मोर्चा की अस्पष्ट नीति मधेश की हवा को डा. राउत से जोड़ती है : श्वेता दीप्ति

६० दिनों से हिरासत में रहे राउत को दस हजार की जमानत रकम के साथ छोड़ा जाता है और फिर तत्काल ही गिरफ्तार कर लिया जाता है । यह कैसा लोकतंत्र और कैसा कानून है ? इन सभी तमाशों के बीच जनता सहज ही मोर्चा की बात मानने को तैयार नहीं है क्योंकि, मौत का स्वाद तो जनता चख चुकी है इसमें नेताओं का क्या जाता है ?

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श्वेता दीप्ति, काठमांडू , १ वैशाख , १४ अप्रैल | निर्वाचन की घोषित तिथि जितनी नजदीक आती जा रही है, उतनी ही तेजी से असमंजस की भावना भी बढ़ती जा रही है । संविधान संशोधन के नए विधेयक को मोर्चा ने अस्वीकार कर दिया है, वहीं प्रधानमंत्री का दावा है कि यह विधेयक मोर्चा की सहमति से लाया गया है, उनका कहना है कि सीमांकन को आयोग के जिम्मे लगाकर निर्वाचन में जाने के लिए मोर्चा सहमत हो चुकी है इसलिए नए संविधान संशोधन के विधेयक को संसद में पंजीकृत कराया गया है । वैसे देश की प्रमुख पार्टी एमाले ने भी इस विधेयक के सम्बन्ध में अपनी अनभिज्ञता जताई है । संविधान संशोधन विधेयक पर मोर्चा की अस्वीकृति ने विधेयक के औचित्य को समाप्त कर दिया है । प्रधानमंत्री अब भी प्रयत्नशील हैं और मोर्चा को वार्ता में आने का निमंत्रण दे रहे हैं ताकि निर्वाचन की प्रक्रिया सहज हो सके ।

किन्तु मोर्चा दिशाहीन आन्दोलन की ओर अग्रसर दिखाई दे रही है । कभी तो इनकी तैयारी ऐसी लगती है कि ये अन्ततोगत्वा निर्वाचन में हिस्सा लेंगे तो कभी आन्दोलन की ओर अग्रसर होते दिखाई देते हैं । मधेश की माँग का सम्बोधन आवश्यक है, क्योंकि मधेश की जनता आश्वासन से उब चुकी है । हर बार उम्मीद और विश्वास का खिलौना थमा कर सत्ता पक्ष उन्हें दिग्भ्रमित करती रही है ।  इस स्थिति में मधेश की जनता के साथ मोर्चा के नेता अगर बेइमानी करते हैं तो इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा, यह वो अच्छी तरह जानते हैं । प्रचण्ड सरकार को उनका समर्थन जिस भरोसे पर मिला था वो अध्याय कब का खत्म हो चुका है । परन्तु अफसोस इस बात का है कि जो सार्थक कदम मोर्चा को उठाना चाहिए उसकी ओर ये अब तक गम्भीरता से प्रयासरत नहीं हैं ।

टुकड़ों में बँटी शक्ति का एकीकरण ही इन्हें मधेश के हित में काम करने का मजबुत आधार दे सकता है । परन्तु आज तक ये सभी पार्टीगत और व्यक्तिगत स्वार्थ की राजनीति में अटके हुए हैं । विगत की गलतियों से आज भी ये सीख नहीं ले रहे । अभी भी पार्टी में कार्यकर्ताओं  के प्रवेश कराने तक ही इनकी नीति सिमटी हुई है । वक्त बेवक्त हथियार उठाने की धमकी आखिर कितनी कारगर सिद्ध हो सकती है और यह कितना उचित है ? मोर्चा की अस्पष्ट नीति मधेश की हवा में कुछ और घोल रहा है, जिसके तार डा. राउत से जाकर जुड़ते हैं । देखा जाय तो डा.राउत की गिरफ्तारी ने मधेशी जनता को उकसाने का काम ही किया है । पहले सदियों से चले आ रहे विभेद और अवहेलना का असंतोष, फिर देश के तीन प्रमुख पार्टियों की बदनियति और खुद के अस्तित्व पर अविश्वास का असंतोष, सत्तापक्ष के द्वारा ठगे जाने का दर्द और अपनी मिट्टी से जुड़े नेताओं की अदूरदर्शिता मधेश की जनता को उस ओर धकेल रहा है जो निश्चय ही देश की अखण्डता के लिए खतरा साबित हो सकता है । ऐसे में मोर्चा के नेताओं की यह उक्ति कि हथियार उठाने के लिए हम तैयार हैं, मधेशियों के मन में यह बात जगा सकती है कि हथियार से तो बेहतर है उसका साथ दो जो अहिंसा की राह पर चलकर अपनी बात रख रहा है । इतना ही नहीं मधेश की जनता में इस बात को लेकर भी रोष व्याप्त है कि डा. राउत के मसले पर मोर्चा की ओर से कोई वक्तव्य क्यों नहीं आ रहा है । डा.राउत के मामले में कानून और सरकार की नीति भी कई सवाल पैदा कर रही है । ६० दिनों से हिरासत में रहे राउत को दस हजार की जमानत रकम के साथ छोड़ा जाता है और फिर तत्काल ही गिरफ्तार कर लिया जाता है । यह कैसा लोकतंत्र और कैसा कानून है ? इन सभी तमाशों के बीच जनता सहज ही मोर्चा की बात मानने को तैयार नहीं है क्योंकि, मौत का स्वाद तो जनता चख चुकी है इसमें नेताओं का क्या जाता है ?

तात्पर्य यह कि मोर्चा के नेता वो नीति तैयार करें जो सही में किसी निष्कर्ष पर देश को ले जा सके । उन्हें अगर मैदान में उतरना ही है तो, एकता के साथ उतरें ताकि कोई तीसरा फायदा ना ले जाय । क्योंकि यह सर्वविदित है कि दो की लड़ाई में किसी तीसरे को ही फायदा होता है । कद और पद की चिन्ता से अधिक उन्हें मधेश और देश की चिन्ता करनी चाहिए । वक्त जितना लम्बा खींचेगा हवा के रुख में बदलाव भी उतनी ही तेजी से होगा । सरकार निर्वाचन के पक्ष में चाहे जितने भी दावे कर लें यह एक कटु सच्चाई है कि मधेश की जनता इस निर्णय को स्वीकार नहीं कर पा रही है और इस स्थिति में मसौदा संकलन और संविधान जारी होने के वक्त जो माहोल था कमोवेश उसकी पुनरावृत्ति की सम्भावना अत्यन्त बलवती है और इस अंदेशे से इन्कार नहीं किया जा सकता है ।

 

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