मौखिक प्रदूषण !पी एम ओली शरीर से बुढ़ाते पर दिमाग से अपरिपक्व बनते जा रहे हैं

बिम्मीशर्मा, काठमांडू ,२९ फरवरी |

दुनिया में जल, हवा और ध्वनि प्रदूषण तो था ही अब एक और प्रदूषण से लोग सहमे हुए हैं । वह है मौखिक प्रदूषण । जिस मुँह को खाने और थूकने के लिए बनाया गया है उस मुँह से हम दूसरों को बुरा भला कह कर प्रदूषित कर रहे हैं । आंख, कान, हाथ और पैर दो दो हैं । पर हम इनका प्रयोग कम कर के एक मुँह जो सत वचन बोलने के लिए इस्तेमाल करने की जगह हम दुर्वचन बोलने मे ही खर्च कर रहे हैं । जो चीज अपने पास कम हो उसका कम इस्तेमाल और जो चीज एक से ज्यादा हो, उसका ज्यादा इस्तेमाल करने की बजाय हम उल्टा कर रहे हैं । जिस के कारण परिवार, समाज और देश सबसे ज्यादा मौखिक प्रदूषण से ग्रस्त हो गया है ।

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पिछले छ महीनों में हमनें मधेश आन्दोलन और नाकाबन्दी में अपने मुँह से दूसरों को गाली दे कर व कोस कर सबसे ज्यादा मौखिक प्रदुषण किया है । अपने से दूसरों को बदतर देखना व उन्हे नीच व हीन समझना ही मौखिक प्रदूषण का कारण हैं । जिस से समाज मे सबसे ज्यादा गंदगी फैल रही है । ध्वनि, हवा और पानी से हुए प्रदूषण से शरीर में रोग फैलता है पर मौखिक प्रदूषण से मन घायल होता है । इंसानियत मरती है आत्मा तड़पती है ।

हमारे देश में मौखिक प्रदूषण को इजाद करने मे सर्व प्रथम नाम महामहिम केपीशर्मा ओली का आता है । पी एम ओली शरीर से तो दिन पर दिन बुढ़ाते जा रहे हैं । पर दिमाग से दिन पर दिन अपरिपक्व बनते जा रहे हैं । जिसका अंदाजा उनके भाषण और अपने विरोधियों पर उनकी तंज कसने की आदत से लगा सकते है । वे सिर्फ खुद को ही इस देश का तारणहार मानते हैं और बांकी को देश का दुश्मन । कभी हवा से तो, कभी सौर्य उर्जा तो कभी रसोई तक गैंस की पाईप लाईन बिछाने की हवा, हवाई बातें करके पिएमओली देश में से सब से ज्यादा प्रदूषण कर रहे हैं ।

हाथ, पैर तो किसी का हिलता नहीं पर जबान सभी की हिलती रहती है । इस देश में पौने ३ करोड़ जबान और साढ़े ५ करोड़ आंख, कान और हाथ पैर है । पर पौने ३ करोड़ जबान साढे ५ करोड़ पर भारी है और इसी लिए उस पर हावी है । जहां जाइए बस लोग बोलते और जबान हिलाते हुए ही दिखाई पड़ेंगें । जबान भी झूठ बोलने और दूसरों की बखिया उघेड़ने में ही खर्च करेंगे । अपने कपड़े भले फटे हुए हों कोई बात नहीं पर दूसरों के जीवन की गोप्य बातों की सिलाई उधेड़ने में लोगों को महारत हासिल है । वह इंसान ही क्या जो दूसरे को दुखी देख कर खुद को खुशी महसूस न करें ।

