मौजूदा नीति, तिथि और सहमति का चुनाव, सफल होगा ?-मुकेश झा

भले ही सरकार और निर्वाचन आयोग कितनी भी बड़ी–बड़ी बातें कर ले, प्रशासन के बल पर सेना लगाकर निर्वाचन संपन्न करा ले, लेकिन इस निर्वाचन को सफल निर्वाचन नहीं कहा जा सकता । सफल निर्वाचन वह है, जिसमें जनता स्वतःस्फूर्त रूप से बड़ी तादाद में भाग लेकर अपना मनपसन्द प्रतिनि–ि चुने

लोकतन्त्र का प्राण मान, गुमान और अस्तित्व सब कुछ हैै चुनाव । लोकतान्त्रिक प्रणाली में जनता अपनी इच्छा अनुसार सोचने वाले, काम करने वाले अपने नजर में ईमानदार व्यक्ति को अपना मत देता है और उनको निर्णायक जगह पर पहुंचाता है । नेपाल में अभी चुनाव की सरगर्मी बढ़ी है और सरकार, पार्टी, मीडिया, चौक चौराहे हर जगह चुनाव की चर्चा हो रही है । हर चर्चा में एक सवाल है, जिसका जवाब नहीं मिल रहा है । क्या चुनाव सफल होगा ? सरकार ने देश में चल रहे अन्तर संघर्ष को दरकिनार कर चुनाव की घोषणा तो की परन्तु जनदबाव के कारण एक चरण में होने वाले चुनाव को दो चरणों में किया जा रहा है । आन्दोलित क्षेत्र एवं मधेश से लगे हर क्षेत्र में चुनाव दूसरे चरण में होगा जब कि मधेश से नहीं जुड़े या आंशिक रूप से जुडे सुरक्षित क्षेत्र में चुनाव पहले चरण में । चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध रहे गृहमन्त्री विमलेन्द्र निधि इस्तिफा से चुनाव में कुछ असर नहीं होने का संकेत राज्य पक्ष द्वारा किया जा रहा था परन्तु उनकी वापसी के बाद हालात पुनः पहले जैसा ही हो गया है ।
चुनाव को सफल रूप से सम्पन्न कराने के लिए तीन मुख्य बातें होनी है, जिसके बगैर चुनाव की सफलता पर आशंका रहती है । वह है– नीति, तिथि और सहमति । साफ है कि सरकार ने जो चुनाव की घोषणा की है, वह सफलता की ओर जा रही है या असफलता की ओर । तिथि का विश्लेषण अगर हम करते हैं तो आज के दिन में नेपाल संघीय देश के रूप से परिभाषित है । संघीय राष्ट्र में चुनाव की जो नीतियां होनी चाहिए क्या नेपाल का उसी नीति नियम के अंतर्गत रहकर निर्वाचन कर रही है ? क्या वर्तमान निर्वाचन लोकतान्त्रिक पद्धति से हो रहा है ? क्या नेपाल सरकार ने निर्वाचन के लिए जो ऐन कानून बनाए थे, उसके अनुरूप निर्वाचन हो रहा है ? विल्कुल नहीं । अगर उपर्युक्त प्रश्न पर विचार करें तो सरकार द्वारा घोषित इस निर्वाचन को असंवैधानिक और अलोकतान्त्रिक कहने में कोई संकोच नहीं होनी चाहिए ।
असंवैधानिक इसलिए कि निर्वाचन ने संविधान के मर्म को अर्थात् संघीयता को नहीं समेटा है ओर अलोकतान्त्रिक इसलिए कि जनभावना को भी नहीं समेटा है । संघीय प्रणाली के अनुसार स्थानीय निर्वाचन प्रदेश सरकार के नेतृत्व में होता है । परंतु नेपाल में प्रदेश सीमा में विवाद है, जिसको सुलझाए बगैर निर्वाचन की घोषणा ही नहीं होनी चाहिए थी । इस अवस्था में प्रादेशिक सीमा के विवाद को छोड़कर बड़ी ही चतुरता से