यदि रामचन्द्र जनकपुर नहीं आते

यदि रामचन्द्र जनकपुर नहीं आते
यदि रामचन्द्र जनकपुर नहीं आते
तो क्या भगवान राम बन पाते –
बनकर कौशल्या-दशरथ नन्दन
भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के
रहजाते बनकर रामचन्द्र अवधपति
तो क्या जगतपति बन पाते –
यदि रामचन्द्र जनकपुर नहीं आते !
गुरु वशिष्ठ से पायी शिक्षा
मुनि विश्वामित्र का यज्ञ बचाया
यदि धनुषभंग के लिए नहीं चल पडÞते
क्या शिला अहिल्या को
पुनः नारी बना पाते –
यदि रामचन्द्र जनकपुर नहीं आते।
क्या शिवका धनुष भंग हो पाता –
क्या जनकसुता कुँवारी रह जाती –
क्या परशुराम राममय हो पाते !
रावण सहित नृपगण खाली हाथ लौट जाते
यदि रामचन्द्र जनकपुर नहीं आते।
क्या धनुष-यज्ञ नहीं था
मिलन का बहाना –
क्या संभव था पुरुष का
प्रकृति से मिलन –
क्या श्रद्धा और सत्य एक हो पाते –
यदि रामचन्द्र जनकपुर नहीं आते
जनकसुता बनी वधू, पहुँची साकेतपुरी
कैकर्ेइ के हठ से बने सीता सहित वनवासी
वन में सीता का रावण ने किया हरण
कर मृत्युवरण राम से कैसे मुक्ति पाते –
यदि रामचन्द्र जनकपुर नहीं आते
सीता सहित रामचन्द्र पहुँचे अयोध्या पुरी
धोवी की बात पर सीता को जंगल छोडÞा
लव-कुश की माँ बन
वह नहीं लौटी अवधपुरी
क्या वह पुनः लौट सकती थी
स्वधर्म दायित्व निभाकर –
यदि रामचन्द्र जनकपुर नहीं आते
तो क्या भगवान राम बन पाते –
अन्धकार वरदान है:-लक्ष्मी रूपल
अन्धकार वरदान है
धुनिया, मुनिया के लिए
सैकड, हजारों मासूमों के लिए
जो अन्धकार ओढÞते हैं
बिछाते हैं, ढोते हैं
साँसो में लिए फिरते हैं
डरते हैं, सहम जाते हैं
रोशनी की जगमगाहट से
क्योंकि ….
उनके तन पर, मन पर
शोषण, अत्याचार
और मनमानी कडÞवाहट के
ताजे घाव हैं, गहरे दाग हैं
बहुत घिनौने लगते हैं
ये दाग
गूँगी, बहरी समाज व्यवस्था
के उजाले में !
हाशिए पर खडÞे हैं
या हाशिए बन गये हैं
भला लगता हैं अंधेरा
कम से कम
अन्धकार की घनी चादर
ढके तो रखती है
उन के दुखते घावों को
जीवन के अभावों को
पर…. कब तक
क्या दीपक का
छोटा सा प्रकाश
कभी उन्हें सिखा पायेगा
जीना रोशनी में –
न जाना ही बेहतर !
वहाँ न जाना ही बेहतर !
जहाँ का खेल वीभत्स हो
जहाँ भष्मासुर का आतंक हो
जहाँ अणुबम का खेलवाडÞ होता हो !
वैसी जगह में
न जाना ही बेहतर !
जहाँ जीवन के लाले पडÞते हों !
जहाँ स्वतंत्रता भूखों मरती हो !
सोमालिया से भी बदतर !
सुनकर हीं शायद !
तुम खौफ खा जाओगे !
वहाँ न जाना ही बेहतर !
चेतना विकलाङ्ग हो जाय तो अच्छा !
उधर का समाचार सुनना न पडेÞ !
जहाँ व्यभिचार हीं धर्म हो !
सती नारी के शाप की कालिमा हो !
निराशाजन्य उपलब्धि !
मृत्युमय संस्कार !
ना….. ! न सुनना पडेÞ ऐसा समाचार !
मिथ्या अहंकार प्रजातन्त्र नहीं होता !
जान लेकर किसी की
कोई विजयी नहीं होता !
इसीलिए वैसी जगह में !
न मेरी, न तेरी, न उसकी !
किसी की भी उपस्थिति जरुरी नहीं !
वहाँ न जाना हीं बेहतर !
-बाँडभञ्ज्याङ-७, काठमांडू
नेपाली से हिन्दी रुपान्तरण मुकुन्द आचार्य)
loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz