क्या नेपाल सुप्नेखा अवस्था से गुजर रहाहै यदि हो तो जिम्मेवार कौन

रामाशीष

hindi magazineमाओत्से तुंग से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री वेन जिआ वाओ तक के सभी चीनी नेता नेपाल को यही पाठ पढ़ाते आ रहे हैं कि ‘नेपाल का भला इसी में है कि वह भारत के साथ दोस्ताना संबंध बनाए रखे। शायद यही सुझाव भारत के किसी नेता ने दिया होता तो नेपाल के तथाकथित ‘राष्ट्रवादी तथा स्वाभिमानी नेताओं को रास नहीं आता और वह बयान जारी कर इसे नेपाल के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप की संज्ञा देते हुए यही धौंस जमाते कि भारत को नेपाल के मामले में बोलने या सलाह देने का कोर्इ हक नहीं क्योंकि नेपाल खुद एक सार्वभौम सत्ता सम्पन्न देश है।

राजा महेन्द्र ने नेपाल में पहली बार निर्वाचित संसद को सन 1959 में भंग कर दिया था, नेपाली कांग्रेस की दो-तिहार्इ बहुमत से गठित सरकार को बेदखल कर दिया था, प्रथम निर्वाचित प्रधानमंत्री विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला सहित दर्जनों मंत्रियों एवं नेताओं को सेना की सहायता से जेल में ठेल दिया था और राजनीतिक दलों पर सदा-सदा के लिए पाबंदी लगा दी थी। इसके साथ ही राजा ने निर्दलीय शासन व्यवस्था के नाम पर तानाशाही शासन जनता पर थोप दिया था।
राजा के इस कदम को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत के संसद में स्पष्ट विरोध करते हुए कहा था ‘आज एक अत्यन्त दु:खद घटना घटी है, आज पड़ोस में स्थापित केवल 19 महीने के शिशु-प्रजातंत्र की हत्या कर दी गर्इ है। इस पर राजा महेन्द्र बौखला उठे थे और देश भर में बहुत बड़े पैमाने पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
दूसरी ओर नेपाली कांग्रेस ने भी गिरफ्तारी से बच निकले और सीमापार भारतीय सीमा में पहुंचने में सफल हो चुके नेपाली कांग्रेस नेता सुवर्ण शमशेर के नेतृत्व में राजा के कदम के विरोध में सशस्त्र क्रानित की घोषणा कर दी थी। इस विद्रोह को रोकने के लिए राजा महेन्द्र ने सेना-पुलिस की पूरी ताकत लगा दी थी। फिर भी हर जगह उसे हार ही मिलती जा रही थी। राजा परेशान थे और वह खुलकर यह आरोप लगा रहे थे कि भारत नेपाली कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को अपने देश में शरण दिए हुए है और वहीं से नेपाली सीमा में सशस्त्र कार्रवार्इ की अनुमति दे रहा है। राजा को इस सिथति से निकल पाने का कोर्इ रास्ता सूझ नहीं रहा था।
इसी बीच चीन ने 1962 में अपनी विशाल सेना से भारत पर हमला कर दिया था और अंग्रेजों से 1947 में स्वतंत्र हुए अहिंसावादी महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के भारत को भारी हार का मुंह देखना पड़ा था। विश्व के प्रजातंत्रवादी देश और उसके दिग्गज नेता चीन की इस कार्रवार्इ से सन्न थे क्योंकि उस समय ”चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाइ और भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की मैत्री की गूंज विश्व भर में फैली हुर्इ थी और भारत में हिन्दी-चीन भार्इ-भार्इ के नारे लग रहे थे। उस समय कहा गया कि