सdmौता का कोई अर्थ नहीं है । वस्तुतः विगत के दशकों में भारतीय राजनीति में धर्म के आधार पर तुष्टिकरण का जो खेल खेला गया, मोदी की विजय में किसी न किसी रूप में इसकी प्रतिक्रिया भी है । आज उन्हें यह संदेश भी देना है कि व्यक्तिगत धर्म के पालन से किसी अन्य धर्म की अवमानना नहीं होती । धर्म का सच्चा साधक राष्ट्र का सच्चा सेवक और शासक हो सकता है । आज धर्म की दृष्टि से मोदी महात्मा गाँधी के करीब हैं, अब उन्हें यह सिद्ध करना है कि राजनैतिक दृष्टि से भी वे गाँधी की तरह समद्रष्टा हैं ।
मोदी की इस विजय में भारत की जनता की भावुकता मात्र नहीं बल्कि राष्ट्र के विकास का सपना भी है । गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस गति से उन्होंने राज्य को विकास के पथ पर दौडÞाया उसने उन्हें न केवल राष्ट्रीय बल्कि अन्तर्रर्ाा्रीय स्तर पर भी लोकप्रियता प्रदान की । किसी न किसी रूप में इस विजय में करोडÞों देशवासियों के विकास का सपना भी है । लेकिन इस दिशा में सबसे बडÞी समस्या यह है कि पहले वे एक राज्य के मुखिया थे । आज वे एक ऐसे संघीय देश के प्रधानमंत्री हैं जो विभिन्न प्रान्तों में विभाजित है, जिसका शाासन विभिन्न दलों और विभिन्न विचारधाओं के क्षत्रपों के हाथ में हैं । उनका अपना प्रशासनिक और आर्थिक चिन्तन है, जो विचारधारा के आधार पर उनसे मतभेद भी रखतेे हैं । इसलिए सम्पर्ूण्ा देश में एक विकास दर स्थापित करना और उसे कायम रखना उनके सामने दूसरी बडÞी चुनौती है ।
क्षेत्रीय और जातीय राजनीति के केन्द्र में रहे बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भारतीय जनता पार्टर्ीीे अप्रत्याशित परिणाम अपने पक्ष में लाए हैं । लेकिन क्षेत्रीय, जातीय और धार्मिक मुद्दों के साथ साथ अल्पसंख्यकों का मुद्दा कभी भी उठ सकता है । इससे अलग भी वे खुद को रख नहीं सकते । यह सच है कि सन् २००२ में मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात के साम्प्रदायिक दंगों से सम्बद्ध आरापोें के कारण वे अब भी रक्षात्मक मुद्रा में हैं । इस मुद्दे को लेकर वे राष्ट्रीय और अन्तर्रर्ाा्रीय दोनों ही स्तरों पर कठघरे में थे । अमेरिका ने उन्हें कूटनैतिक वीजा देने को भी मना कर दिया था । यह अलग बात है कि अमेरिका, इंग्लैंड, चीन, पाकिस्तान आदि देशों ने विगत के चुनाव परिणामों को हार्दिकता पर्ूवक ग्रहण किया है । बराक ओबामा ने उन्हें अमेरिका भ्रमण का निमंत्रण भी दिया और पाकिस्तान सहित दक्षिण एशिया के प्रायः सभी देशों के प्रतिनिधियांे ने उनके शपथ-ग्रहण समारोह में अपनी सहभागिता दी । इन समस्त क्षेत्रीय, राष्ट्रीय तथा अन्तर्रर्ाा्रीय शक्तियों को विश्वास में लेना उनकी अन्य बडÞी चुनौती है ।
एक बात तो सच है कि चुनौतियाँ अनेक हैं, जनापेक्षा भी बहुत अधिक हैं । लेकिन यह भी माना जाना चाहिए कि वे एक सक्षम राजनेता हंै और जमीन से उठकर, जीवन की बहुरंगी आग में तपकर वे इस महिमा मण्डित पद पर पहुँचे हैं, इसलिए आम लोगों की कसौटी पर वे खरे उतरेंगे । उनकी सफलता की दिशा में सबसे बडÞा तथ्य यह है कि सिर्फउनकी पार्टर्ीीो संसद में स्पष्ट बहुमत प्राप्त है और पार्टर्ीीे लगभग र्सवमान्य मुखिया वे बन चुके हैं । इसलिए निर्ण्र्ाालेने में उन्हें बहुत असुविधा नहीं होगी । इसका प्रारम्भिक प्रारूप भी उन्होंने दिखला दिया है कि गठबंधन की सरकारों में जहाँ जम्बो मंत्रिमण्डल हुआ करता था वहाँ उन्होंने लघु आकार के मंत्रिमण्डल का निर्माण किया है । र्समर्थक दलों के लिए स्पष्ट फार्मूला निर्धारित कर दिया है कि छः सांसदों पर राज्यमंत्री और बारह सांसदों पर कैबिनेट मंत्री । मंत्रीमंडल का यह प्रारूप और फार्मूला यह संकेत दे रहा है कि नरेन्द्र के नेतृत्व में शासन महज भोग का साधन मात्र नहीं, कर्म का अवसर है । आशा की जा सकती है कि वे अपने कार्यकाल में देश को उन्नति की दिशा में अग्रसारित करेंगे ।

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