मौलाना नदवी को नेपाल सरकार द्वारा शैक्षिक सम्मान, मुस्लिम समुदाय हर्षित

 
अंकुश श्रीवास्तव,कपिलवस्तु । विश्व शिक्षा दिवस ८ सितंबर नेपाल के इतिहास में पहली बार किसी इस्लामी मदरसे से जुड़े व्यक्तिको केंद्र सरकार द्वारा एक भव्य समारोह में शैक्षिक सम्मान से सम्मानित किया गया ।
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राष्ट्रीय मदरसा एसोसिएशन ऑफ नेपाल के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना मशहूद खान नेपाली ने इस सुनहरे अवसर पर राष्ट्रीय मदरसा एसोसिएशन ऑफ नेपाल और उसके कार्यकर्ता अपने संगठन के संरक्षक और जामिया सिराजुल उलूम झंडानगर नेपाल के नाज़िमआला मौलाना शमीम अहमद नदवी की सेवा में दिल की अथाह गहराईयों से मुबारकबाद पेश किया । जिन्हें नेपाल सरकार ने पिछले साल इस सम्मान के लिए चुना था और इस साल ८ सितंबर शिक्षा दिवस के अवसर पर एक प्रतिष्ठित समारोह में एक बड़ी सभा में उन्हें इस सम्मान से सम्मानित किया गया । उनहोंने कहा बेशक यह सम्मान संगठन के लिए जामिया सिराजउलूम और इस से जुड़े लोगों , सारे मदरसों एवं पूरे मुस्लिम वर्ग के लिए स्वागत योग्य है । हम इस अवसर पर नेपाल सरकार को तहे दिल से आभारी हैं और उसे धन्यवाद करते हैं । उनहोंने यह भी कहा कि संगठन के लगातार प्रयासों से शिक्षा के क्षेत्र में एक महान व्यवस्थापक की स्थिति से एक व्यक्ति की सेवाओं को स्वीकार करते हुए उन्हें सम्मान दिया जाना मुमकिन हो सका । ये ख़ुशी की बात है पर यह हमारी समस्याओं का समाधान नहीं है ।संगठन इस समस्या का समाधान इस नए संविधान के अनुसार चाहती है जिसका संविधान दिवस नेपाल सरकार १९ सितंबर को मनाने जा रही है । जिसमें समावेश के आधार पर हर वर्गको बराबर के अधिकार देने की बात कही गई है ।

इस अवसर परराष्ट्रीय मदरसा एसोसिएशन ऑफ नेपाल के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अब्दुल ग़नीअलकूफ़ी ने कहा कि जो हुआ अच्छा हुआ लेकिन यह मौका पूरे तौर पर खुश होनेका नहीं क्योंकि इस अवसर पर दिया जाने वाला पुरस्कार जो अलग अलग सर्व श्रेष्ठ शिक्षक, छात्र ,स्कूल और प्रशासन आदि के लिए दिया जाता है उन में से किसी में भी किसी मुस्लिम अल्पसंख्यक को नामित नहीं किया और उन्हें पूर्ण रूपसे उनके सम्मान से वंचित कर दिया गया । जो अपने आप में चिंताजनक बात है ।
संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अलकूफ़ी ने कहा कि होना तो यह चाहिए था कि नेपाल में जिस तरह हम पिछड़े हैं और सरकार भी जिसे स्वीकारते हुए हमें पिछाड़ीये का वर्ग कहती है । होना यह चाहिए था कि सरकार हमारे पिछड़ेपनको दूर करने के लिए अधिक से अधिक शैक्षिक अवसर लाती, अनुदान देती । उनके निर्माण के लिए दूसरों की तुलना में उन्हें प्राथमिकता देती ताकि देशकी ये महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक देशके मुख्य धारा में शामिल होकर देश और राष्ट्रीय विकास में नेतृत्व की भूमिका अदा करे । लेकिन हमारे लिए और हमारे पिछड़ेपन को दूर करने के लिए सरकार न तो समय पर कोई आरक्षण का मामला सामने ला रही है और नही इसमें गंभीर दिख रही है ।
राष्ट्रीय मदरसा एसोसिएशन ऑफ नेपाल ने  इस रवैये पर सख्त नोटिस लिया और इस का इज़हार कार्यक्रम के दौरान ही कर दिया जब राष्ट्रीय मदरसा एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अब्दुल गनी  अलकूफ़ी और राष्ट्रीय महासचिव मौलाना मशहूद खान नेपाली जो मदरसा बोर्ड के सदस्य भी हैं जब उन्हें मंच पर आमंत्रित किया गया तो उन्होंने यह कहते हुए मंच पर जाने से इनकार कर दिया कि जिसमंच पर मदरसों का प्रतिनिधित्व शून्य हो इस मंच पर शिरकत हमारे लिए अपमान जनक है । और इसके तुरंतबाद उन्होंने मौके पर ही एक प्रेस कांफ्रेंस करके सरकार की कलई खोली और स्पष्ट किया कि इस तरह की स्थिति 
हमें अधिक साहस और उत्साह के साथ काम करने के लिए मजबूर करती हैं । उनके व्यवहार से एक नई प्रेरणा मिलती है ।

होना तो यह चाहिए था कि इस अध्याय में नेपाल सरकार पड़ोसी देश भारत से सबक लेती जहां सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में भी अन्य क्षेत्रों की तरह अल्पसंख्यकों के अधिकारों का ध्यान रखा है । हम वैसी ही उम्मीद नेपाल में भी रखते हैं क्योंकि भारत हमारा बड़ा भाई है । लोकतंत्र के क्षेत्र में उसका एक व्यापक अनुभव है । हमें भी लोकतंत्र के तौर तरीके उनसे सीखना चाहिए ।
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