मधेश आंदोलन के दौरान जिस तरह मधेश मधेशियों को गाली दी गई और उन्हें देश का नागरिक न मानने तक की बाते कही गई । उस से तो लगता था इस देश में सिर्फ जबान बांकी है और कुछ नहीं । यहां के लोग पैदा होते समय आंख, कान और दिमाग ले कर भले न पैदा हुए हों । पर मुँह और गज भर की जबान ले कर जरुर पैदा हुए हैं । जिस मुँह से खाते हैं उसी मुहँ से औरों के लिए आग उगलते हुए लोगों को थोड़ी सी भी लज्जा नहीं होती ? हद तो तब हो जाती है जब अपना भला सोचने और करने वाले, मुश्किल में मदद करने वाले के खिलाफ भी यह अपनी कैंची जैसी जवान चला कर सम्बन्ध को बदनाम करने से नहीं चूकते । उस समय मानवता आत्महत्या करने के लिए किसी कुएं या बावड़ी के पास सिर झुकाए खड़ी रहती है । वह इंसानों के नापाक बोझ से थक चुकी है ।

हमारे देश में ही नहीं सारे संसार मे मौखिक प्रदूषण हो रहा है । जिस के पास आणविक हतियार है वह उस से वार करता है और जिस के पास नहीं है वह इस से भी खतरनाक अपनी जबान के हथियार से वार कर रहा हेै । लोग खाने और भगवान का नाम लेनें में १० मिनट नहीं लगाते । पर दूसरों को बद्दूआ देने के लिए १० घंटे भी कम पड़ जाते हैं इन लोगों को । औरों को छेड़खानी करना, गाली देना यह बचपन से ही सीख जाते है । भले ही इन को वर्णमाला पढ़नी न आती हो । दूसरों से ईशारों में बात करना चुगलखोरी करके मौखिक प्रदूषण फैलाना ही इन लोगों का प्रिय शगल हैं ।

सबसे ज्यादा मौखिक प्रदुषण करते हैं नेता । चुनाव के दौरान अपने क्षेत्र के जनता को आसमान से तारे तोड़ कर ले आने का वायदा करते हैं । लंबे, लंबे फेक भाषण देकर मुर्ख जनता को उस में लपेटते हैं । और जब चुनाव जीत जाते हैं तब अपने क्षेत्र से गधे के सिर से सिंग कि तरह गायब हो जाते है । चुनाव से पहले विभिन्न पार्टी के नेता मौखिक प्रदूषण करते हैं और चुनाव के बाद उन के क्षेत्र की जनता आश्वासनों के पूरा न होने से बिदक जाती है और मौखिक प्रदूषण फैलाती हैं । उसके बाद सबसे ज्यादा मौखिक प्रदूषण संसद में होता है जब संसद सत्र चलता है । यहां पर अलग, अलग पार्टी के लोग एक दूसरे पर पलट वार करके और मनिमेख निकाल कर संसद भवन को आणविक भट्टी बना देते हंै । संसद में बजट सत्र के दौरान भी मौखिक प्रदूषण ज्यादा होता है । जब अपने क्षेत्र में विकास के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसा ले जाने के लिए कुत्तों की तरह हड्डी के लिए लड़ने लगते हैं ।

भले ही अपने क्षेत्र और जनता क िहित के लिए बजट में ज्यादा से ज्यादा हिस्सा मागंने की बात करने हो । पर उनकी असली मंशा तो हड्डी जनता को फेंक कर खुद मांस खाने के लिए लार टपकाना ही इनका उद्देश्य है । हर कोई चाहे वह नेता हो या बुद्धिजीवी या पत्रकार और लेखक । सब के सब दूसरों को झूठा और भ्रष्टाचारी ठहराने और खुद को हरिशचंद्र का वंशंज सावित करने के लिए एड़ी, चोटी का जोड़ लगाते हैं । और इस में लोगों का मुफ्त का मनोरंजन तो होता ही है । साथ में मौखिक प्रदुषण भी लगे हाथ हो जाता है । अब आग में हाथ सेक रहे हैं तो धूंए को सहना ही पडेÞगा न ? तो देखा मौखिक प्रदुषण कैसे कहर बरपा रही है और पूरे विश्व को अपने खूनी जबान में लपेट कर इंसानियत को तार तार कर रहीं हैं । इस मौखिक प्रदुषण से कौन बच सका है ? (व्यग्ंय)

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