मोर्चा का मल्हार

randhir chaudhariरणधीर चौधरी:संबिधान सभा एक में अहम किरदार निभानेवाले माओबादी और मधेशी पार्टर्ीीो पीछे छोडÞते हुये दूसरे संबिधान सभा मंे कांगे्रस और एमाले एक सेफ मेज्योेरिटीके साथ आए हंै । मधेशी और माओवादिओं को तो मानो एक सदमा लग गया हो । चुनाब के ४/५ महीने बाद तक पूरी तरह से बेरोजगार हो गये थे माओवादी और मधेसी । यँू कहें तो राजनीतिक सुर से भटक रहे थे । मधेसी पार्टर्ीीे तथाकथित महारथी ठाकुर, महतो और यादब के द्वारा पूरी न होने वाली एकता के सुर को आलापना शुरु किया गया । और इस मामले में भी उनका राग बेसुरा ही साबित हुआ । दूसरी ओर हम अगर माओवादी की बात करें तो उनका हाल भी कुछ वैसा ही देखने को मिला । बिराटनगर सम्मेलन माओबादी के लिए एक अपशगुन ही  रहा । पार्टर्ीीे भीतर चल रहे गुट उप-गुट की राजनीति सर चढÞ कर बोलने लगी । सदा समानान्तर शक्ति की बात करने बाले बाबुराम भट्र्राई तो नयी शक्ति की वकालत करना शुरु कर दिये । कुल मिलाकर देखा जाय  तो माओवादी अपनेी पार्टर्ीीें चल रहे अन्तरद्वन्द्व को सुलझाने में व्यस्त दिखे । कई हिस्सों मंे बँट चुके माओवादी फिर से फूट के कगार पर दिख रहे थे और हैं । ४/५ महीने तक पूरी तरह से बेरोजगार रहे माओवादी अपना सारा सेकेन्ड, मिनेट और घण्टा पार्टर्ीीो फूटने से बचाने में गँवा दिए । जहा“ तक मेरा मानना है , इस मोर्चा को दो भागों में बाँट कर देखना चाहिए । मधेशी और माओवादी ।madhesh morcha
मधेशी ः यह तो सब को पता है कि  पिछले संबिधान सभा के चुनाब मंे नाटकीय ढंग से अच्छे बहुमत लाने वाले मधेसी दल शत प्रतिशत सत्ता में सिमटकर रह गये थे । वे तो सिर्फ९९% सत्ता में समर्पित रहे बाँकी का १% मधेशी जनता को अन्धकार मंे रखने के लिये “एक मधेस एक प्रदेश” का नारा लगाते रहे । सिर्फएक प्रतिशत की ध्वनि मधेशी जनता के कानों को नहीं छू सकी और इस बात को दूसरे संबिधान सभा के चुनाव में मधेसी जनता द्वारा प्रमाणित भी कर दिया गया । संविधान सभा में अपनी उपस्थिति देख कर मधेसी दल को जबरदस्त धक्का लगा उससे वो आज तक नहीं उबर पाए हैं । डिफिट र्साईकलोजी से घिर चुके मधेशी दल को कुछ रास्ता नहीं मिल रहा था । अपने आपको मधेशी राजनीति के दिग्गज कहने वालों ने तो लाजिम्पाटका दौरा भी लगाना शुरु कर दिया था ।  परन्तु अन्तरपार्टर्ीींर्घष्ा में रहे लाजिम्पाट सम्राट प्रचण्ड द्वारा ग्रीन सिग्नल ना मिलने के कारण प्रतीक्षा मंे दिवस गँवाते रहे । जब जुलाई १० को लाजिम्पाट से मोर्चाबन्दी के लिये फरमान जारी हुआ तो ऐसा लगा जैसे कि किसी सीरियस मरीज को वेन्टीलेटर मिल गया हो । मानो उनमे प्राण आ गया हो । माओवादी के साथ मोर्चाबन्दी के लिये तैयार हो गये, यह भूल गये कि इनको पहला मोर्चा मधेसी जनता के साथ बनाना है । मोर्चा की आडÞ मंे छुपकर फिर से मधेसी जनता  को भूलभुलैया की राजनीति में रखना चाहते हैं ।
माओवादी ः मातृका और मोहन वैद्य द्वारा पार्टर्ीीोडÞने के बाद प्रचण्ड अपने आपको कमजोर समझने लगे थे । बाबुराम भट्टर्राई के द्वारा नई पार्टर्ीीे निर्माण करने की बात ने तो उन्हें कहीं का नही छोडÞा । बाबुराम की भी एक अपनी ही राजनीति रही है । माओवादी जनयुद्घकाल से ही पार्टर्ीींे अपनी अलग अस्तित्व की तलाश में लगे हैं लेकिन इनको शायद अपनी मंजिल दूर नजर आ रही है, शायद यही कारण हो सकता है, भट्टर्राई जी नयी शक्ति की तलाश मंे लगे हंै । ऐसी अवस्था मंे अपने आपको प्रमाणित करने के लिये प्रचण्ड को मोर्चा से अच्छी बैसाखी शायद मिलती भी नहीं । पिछली संबिधान सभा में मधेसी दलों के साथ मोर्चा की राजनीति कर चुके प्रचण्ड को फिर से मोर्चा बनाने मे कोई मसक्कत भी नहीं करनी  पडÞी । एक ऐलान पर मधेसी दल प्रचण्डः शरणम गच्छामि हो गये ।  और प्रचण्ड के नेतृत्व में मोर्चा गठन किये । प्रचण्ड और भी माओवादी नेताओ के साथ कार्यगत एकता किए हैं , इन सभी मोर्चा और एकता में प्रचण्ड ही केन्द्र में रहे हैं । प्रचण्ड किसी तरह भी नेपाली राजनीति में अपने आपको अस्तित्व मे रखना चाह रहे हैं ।
मोर्चा और मधेशी राजनीति ः मधेसी दल अगर मधेसी जनता के साथ मोर्चा नहीं बनाने में लगे तो यह एक सही कदम कभी नहीं हो सकता । अब आगे देखना है, मधेसी दल इस मोर्चा के मल्हार को कितने सुर में सजा सकते हैं । इस मुद्दे पर मानव अधिकारकर्मी तथा वकील दीपेन्द्र झा का मानना है कि, मधेशी नेताओं को इस मोर्चा से अधिक से अधिक लुत्फ उठाना चाहिये । उनका मानना है कि भले ही यह मोर्चा डिफिट र्साईकलोजी से घिरे नेताओं के बीच हुआ हो लेकिन हमंे इस के उद्देश्य के बारे मंे समझना होगा । वकील झा के अनुुसार, इस मोर्चा का प्रथम उद्देश्य संघीयता पक्षधरांे को एक जगह खडÞा कर संघीयता विरोधियों को खबरदार कराना है । उनकी मानें तो इस मोर्चा के गठन के तुरन्त बाद से ही सरकार में रहे कांगे्रस और एमाले को बहुत बुरा झटका लगा है । वे सोचने लगे हैं कि, अगर पहचान सहित की संघीयता के उपर कोई बखेडÞा खडा हुआ तो देश में अनिष्ट हो सकता है ।

विकिास की दौडÞ में पिछडÞा जनकपुर
डी.जे. मैथिल
कु
छ दिनों से राष्ट्रीय स्तर की पत्रपत्रिकाओं में जनकपुर की बातें छपती आ रही हैं । जनकपुर का विकास अवरुद्ध है । कुछ भी नहीं हो पा रहा है । तीस वर्षपहले जो अवस्था थी, आज भी वही है ।
यहाँ कृषियोग्य जमीन पर्याप्त है । इसे अन्न का भण्डार कहा जाता है । पर सिचाई की असुविधा के कारण सभी बेकार है । सडÞक, नाला और ऐतिहासिक पोखरों की अवस्था चिन्तनीय है । गाँवों में  कुछ परिर्वतन तो आया पर जनकपुर शहर ज्यों का त्यों है । जनकपुर सिगरेट कारखाना देखते देखते उजडÞ गया । वही हाल जनकपुर रेलवे अर्थात् नेपाल रेलवे का है ।
एक छोटे से गाँव में विकास बजट दस लाख, बीस लाख तक सरकार देती है, पर जनकपुर के लिए क्या यह बजट नहीं है – अगर कोई बजट नहीं है तो हम मौन व्रत लेकर क्यों बैठे है – नगरपालिका मंे बृहत्तर जनकपुर के नाम पर करोडÞों का बजट आया है । पैसा आया तो कहाँ गया – बाहर के लोग हम पर थूकते हैं, यह कह कर कि जनकपुर के नागरिक कितने लापरवाह हैं । बुद्धिजीवी कहलाने वाले कैसे जीव हंै – वहाँ की राजनीति कैसी है – सभी के सभी चेतनाविहीन हैं क्या – सरकारी बजट कोई एक व्यक्ति खा-पी कर बैठ जाता है । पर वहँँा के नागरिक कुछ बोलते नहीं हंै । बडÞे गर्व से कहते, फिरते हैं- हम को क्या मतलव । कितने दुःख की बात है । सरकार भी चुप और जनता भी चुप ।