चीन ने मित्र भारत की पीठ में छुरा घोंप दिया। भारतीय नेता चीन के इस हमले का जबाब दे पाने में असमर्थ साबित हो रहे थे क्योंकि लगभग 20 हजार भारतीय सैनिकों को तिब्बत से लगे भारतीय सीमा की रक्षा करते-करते जान गुमानी पड़ी थी। चीन ने ‘मैकमेहन रेखा को पारकर भारत के हजारो वर्गमील भूभाग पर कब्जा कर लिया था और भारत के उत्तर पूर्वी सीमा से लगे अरुणाचल प्रदेश सहित अन्य अनेक भारतीय भू-भागों पर अपना दाबा ठोक दिया था, जिस पर चीन आज भी कायम है।
चीन के इस विश्वासघाती-भीतरघाती कार्रवार्इ का कारण था कि लाखों निर्दोष चीनी जनता की हत्याकर शासन पर कब्जा जमाए चीन के कम्युनिस्ट आतंकवादी माओत्से तुंग की विशाल लाल सेना ने विश्व प्रसिद्ध शानितप्रिय बौद्ध देश तिब्बत पर कब्जा कर लिया था, हजारो तिब्बतियों की हत्या करा दी थी जिससे आतंकित हजारो तिब्बती शरणार्थियों ने भारत और नेपाल में शरण ले लिया था। तिब्बत के धार्मिक गुरू दलार्इ लामा जान बचाते हुए अपने हजारो अनुयायियों के साथ भारत के हिमाचल प्रदेश सिथत धर्मशाला नामक स्थान पर पहुंचने में सफल हो चुके थे। विश्व भर में माओत्से तुंग के इस शर्मनाक हमले की निंदा की जा रही थी। तिब्बतियों के लिए जान बचाकर भागने का दूसरा सुरक्षित स्थान नेपाल भी बन गया था जहां प्रजातंत्र की पुनर-स्थापना के लिए जारी सशस्त्र क्रानित सफलता के निकट आ गर्इ थी। बताते हैं यदि चीन ने भारत पर हमला करने में एक सप्ताह की और देर कर दी होती तो नेपाल उसी वक्त राजा और राजतंत्र से मुक्त हो गया होता।
नेपाल में राजा महेन्द्र के चहेते और नेपाली कांग्रेस के गद्दार नेता डा. तुलसी गिरि ने 19071 में काठमांडू से प्रकाशित एक पत्रिका को इन्टरव्यू में कहा था कि ‘उन्हें और राजा महेन्द्र को इस बात की जानकारी मिल गर्इ थी कि चीन, अगले सप्ताह भारत पर हमला कर देगा।
वैसे भी तत्कालीन नेपाल-भारत-चीन की राजनीतिक अवस्था पर ध्यान दें तो चीन को मित्र देश भारत पर हमला करने की यह बाध्यता थी कि उसे ‘निगले हुए तिब्बत को पचाने के लिए समय की जरूरत थी। चीन को शंका थी कि यदि नेपाल ही तिब्बत के विद्रोहियों का अडडा बन गया तो उसे उस सिथति को संभालना कठिन हो जाएगा। इस क्षेत्र की राजनीति और कूटनीति के जानकारों का यही मानना है कि चीन ने नेपाल के राजा और राजतंत्र को बचाने तथा नेपाल में स्थापित प्रथम प्रजातंत्र को तहस-नहस करने के लिए ही भारत पर हमला किया था ताकि वह ‘निगल चुके तिब्बत को आसानी से पचा सके।
चीन तब से लेकर आज तक ‘तिब्बत को पूरी तरह पचा नहीं सका है, तिब्बत उसके गले की हडडी बना अटका हुआ है और कम्युनिस्ट चीन का अजगर उसे पचाने की कोशिश कर रहा है। यही कारण है कि वह अपनी ‘कम्युनिस्ट-ब्रदरहुड के नाते समय-समय पर, नेपाल में अपने राजनीतिक दलालों के मार्फत उथल-पुथल मचवाता रहता है तथा इसके साथ ही वह भारत के भी कर्इ प्रदेशों पर दाबा ठोकता रहता है। क्योंकि, उसे इस बात का डर है कि यदि उसकी तिब्बत पर पकड़ कमजोर हुर्इ और भारत तथा नेपाल में शरण लिए हुए लाखों तिब्बतियों के नेता दलार्इ लामा को शासन सत्ता की बागडोर सौंपनी पड़ी तो उसकी हालत भी कम्युनिज्म को सर्वप्रथम कार्यानिवत करनेवाला देश ‘सोवियत संघ(रुस) की तरह न हो जाए और उसे भी दर्जनों देशों में टुकड़ा हुए चीन को न देखना पड़ जाए। वास्तव में तिब्बत में परिवर्तन से चीन को बिखरने का डर है क्योंकि यह तथ्य अब प्रकाश में आ चुका है कि चीन के कर्इ प्रान्त ऐसे हैं जहां स्वतंत्रता, स्वाधीनता और स्वायत्तता की मांग की जा रही है और दिन-दहाड़े फांसी की सजा से बचते हुए उन प्रान्तों के नेता चीन से मुक्त होने का आन्दोलन चला रहे हैं।
इसी प्रकाश में माओत्से तुंग से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री वेन जिआ वाओ तक के सभी चीनी नेता नेपाल को यही पाठ पढ़ाते आ रहे हैं कि ‘नेपाल का भला इसी में है कि वह भारत के साथ दोस्ताना संबंध बनाए रखे। शायद यही सुझाव भारत के किसी नेता ने दिया होता तो नेपाल के तथाकथित ‘राष्ट्रवादी तथा स्वाभिमानी नेताओं को रास नहीं आता और वह बयान जारी कर इसे नेपाल के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप की संज्ञा देते हुए यही धौंस जमाते कि भारत को नेपाल के मामले में बोलने या सलाह देने का कोर्इ हक नहीं क्योंकि नेपाल खुद एक सार्वभौम सत्ता सम्पन्न देश है।
मजे की बात यह है कि ‘भारत से दोस्ती बनाए रखो के ”माओ-सलाह के लगभग पांच दशक के बाद इस बार भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी उसी पाठ को दोहरा दिया है। भारत भ्रमण पर अपने दलबल के साथ नर्इ दिल्ली पहुंचे नेपाल के गृह तथा प्रतिरक्षा मंत्री विजय कुमार गच्छदार से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा ‘नेपाल को चीन से दोस्ती का संबंध बनाए रखना चाहिए, इसमें भारत को कोर्इ एतराज नहीं होगा। जबकि इससे कुछ ही दिन पहले अर्थात 15 जनवरी को चीनी प्रधानमंत्री वेन जिआ वाओ ने भी अपने देश के इस पुराने ‘तकिया-कलाम को नेपाल की धरती पर ही दोहराया था और कहा था कि नेपाल का हित इसी में है कि वह भारत के साथ अपने संबंधों को बनाए रखे।
दरअसल में बात यह है कि अब भारत, 1962 का चीन-पीडि़त डरा-सहमा भारत नहीं रहा। बलिक, तेज विकास गति से महाशकित राष्ट्र बनने के रास्ते पर चल चुका परमाणु शकित सम्पन्न भारत, अब नेपाल के बाहुन-बहुल माओ-कम्युनिस्ट-कांग्रेसी शासकों और चीन की मिलीभगत से संभावित षडयंत्रों, पैंतरेबाजियों और बन्दरघु़कियों का जबाब बखूबी दे सकता है, वह इसकी पूरी तैयारी भी कर चुका है। इसे भांपते हुए ही पिछले 15 जनवरी को भारत-चीन सीमा वार्ता में भाग लेने के लिए नर्इ दिल्ली पहुुचे चीन के उच्चस्तरीय सीमा-वार्ता टोली के नेता तथा चीन का स्टेट काउंसिलर दाइ-वेंग-गोउ ने भारतीय अंग्रेजी दैनिक ‘द हिन्दू में एक लेख लिखकर कहा है कि ”अब यदि चीन ने भारत पर आक्रमण करने का प्रयास किया या भारत के विकास को रोकने की कोशिश की तो वह(चीन) भारत के समक्ष टिक नहीं पाएगा।
यदि आप राम वनवास को याद करें तो उसमें रावण की बहन ‘शूर्पनखा-राम संवाद तथा ‘शूर्पनखा-लक्ष्मण कार्रवार्इ की याद जरूर आएगी। अपनी पतिव्रता पत्नी सीता और भार्इ लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष का वनवास जीवन बीता रहे राम के पास लंका के राजा रावण की बहन शूर्पनखा रूप बदल कर पहुंच गर्इ और राम के सुन्दर स्वरूप का वर्णन करते हुए उनसे विवाह का प्रस्ताव कर डाला। राम उसे बार-बार समझाते रहे कि वह शादी-शुदा हैं इसलिए यह संभव नहीं। शूर्पनखा के नहीं मानने पर राम ने अपने छोटे भार्इ लक्ष्मण की ओर इशारा करते हुए कहा अच्छा हो कि यह प्रस्ताव आप उनसे करें। कुछ समय तक राम और लक्ष्मण दोनों ही एक दूसरे के पास शूर्पनखा को भेजते रहे और जब शूर्पनखा से पीछा छुड़ाने में असफल रहे, उसके बाद लक्ष्मण ने शूर्पनखा के साथ क्या वर्ताव किया, ‘यह नेपाल-भारत के लगभग सभी पढ़े-लिखों को मालूम है।
यहीं सवाल उठता है, क्या ‘नेपाल शूर्पनखा बन चुका है कि उसे कभी चीन सुझाव देता है तो कभी भारत ? यदि हां, तो इस देवभूमि नेपाल और इसकी धर्मप्राण जनता को इस सिथति में पहुंचाने का जिम्मेदार आखिर कौन है ? क्या, अपनी तलवार और तिकड़मों के बल-बूते लगभग ढार्इ सौ वर्षों तक नेपाल पर राज्य करनेवाले राजा-राजवाडे़ इसके लिए जिम्मेबार हैं या 1990 से आज तक ‘नेपाल में भारत विरोधी राष्ट्रवाद की रोटियां सेकती आ रही नेपाल की बाहुन-बहुल (पहाड़ी ब्राम्हण) पार्टियां, उसके कांग्रेस, कम्युनिस्ट, माओवादी, राजावादी नेता, उनकी समय-समय पर गठित होनेवाली अल्पकालीन सरकारें या बाहुन-बहुल अधिकारियों, कर्मचारियों और सेना-पुलिस-बुद्धिजीवियों की जाल ?
शाहवंशी राजाओं की अनितम कड़ी राजा ज्ञानेन्द्र शासन के अनितम समय में एक नारा नेपाल में गूंजना शुरू हुआ, वह यह कि नेपाल का चीन और भारत के बीच एक मजबूत ट्रानिजट पोआइन्ट (पार गमन केन्द्र) के रूप में क्यों न विकास किया जाए ? ताकि, विश्व के उभरते अर्थतंत्र चीन और भारत के बीच व्यापार के लिए नेपाल का रास्ता सहज बन जाए। इसके लिए चीन और भारत के बीच सदभाव कायम हो और नेपाल को दोनों ही देशों को वाणिज्य-व्यापार का रास्ता देने का लाभ मिले तथा इसके लिए चीन अधिकृत तिब्बत और भारत के बीच नेपाल से होते हुए रेल तथा सड़क मागोर्ं का विस्तार किया जाए। लेकिन, राजा ज्ञानेन्द्र की चीन और भारत को एक साथ झांसा देने की नीति और नेपाल की जननिर्वाचित सरकार को अपने पिता महेन्द्र की तरह भंगकर, शासन सत्ता अपने हाथ में लेने की कार्रवार्इ ने सब गुड़ गोबर कर दिया। नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट और भूमिगत माओवादियों के मात्र 21 दिन के शानितपूर्ण आन्दोलन ने न केवल ज्ञानेन्द्र की गद्दी छीन ली बलिक शाहवंश के शासन का ही अन्त कर दिया और इसके साथ ही नेपाल का शकित केन्द्र ‘नारायणहिटी राजदरबार मात्र एक संग्रहालय बन कर रह गया।
इसी तर्ज पर नेपाल के वर्तमान माओवादी प्रधानमंत्री डा. बाबूराम भÍरार्इ ने ‘नेपाल को चीन और भारत के बीच एक पुल बनाने का संकल्प किया है और इसके साथ ही यह भी कह दिया है कि यदि नेपाल ‘चीन और भारत के बीच एक पुल नहीं बन सका तो उसे चीन या भारत में विलय होना पड़ सकता है। मजे की बात यह है कि नेपाल को प्रधानमंत्री भÍरार्इ की इस ‘नेपाली राष्ट्रवाद विरोधी अभिव्यकित का कहीं किसी कोने से सशक्त विरोध नहीं हो रहा है। हां, कुछ पत्रकारों ने इसके विरोध में कलम जरूर चलाया है लेकिन इस पर कोर्इ उग्र प्रतिकि्रया बाहर नहीं आयी है। यदि यही अभिव्यकित प्रजातंत्रवादी नेपाली कांग्रेस के किसी नेता की बाहर आयी होती तो नेपाल के कम्युनिस्ट एवं माओवादी दोनों ही, आसमान को सिर पर उठा लेते और नेपाली कांग्रेस पर राष्ट्रद्रोह के आरोपों की झरी लगा देते।
स्मरणीय है कि एक भारतीय नेता के. आर. मल्कानी ने एक बार जाने-अनजाने, सुनी-सुनायी राजा त्रिभुवन की उस अभिव्यकित की चर्चा कर दी कि ”राजा त्रिभुवन तो भारत के साथ मिल जाना चाहते थे – तो नेपाल में भारी हाय तौबा मची थी और अन्त में भारतीय जनता पार्टी के नेता मल्कानी को सार्वजनिक तौर पर क्षमा याचना करनी पड़ी थी।
जबकि, आज माओवादी प्रधानमंत्री डा. भÍरार्इ की इस भविष्यवाणी पर कोर्इ खास प्रतिकि्रया नहीं। इसका अर्थ क्या यह लगाया जाए कि नेपाल के सभी बाहुन-बहुल पार्टियों के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को डा. भÍरार्इ के तर्क में कोर्इ दम महसूस होने लगा है ? यदि हां, तो यहां प्रधानमंत्री को यह भी सोचना होगा कि किसी भी भारी वजन की गाड़ी, रेलगाड़ी या प्रतिरक्षा टैंक के आवागमन के लिए भरोसेमन्द, विश्वसनीय और काफी मजबूत पुल की जरूरत होती है क्योंकि कमजोर पुल के ढह जाने या बैठ जाने का खतरा बना रहता है। इसलिए नेपाल को भारत और चीन के बीच आर्थिक पुल बनने के लिए जहां एक ओर चीन और नेपाल तथा नेपाल तथा भारत के बीच मजबूत रेलमार्ग की जरूरत होगी वहीं पहाड़-पर्वतों के रास्ते आवागमन के लिए नेपाल के आन्तरिक रेलमार्ग और सड़क मार्ग की भी आवश्यकता होगी। और, इन सबसे भी बड़ी आवश्यकता होगी, चीन और भारत का विश्वास जीतने की। नेपाल को चीन और भारत दोनों ही देशों को विश्वासघात नहीं करने की गारन्टी देनी होगी, इसके बिना तो चीन और भारत, दोनों देशों के लिए नेपाल को ट्रानिजट पोआइन्ट के रूप में विकास करने में रुचि कदापि नहीं होगी।
क्योंकि, अब वह युग रहा नहीं कि नेपाल कभी चीन कार्ड भारत के साथ खेले और कभी भारत कार्ड चीन के साथ। हाल ही के चाइनीज प्रधानमंत्री की केवल साढ़े चार घंटे की नेपाल यात्रा ने यह साबित कर दिया है कि चीन का नेपाल पर कतर्इ विश्वास नहीं है क्योंकि चीनी प्रधानमंत्री की इस बार की नेपाल यात्रा एक अत्यन्त गोपनीय यात्रा हुर्इ है। चीन के प्रधानमंत्री नेपाल आ रहे हैं, इसकी जानकारी चीन की राजधानी बीजिंग सिथत नेपाली राजदूतावास तक को भी नहीं थी तथा चीन के विदेश मंत्रालय ने भी इस भ्रमण की औपचारिक घोषणा चीनी प्रधानमंत्री के काठमांडू पहुंच जाने के बाद की थी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि नेपाल के लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं तथा टी,वी, चैनलों तथा एफ एम रेडियो स्टेशनों ने एक ही अभिव्यकित दी है कि चीन का नेपाल पर विश्वास नहीं है।
और, भारत का तो नेपाल पर उस समय तक स्थायी विश्वास करने का कोर्इ कारण ही नहीं हो सकता जबतक नेपाल के तथाकथित चीनभक्त माओवादी पार्टी तथा उसके बाहुन-बहुल नेता समूह, बाहुन-बहुल कम्युनिस्ट तथा बाहुन-बहुल कांग्रेसी नेता समूह, भारत को ‘वंचिका देने से बाज नहीं आते।
इसी क्रम में माओवादी नेता पुष्पकमल दहाल की बात करें। वह आजकल चीन के अरबो-खरब डालर के बूते पर राजा शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ के जन्मस्थल लुमिबनी का विकास कर, विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध-केन्द्र निर्माण करने में लगे हुए हैं। आश्चर्य है कि जिस पुष्पकमल दहाल को अपने धर्मप्राण ब्राम्हण पिता का दिया हुआ नाम भी रास नहीं और अपना नाम ‘प्रचण्ड रख लिया, जिस पुष्पकमल दहाल ने पंडित पिता के निधन पर अनितम संस्कार के रूप में कि्रया-कर्म तक नहीं किया, उस पुष्पकमल दहाल को ‘बौद्ध दर्शन में यह अचानक विश्वास कहां से और कैसे पैदा हो गया ? कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ को तो भारत के बिहार प्रान्त के बोधगया में भारी तपस्या के बाद बुद्धत्व प्राप्त हुआ था और और उसके बाद ही वह गौतम बुद्ध बने थे । उसके बाद ही उन्होंने विश्वभर में शानित का सन्देश दिया था और लाखों लोगों को मुकित का मार्ग बताया था।
जबकि, नेपाल के माओवादी बाहुन-नेता पुष्पकमल दहाल ने तो कहीं कोर्इ तपस्या नहीं की। क्या, उन्हें चीन के भारी डालर भंडार में बुद्धत्व प्राप्त हुआ है जिसके अरबो डालर के सहारे वह भारतीय सीमा से लगे नेपाल और भारत दोनों ही के लिए समान रूप से सम-पूजित परम पवित्र धाम लुमिबनी को ‘बौद्ध-विरोधी, धर्म-विरोधी कम्युनिस्ट चीन का खुफिया अखाड़ा बनाने में संलग्न है ? नेपाली नेताओं की इस पैंतरेबाजी से कम से कम भारत की नजर में तो नेपाल, एक मजबूत पुल कदापि नहीं बन सकता।
अब, जहां तक मामला चीन और भारत का है तो यह स्पष्ट है कि जबतक भारत और चीन के बीच सीमा विवाद कायम है, जबतक चीन अपने कब्जे में ली हुर्इ हजारो वर्गमील भारतीय क्षेत्र को वापस नहीं करता, जबतक चीन भारत के अरुणाचल प्रदेश सहित अन्य भारतीय क्षेत्रों पर अपने दाबे से बाज नहीं आता, तबतक भारत-चीन संबंध सुमधुर तो क्या दोनों देशों के बीच सामान्य दोस्ती भी कायम नहीं हो सकती। क्योंकि, आज के भारत का कोर्इ भी दल विशेष या नेता विशेष उक्त समस्याओं के समाधान हुए बगैर चीन से गले मिलने की हिमाकत नहीं कर सकता।
इसी प्रकार जबतक तिब्बत के धर्मगुरू दलार्इ लामा अपने लाखों शरणार्थियों के साथ तिब्बत नहीं लौट जाते, जबतक तिब्बत का मामला पूरी तरह निबट नहीं जाता और जबतक नेपाल में रह रहे सभी तिब्बती अपनी धरती तिब्बत नहीं लौट जाते, तबतक चीन का भारत पर भला कैसे विश्वास हो सकता ? वह भला नेपाल पर भी क्यों विश्वास करता रहेगा ? तिब्बत में बौद्धों पर जारी ज्यादतियों से उबकर भाग रहे कुछ मुÎी भर तिब्बती शरणार्थियों को चीन के हवाले कर देने मात्र से चीन, भला नेपाल पर कबतक विश्वास करेगा ?
ऐसी सिथति में नेपाली प्रधानमंत्री डा. बाबूराम भÍरार्इ के इस कथन में कुछ दम जरूर दिखता है कि यदि नेपाल, चीन और भारत के बीच एक मजबूत पुल नहीं बन सका तो उसे चीन या भारत में विलय हो जाने की सिथति पैदा हो सकती है।
(इति)

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