मोदी साहब ! नेपाल का इतिहास में झूठ और फरेबों का भी पुलिंदा है : कैलाश महतो


कैलाश महतो, परासी | बहुत से इतिहास विश्लेषकों का मानना है कि इतिहास होता ही नहीं है । अगर है भी तो बकबास है । क्यूँकि यह शासकों द्वारा बनाया गये किताबी दस्तावेज है । यह झूठ से उतना ही ज्यादा सम्बन्ध रखता है, जितना दूरी सत्यों से रखता है । जितना यह अहंकार का सौदा करता है, उससे कई गुणा ज्यादा यह सत्य का गला दबाता है । इसिलिए वर्षों लगाकर इतिहास की किताब को पूर्ण करने जा रहे एड्मण्ड बर्क ने अपने घरके पिछे घटे एक हत्या के घटना पर प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा दिए जा रहे अलग अलग बयां और तर्कों को सुनकर अपने किताब को फाड डाला । Thought Co. में कुछ प्रसिद्ध विश्लेषकों के विश्लेषण अनुसार ः

History is nothing but a pack of tricks we play on the dead. (French original) —Voltaire (Francois Marie Arouet). 1757.

History, real solemn history, I cannot be interested in. I read it a little as a duty, but it tells me nothing that does not either vex or weary me. The quarrels of popes and kings, with wars or pestilences, in every page; the men all so good for nothing, and hardly any women at all—it is very tiresome.— Catherine Morland [Jane Austen] 1803.

HISTORY, n. An account mostly false, of events mostly unimportant, which are brought about by rulers mostly knaves, and soldiers mostly fools. —Ambrose Bierce. 1911. Devil’s Dictionary

विश्लेषकों का मानना भले ही अपने जगहों पर सही हों, पर उसे इतिहास ही माना जायेगा । क्यूँकि चूँकि इतिहासों की बातें भले ही शासकों का ही क्यों न हो, पर है तो विते हुए दिनों की, धरती छोडकर विगत के हो चुके शासकों की । बातें असत्य होने के बावजुद वह इतिहास है, क्योंकि असत्य भी मानव के धर्म, कर्म और जीवन से ही जुडे होते हैं ।

History is a narration of the events which have happened among mankind, including an account of the rise and fall of nations, as well as of other great changes which have affected the political and social condition of the human race.—John J. Anderson. 1876. A Manual of General History.

मोदी साहब ! इतिहास भावना नहीं, तथ्यों का ताला होता है । जैसा कि इतिहास विश्लेषकों का मानना है कि इतिहास हमेशा सत्य का उजागर नहीं करता, नेपाल का इतिहास, और खास करके नेपाल का आधुनिक इतिहास, झूठ और फरेबों के पुलिन्दों के आलावा और कुछ भी नहीं है । इतिहास के कुछ अध्येता दावा यह भी करते हैं कि नेपाल का नामाकरण ई.पू २७१ में हुआ था । “ने” नामक एक चर्चित ऋषि के नाम तथा “पाल”, जिससे नेवारी भाषा में “Ðन” समझा जाता था, को मिलाकर “नेपाल” कहा गया । कुछ इतिहासकारों का मानना है कि “पाल” उस समय के “पाली” भाषा का एक उत्तम शब्द था, जिसका अर्थ ”रक्षक“ या “पालनकर्ता” होता था, को ही “ने” नाम के साथ जोडकर “नेपाल” बनाया गया ।
“नेपाल” से पहले उसका नाम “सत्यवती” था । सत्यवती का भाषा ब्राम्ही था । आजके काठमाण्डौं के चावहिल में अवस्थित गुम्बा के एतिहासिक शिलालेख में उल्लेखित सम्राट अशोक की बेटी “चारुमति” के नाम ब्राम्ही भाषा में ही इतिहासविदों ने निकाला है । सम्राट अशोक ने अपनी बेटी चारुमति की शादी देवपाल से करके दहेज में उन्हें ३,६०० रोपनी जमीन दी थी । पाटन के चारो दिशाओं में बौद्ध चैत्य निर्माण करबाया । इससे भी यह प्रमाणित होता है कि आजका काठमाण्डौं भी मध्यदेशीय राजाओं के शासन में रहा । “सत्यवती” को बाद में लोगों ने सांग्रिला कहा । “सांग्रिला” ने बाद में “नागदह” का नाम पाया । “नागदह” से “काठमाण्डौ” में परिवर्तन हुआ और बाद में “नेपाल” ।
मोदी जी जैसे विश्व इतिहास के प्रखर वक्ता और आतंक के विरोधी विश्व नेता जब यह कहें कि भारत और नेपाल का सम्बन्ध हिमालय जितना ही पूराना, अटल और विशाल है तो मधेश के स्थान के बारे में भी स्पष्ट करना जरुरी होता है । अशोक जब लुम्बिनी और काठमाण्डौं गए थे, उस समय नेपाल नाम का कोई स्थान ही नहीं था । अशोक के द्वारा निर्माण किए गए काष्ठमण्डप के कारण ही आजका नेपाल काठमाण्डौं कहलाया और बाद में नेपाल । इतिहासकारों के अनुसार नेपाल नामाकरण के तिथी २७१ ई.पू. को ही सही माना जाय तो इसकी नामाकरण की अवधि २२८६ वर्ष होता है । वहीं नेपाल के मूल बासियों के नेपाल सम्बत को मानें तो इसकी नामाकरण २० अक्टूबर, ८७९ को हुआ था । नेपाल संबत के आधार पर इसकी उम्र सिर्फ ११३८ वर्ष हुए हैं जबकि काठमाण्डौं में पाए गए नवपाषाण युगों ‐ल्भयष्तिजष्अ तययकि) के सामग्रियों के अनुसार आजकी काठमाण्डौ की बस्ती ११,००० से ९,००० वर्ष पूरानी है । लेकिन इस बात से भी हमें स्पष्ट होना होगा कि उस समय न तो कोई काठमाण्डौं था, न नेपाल । न आज के नेपाली कहलाने बाले कोई मेसोपोटामियन या बेबोलोनियन उसके बासिन्दा थे, न तो शाह वंश के कोई राजा महाराजा । थे तो भारतीय उपमहाद्वीप के ही कोई भुक्तमान गुप्त‐गुप्तवंशी), महिशपालवंशी, यदुवंशी, लिच्छवीवंशी, देववंशी और बाद में मल्लवंशी राजे महाराजे लोग । नेपाल के असली एकीकरण नायक तो राजा यक्ष मल्ल ‐मधेशी ही थे, जिन्होंने अपने जीवन काल में नेपाल को एकीकरण किया था । उनके देहावसान पश्चात् नेपाल तीन खण्ड ः काठमाण्डौं, ललितपुर और भतmपुर में विभतm हो गया जो आज पर्यन्त कायम है । लिच्छवियों की राज्य सन् ८७९ तक होने का प्रमाण मिलते हैं । उसके बाद ही नेपाल सम्बत् शुरु होता है । लिच्छवियों का शासन तो नेपाल में छः शताब्दियों से भी ज्यादा रहा है ।
मोदी जी जब कहते हैं कि भारत और नेपाल का सम्बन्ध हिमालय जितना ही पूराना, शतिmशाली व अटुट है तो हमें इस बात से भी वाकिफ होना चाहिए कि पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार हिमालय की उम्र ४७ मिलियन वर्ष है । नेपाल अपने पूर्व नाम से किसी जमाने में रहे हों या ना रहे हों, मगर उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण के विन्ध्याञ्चल पर्वततक मध्यदेश था, जिसे आज मधेश कहते हैं । ‐मनुस्मृति, अध्याय–२, श्लोकः २१, २२ और २३ देखें) । मधेश का सम्बन्ध हिमालय से न प्राचीन काल में था, न आज ही है । वैसे ही मधेश के जमीन पर भी हिमाली और पहाडियों का कोई अधिकार नहीं है और न हो सकता है । प्राचीन काल से लेकर मध्य युगीन नेपालतक में भले ही मध्यदेशीय राजा महाराजाओं ने शासन किया हो, परन्तु मधेश से उसका कोई शासकीय सम्बन्ध नहीं था ।