वही बजट भैरहवा में भी है, बुटबल में भी है । लेकिन यहाँ का विकास देख कर मन खुश हो जाता है । यहाँ पैसे का सदुपयोग हुआ है । सरकारी बजट पर जनता की नजर है । सडÞक पर सिमेन्ट, बालू मिलाते वक्त एक आम आदमी खडÞा हो कर यह देखता है कि क्वालिटी ठीक है या नहीं । नालियाँ जाम हंै तो तुरन्त इस बात की खबर सम्बन्धित निकाय तक हो जाती है । इसकी मरम्मत भी तत्काल हो जाती है । भैरहवा बुटवल को जनकपुर से तुलना किया जाय तो  विकास की बातों में बहुत अन्तर है । यहाँ भी वृहत्तर जनकपुर विकास परिषद की तरह लुम्बिनी विकास परिषद् है । पर लुम्बिनी विकास परिषद् का काम अच्छा है और जनकपुर की बात मत पूछिए ।
जनकपुर क्षेत्र के निवासी अमरनाथ कहते हंै- ‘जनकपुर नरकपुर है । क्या है जनकपुर में – सडÞक जर्जर, नाले कहीं है हीं नहीं । बरसात में घर घर में पानी घुस जाता है । सरकारी निकाय मौन है । जनता भी हाथ पर हाथ रख कर बैठ गई है । एक दिन भी जनकपुर में ठहरने की इच्छा नहीं होती है । इसलिए मैं भैरहवा घर बना कर बस गया हूँ, सदा के लिए ।’
संसार भर मंे जनकपुर को प्रसिद्धि प्राप्त है । मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का ससुराल जनकपुरधाम कैसा होगा – लोग आते हैं। पर जनकनगरी को देखकर निराश हो जाते हैं । तीस वर्षसे जनकपुर की अवस्था वही है, जो पहले थी । गन्दगी और मच्छरों से भरी यह मिथिला की पौराणिक राजधानी ‘मच्छर की राजधानी’ के रूप में स्थापित हो गई है ।
भैरहवा भी तो नेपाल ही हैं । यहाँ के नागरिक भी नेपाली ही हंै । सरकार का जो बजट जनकपुर में है, वही लुम्बिनी में भी है । पर भैरहवा, बुटवल जैसे सम्पर्ूण्ा लुम्बिनी क्षेत्र की नालियाँ, सडकों की  सफाई सन्तोषजनक है । विकास का क्रम जारी है । हाथ पर हाथ रख कर यहाँ की जनता बैठी नहीं है । विकास की ओर सभी की नजर है । जनकपुर क्षेत्र के ही वासी फिलहाल भैरहवा में ही बस गए हैं । मगर दर्ुभाग्यवश जनकपुर में परिवर्तन नहीं हो पा रहा है ।
जनकपुर के ही कन्हैया भैरहवा में नौकरी करते है । उनका भी कहना है कि वे भी भैरहवा में ही घर बनाएंगे । जनकपुर की गन्दगी और मच्छर दोनों प्रसिद्ध हैं । जनता अचेत है । इसलिए जनकपुर में रहने की इच्छा नहीं है । परिवर्तन हुआ तो विचार करंेगे ।
भैरहवा लुम्बिनी क्षेत्र -नेपाल) का केन्द्र बिन्दु है । बुटवल भी इसी क्षेत्र के अर्न्तर्गत है । इस जगह के विकास को जनकपुर से तुलना करने पर जमीन-आकाश का र्फक दिखाई देता है । सिर्फसडÞक और नाले की बात नहीं है । यहाँ वातावरण भी अच्छा है । बुटवल-भैरहवा से सुनौली तक फोर लाइन पक्की सडÞक बन रही है । निर्माण कार्य जोर-शोर से चल रहा है । सरकार का बजट सही ढंग से इस्तेमाल हो रहा है । यह क्षेत्र खास करके गौतम बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध है । लुम्बिनी ही गौतम बुद्ध का जन्म स्थान है । जिस तरह माँ जानकी की जन्मभूमि जनकपुर है । इस क्षेत्र के स्कुल, काँलेज, उद्योग, हवाईमार्ग, रेलवे ग्राउण्ड, चौक-चौरÞाहा सभी का नाम बुद्ध, लुम्बिनी, सिर्द्धार्थ के ही नाम पर अक्सर देखा जा रहा है । यहाँ की स्थानीय भाषा अवधी है पर हिन्दी और नेपाली भाषी भी कम नहीं हंै । इस मामले में भी भैरहवा-जनकपुर से आगे है । भाषा-संस्कृति के प्रति सभी नागरिक सचेत हैं । यहाँ बेरोजगारी कम है । खेत-खेत में सिचाई की सुविधा है । हरा-भरा है लुम्बिनी क्षेत्र, पर जनकपुर क्षेत्र अभी भी झूठ की खेती में लगा है । व्यक्तिगत बातंे करने में सब तेज तर्रर्ााहैं पर सामूहिक काम में बिल्कुल नाकारा ।
यह भी कहा जाता है- ‘विराटनगर में जूट खेती, वीरगंज में चीनी खेती और जनकपुर में झूठ खेती ।’ सचमुच जनकपुर में झूठ की खेती ही होती है । नहीं तो इतने सालों से विकास क्यों नहीं हुआ – बडÞे-बडÞे नेता जनकपुर में हंै । सभी बडÞी-बडÞी बातें करते हैं । पर सत्यता किसी में भी नहीं है । सब की बातें झूठ साबित हो रही हैं । इतने दिनों से राजनीतिक दलों ने जनकपुर में क्या किया – भैरहवा की तुलना में कुछ नहीं । लुम्बनी विकास कोष की चर्चा सभी जगह है । अच्छा काम हो रहा है । पर बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र ने क्या किया है – आज सडÞक चौडÞी करने के नाम पर, पोखर सौर्न्दर्यता के नाम पर तोडÞफोडÞ तेजी पर है । सडÞक चौडी करना अच्छी बात है । पर सिर्फइसी काम में विकास सीमित न रह जाए इसी का डर है ।
अभी नेपाल का गाँव-गाँव, शहर-शहर खुला दिशामुक्त क्षेत्र घोषित किया जा रहा है । अच्छी बात है । इससे चेतना बढÞ रही है । सफाई भी अच्छी दिख रही है । पर जनकपुर क्षेत्र में शौचकेन्द्र विकास हो रहा है । दिसामुक्त के बदले दिसा विकास क्षेत्र बन रहा है । इस बात का जनकपुर में कोई असर नहीं है । सफाई की तरफ कोई सोच नहीं आ रही है । इससे भी जनकपुर कमजोर मानसिकता का केन्द्र साबित होता है ।
एक राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में तुलानारायण साह का लेख पढÞा । ‘जय जनकपुर’ कह कर कुछ बाते लिखी थीं । विकास हो रहा है, सडÞक भी निर्माण हो रही है । पर यह बात संविधान निर्माण की बातें जैसी है । बन रही है, बन रही है पर परिणाम शून्य है । लेखक बन्धुओं से आग्रह है- हरा चश्मा लगा कर जनकपुर को मत देखें । वास्तविक बातें हम नहीं लिखेंगे तो दूसरा कौन लिखेगा –
पञ्चायत काल से आज तक जनकपुर के नागरिकों की यही बुरी आदत है । वही नेता को वोट देता है । वही नेता को देवता मानता है । इलेक्सन के समय नेता कुछ कार्यकर्ताओं को खिला-पिला देते हैं, गाडी पर चढÞा लेते हैं । बस इसी बात से जनता खुश और सन्तुष्ट । विकास का काम जाए भंाडÞ में । कुछ हो या नहीं, इससे कोई र्फक नहीं पडÞता है जनता को । इसी को चेतना की कमी कहा जाता है । दर्ुभाग्य की बात है ।
इसी जगह पर कुछ वर्षतक शेरे धनुषा कहे जाने वालों ने मनचाहा राज किया । पति-पत्नी दोनों ने राजा-रानी की तरह राज किया । जनता उनकी जय-जयकार मनाती रही । पर विकास के नाम पर कुछ नहीं किया गया । इसी जगह पर महेन्द्रनारायण निधि और विमलेन्द्र निधि वर्षों से जीत हासिल कर रहे हंै । जनता का विश्वास जीतने में सफल रहे हैं । इस क्षेत्र के सफल नायक हंै वे, पर दर्ुभाग्यवश विकास और परिवर्तन के नाम पर कुछ नहीं । राजषिर् जनक युनिभर्सिटी निधि नहीं बना पाये, जबकि खुद वे शिक्षामन्त्री भी रहे थे । क्या कारण है, इसकी सफाई उन्हें देनी होगी जनता के समक्ष । डा. रामवरण यादव इसी क्षेत्र के राष्ट्रपति हैं । फिर भी जनकपुर में कोई भी विकासमूलक परिवर्तन नहीं हुआ । फिर भी जनता उन्हीं की जय-जयकार करती है । उन्हीं को ‘लंग लाइफ’ रहने का र्सर्टिफिकेट जनता ने दे दिया है । सभी सचेत नागरिकों द्वारा अपनी राजनीति से ऊपर उठ कर क्षेत्र का सामूहिक विकास कैसे होगा, इस पर चिन्तन-मनन और कार्यान्वयन अविलम्ब होना चाहिए । तब कोई बात बनेगी और तब जनकपुर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व बरकरार रह सकता है ।

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