सरकार ने स्थानीय निर्वाचन घोषणा कर दी है । संवैधानिक रूप से स्थानीय निकाय जैसे गांवपालिका, नगरपालिका, उपमहानगरपालिका, इत्यादि का सीमांकन और संख्या भी प्रदेश एवं केन्द्र दोनों की सहमति से होनी चाहिए क्योंकि प्रदेश अपने स्रोत, साधन, जनसंख्या अवस्था के आधार पर इसका निर्णय ले तो अच्छा रहता । परन्तु नेपाल में संघीय सरकार की अवधारणा अनुरूप अभ्यास नहीं होने के कारण केन्द्र ही हरेक बातों का निर्णय ले रहा है जिसको लोकतान्त्रिक नहीं कहा जा सकतत ।
निर्वाचन संबंधी नीति निर्माण करते समय सरकार ने निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए प्रस्ताव पर विचार कर जनहित के लिए जो नीति सही हो, उसका निर्धारण करना भी निर्वाचन की सफलता या असफलता का कारण बन सकती है । जैसे नेपाल आज के दिन में ‘मतपत्र बहिष्कार के अधिकार’ वाले देशों की सूची में पन्द्रहवें नम्बर पर है । आयोग द्वारा नेपाल सरकार को दिया गया निर्वाचन संबंधी विधेयक के दफा ३१ में मतदाता का समर्थन अगर निर्वाचन के प्रतिस्पर्धी किसी भी उम्मीदवार को नहीं है, तो अपना असमर्थन मतपत्र के माध्यम से दिखाने की व्यवस्था की गई थी । पिछले साल चैत में स्वीकृत की गई निर्देशिका के दफा ९६ में मतदान केन्द्र पर पहुंचकर सभी प्रक्रियाओं को पूरा कर मतपत्र में किसी को मत नहीं देकर खाली छोड़कर मतपेटी में अपना मतपत्र डालने की व्यवस्था की गई है । परन्तु निर्वाचन आयोग द्वारा परिचालित ‘निर्वाचन शिक्षक’ अर्थात् वह व्यक्ति जो निर्वाचन में मतदान कैसे करें यह आम नागरिक को सिखाते हैं, उनके द्वारा स्थानीय लोगों को इस बात की जानकारी नहीं दी जा सकी ।
सरकार एवं निर्वाचन आयोग ने एक नीति और लाई है । वह है– हर वार्ड में एक महिला दलित की अनिवार्य उम्मीदवारी । सरकार द्वारा लाई गई यह नीति भावनात्मक और सामाजिक रूप से भले ही अच्छा लगे परन्तु क्रियात्मक रूप से यह सफल प्रयोग नहीं है । इसका अर्थ यह भी नहीं कि इस तरह का तर्क देने वाला व्यक्ति दलित विरोधी हो । परन्तु कोई भी नीति प्रयोग में लाने से पहले उस पर गहन अध्ययन होने की आवश्यकता है और शायद निर्वाचन आयोग ने इसमें कमी की है । ऐसा कहने का आधार यह है कि क्या निर्वाचन आयोग के पास सम्पूर्ण देश की मतदाताओं की नामावली है ? क्या देश के हर गाँव में, हर वार्ड में दलित महिला है ? जैसे किसी वार्ड में अगर दलित महिला नहीं हो तो उस वार्ड से उम्मीदवारी ही नहीं होगी, तो फिर वार्ड सदस्य की संख्या घट जाएगी, जिससे देश और जनता दोनों को नुकसान है । देश को इसलिए नुकसान है कि वार्ड में जितनी सदस्य संख्या होनी चाहिए उतनी नहीं होगी तो कार्यप्रणाली में दिक्कतें आएँगी और जनता को इसलिए कि अगर यह बाध्यात्मक कानून को थोड़ा ठीक से प्रयोग किया जाता तो उस खाली जगह पर कोई दूसरा अपना योगदान दे सकता है ।