दूसरी बात, जब नेपाल की सीमा ही कान्तिपुर, ललितपुर और भतmपुरतक थी तो हिमालय से नेपाल का सम्बन्ध होने का कोई प्रमाण ही नहीं दिख रहा है । हाँ, अन्तर्देशिय सम्बन्ध रहा होगा जिसे हम आज के युग में अन्तर्राष्ट्रिय सम्बन्ध कहते हैं । तीसरी बात, हिमाली या पहाडी राज्यों से मधेश का कोई सम्बन्ध नहीं ही था । अनेक राज्यों में विभतm यह एक स्वतन्त्र देश रहा, जिसे कभी किसी गोर्खाली या नेपालियों ने जित नहीं पाया । मधेश की भूमि मूगलों से होते हुए अंग्रेजों के नापाक इरादों का शिकार हो गयी, जिसे अंग्रेजों ने अपने शासकीय फायदों के लिए कभी दो लाख रुपयों के बदले तो कभी नेपाली शासक द्वारा भारत में हो रहे सिपाही विद्रोह को दबाने तथा अंग्रेजों को सहयोग करने के पुरस्कार स्वरुप मधेश की भू्मि नेपाल को प्रदान कर दी गयी ।
दुःख की बात यह है कि भारत के आजादी के बाद सशतm प्रधानमन्त्रियों में से एक रहे प्रधानमन्त्री मोदी जब यह कहते हैं कि भारत और नेपाल का सम्बन्ध हिमालय जैसा है, जबकि इनकी सम्बन्ध न हिमालय के उम्र से है, न मधेश से । नेपाल का सम्बन्ध भारत से अगर है भी तो उसके पैसों से, उसके सामरिक ताकतों से और नेपाल में सरकार बनाने, टिकाने, चलाने या गिराने से । हिमालय अपने आप में शान है । मगर कोई देश अपने को हिमालय के शान, सुन्दरता, उँचाई, स्वतन्त्रता और प्रसिद्धी से तुलना करे तो असमञ्जस की स्थिती स्वाभाविक रुप से आ जाती है कि वह नेपाल, जो किसी के भूमी को उपनिवेश बनाकर शासन करता हो, उसपर अपना नीच प्रशासन का बोझ लादा हो, उसके भूमि और जनता से चरम विभेद करता हो, उसका हद से ज्यादा दोहन करता हो, दूसरे के स्वतन्त्रता को नापसन्द करता हो – वह देश हिमालय से तुलना करने का औकात कैसे पा सकता है ? जो पडोसी बडे राष्ट्र हिमालय सा अटल उँचाई, स्वतन्त्रता और अटुट सम्बन्ध का चर्चा करता हो, अन्याय होते देख भी अनदेखा करता हो, वो अपने और अपने छद्मभेषी पडोसी का स्तर का जिक्र हिमालय से करके अपने मानको कैसे बडा कर सकता है ? वैसे भी हिमालय को अपना शान मानकर भिख माँगना, बेइमानी करना, झूठ बोलना, स्वाभिमान का नंगा ढोल पिटना, पानी और जवानी को अन्तर्राष्ट्रिय बाजारों में कौडी के भावों बेचकर यहाँ गर्व किया जाता है ।
मोदी जी, इतिहास भावना से नहीं, तथ्यों से जुडे होते हैं । धर्ती, पहाड और प्रकृति के बाद दुनियाँ के सबसे पूराने श्यान म्यारिनो, इजिप्ट, मधेश, जापान, चीन, इरान जैसे देशों से भारत का क्या और कैसा सम्बन्ध है, उसपर लगे ताले को खोलकर देखें तो हिमालय का प्रतिष्ठा और बढेगा । हिमालय आपका भी है । वह पाँच देशों का शान है, भले ही नेपाल अपने को हिमालय का देश कहकर दुनियाँ को ठगते रहे ।
मधेश भारु रुपयों के आतंक का बुरी तरह शिकार है । हाथ हथियार और भौतिक आतंक से भी बडा आतंक भारत और नेपाल के शासक व मुद्रा तस्करों ने भारतीय मुद्रा आतंक मच रखा है । भारत सरकार से नेपाली शासक और भारत–नेपाल दोनों के मुद्रा तस्कर राष्ट्र बैंक के खरीद दर पर लाकर भारतीय मुद्रा को रु. ४ से रु.७ सैकडे के भावों से बेचते हंै । भारत से सटे मधेशियों को मुद्रा डकैती का शिकार होते हुए वर्षों हो रहे हैं । यह आतंक भारत और मधेश दोनों के लिए भविष्यीय खतरे का संकेत है

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