सरकार एवं निर्वाचन आयोग को निर्वाचन सम्बन्– में एक और नीति लाने के लिए प्रयास करनी चाहिए और उसके लिए सार्वजनिक बहस भी चलानी चाहिए वह है ‘वापस बुलाने का अधिकार ।’ जनता जब किसी भी उम्मीदवार को मतदान करती है तो उसके ऊपर उसे विश्वास रहता है कि यह अमुक व्यक्ति देश, समाज और जनता के लिए अच्छा काम करेगा । कर्ई बार ऐसा होता भी है कि जनता अच्छा व सफल नेता चुनती है । जो अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाते हैं । परन्तु कई बार ऐसा होता है, जब नेता जनमत को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझकर अपनी शक्ति समझ लेते हैं और जनता द्वारा दिए गए मत को जनहित के लिए नहीं लगा कर अपने व्यक्तिगत या पार्टीगत स्थार्थ में लग जाते है । जिससे एक तरफ जन भावनाओं को आघात पहुँचता है तो दूसरी तरफ देश में विकास की धारा अवरुद्ध होती है । इस बात को ध्यान में रखकर अगर सरकार एवं निर्वाचन आयोग ऐसी कोई नीति बनाए जिसमें जनता अपने चुने हुए नेता जो कि निकम्मा हो, उसे वापस बुला सके । अगर ऐसा कोई कदम सकार उठाए तो वह प्रशंसनीय कार्य होता । इस नीति को लागू करने में कुछ प्राविधिक और प्रयोगात्मक कठिनाईयाँ आएँगी । जैसे वापस बुलाने का अधिकार जनता को किस प्रक्रिया के अन्तर्गत दिया जाए, अगर निर्वाचित प्रतिनि–ि वापस बुला लिए जाते हैं तो उस रिक्त स्थान को कैसे पूर्ति किया जाए इत्यादि । इन सब विषयों पर जनाधार एवं विशेषज्ञों की राय लेकर इसको कार्यान्वयन किया जाए तो देश और जनता की हित में बात जाएगी ।
नेपाल की राजनीति में एक सबसे बड़ी समस्या है पार्टी फोड़ना । हमने देखा है कि सत्ता के लोभ में कई बार पार्टी फूटी है, सरकार गिरी है । एक सरकार को हटाकर दूसरी सरकार बनी है । यह प्रक्रिया करीब ३ दशक से चल रही है । इस तरह के क्रियाकलाप से देश में स्थायी सरकार बनने की सम्भावना न्यून हो जाती है । इस बात के लिए भी सरकार एवं निर्वाचन आयोग को कोई ऐसी नीति लानी चाहिए, जिससे पार्टी फूटकर सरकार और देश को अस्तव्यस्त करने का कार्य बन्द हो सके । इसके लिए अगर तर्कपूर्ण बात करे तो जो भी उम्मीदवार किसी पार्टी से चुनाव लड़ता है , जनता उस पार्टी के चुनाव चिन्ह में मतदान करती है । जब चुनाव चिन्ह पार्टी को होना है तो मतदान व्यक्ति का या पार्टी का निश्चित रूप से पार्टी का । जैसे ही कोई नेता पार्टी छोड़ता है तो वह चुनाव चिन्ह भी छोड़ता है । तो चुनाव चिन्ह छोड़ने के बाद, उस चिन्ह पर हुए मतदान भी स्वतः खारिज हो जाना चाहिए । इस तरह से देखे तो जिसके पास कोई मत ही नहीं है, वह सत्ता साझेदार कैसे ? इस तरह से अगर कोई बाध्यात्मक कानून बने, जिससे पार्टियों का टूटना बन्द हो तो देश में स्थायी सरकार की संभावना बढ़ सकती है । परन्तु सरकार एवं निर्वाचन आयोग द्वारा इस तरह की कोई प्रावधान आने की संभावना न्यून है, क्योंकि अपने पैर में कुल्हाडी क्यों मारे ?
इस तरह से सरकार एवं निर्वाचन अयोग ने कुछ नीतियां लाई जो जनता को पता ही नहीं और कुछ नीतियां जो होनी चाहिए, वह नहीं आयी । जब तक नीति सही तरह कार्यान्वयन नहीं होगी, उसके प्रति जनता सजग नहीं होगी । निर्वाचन का प्रयास सफल नहीं हो सकता । सफल निर्वाचन के तीन आधार में दूसरा है, तिथि । वर्तमान समय में निर्वाचन आयोग भले ही दावा कर रहा हो और सरकार निर्वाचन कराने के लिए प्रतिबद्ध हो परन्तु सरकार ने निर्वाचन की तैयारी के लिए जितना समय देना चाहिए, उतना नहीं दिया । जिससे खाना पूर्ति वाला निर्वाचन तो हो जाएगा, परन्तु दो दशक के बाद होने वाला चुनाव और लोकतन्त्र के बाद पहला चुनाव में जो उत्साह होना चाहिए, वह नहीं होगी । इससे अलग सरकार ने स्थानीय निर्वाचन को दो चरणों में करने की घोषणा की । वैशाख ३१ और दूसरा जेष्ठ ३१ । अब यहाँ यह सवाल खड़ा हो सकता है कि क्या निर्वाचन में भाग लेने वाली सभी पार्टियोँ खासकर एमाले एवं संघीय समाजवादी फोरम नेपाल इतना विश्वस्त हो सकती हैं कि जनता की मतपेटिका के साथ कोई छेड़खानी नहीं की जाएगी ? दूसरी बात संविधान अनुसार नेपाल सरकार को जेठ १५ में बजट निकालना है, इन दो निर्वाचनों के बीच बजट परिात होने से निर्वाचन और बजट दोनों प्रभावित नहीं होगा ? इस तरह से देखे तो सरकार ने तिथि वाला कार्य भी ठीक ढंग से नहीं किया है, जिसके कारण घोषित निर्वाचन को सफल करने में आशंका हैं ।
सफल निर्वाचन का तीसरा महत्वपूर्ण आधार सहमति है । देश में जो भी दल और शक्तियाँ है, उनको सहमति में लाए बिना निर्वाचन की सफलता पर विश्वास नहीं किया जा सकता है । सरकार यहाँ भी चुक गई है । मधेश में चल रहे आन्दोलन के कारण मधेशवादी दलों ने चुनाव में जाने से इन्कार किया । हाल ही में एकीकरण हुए राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल ने स्पष्ट कहा है कि जब तक संशोधन नहीं, तब तक चुनाव नहीं । मधेश आन्दोलन की वजह से मधेश का आक्रोश अभी भी शान्त नहीं हुआ । जिस क्रुरता से नेपाली सत्ता ने मधेशियों को गोली ठोका है, उसको मधेशी जनता जल्दी नहीं भूल सकती । मधेश के गांव–गांव में मधेश विरोधी गतिवि–ि करने वाली पार्टियाँ स्थानीय जनता ने एक तरह से निषे– ही कर दिया । गांव का वातावरण ऐसा है, जहाँ निर्वाचन सम्बन्धस् शिक्षा देने वाले को भी जाने में कई बार सोचना पड़ता है । मधेश में पुनर्संरचना के नाम पर जो गांव को नगरपालिका बनाया गया है, उससे भी कई गाँव में असन्तोष है और आन्दोलन चल रहा है । मधेश ने संविधान को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया, उसमें कई धाराएँ, जो संशोधन किए बिना चुनाव में नहीं जाया जा सकता, सरकार उसको भी अनदेखी कर रही है ।
भले ही सरकार और निर्वाचन आयोग कितनी भी बड़ी–बड़ी बातें कर ले, प्रशासन के बल पर सेना लगाकर निर्वाचन संपन्न करा ले, लेकिन इस निर्वाचन को सफल निर्वाचन नहीं कहा जा सकता । सफल निर्वाचन वह है, जिसमें जनता स्वतःस्फूर्त रूप से बड़ी तादाद में भाग लेकर अपना मनपसन्द प्रतिनि–ि चुने । व्

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz