यमलोक की यात्रा

मुकुन्द आचार्य:यात्रा करने से नए-नए तजर्ुर्वे होते हैं। नए-नए इन्सान से परिचय होता है। गर आप दौलतमंद न हों और विदेश घूमने के लिए टेंट में पैसे न हों तो मुँह लटका कर मत बैठिए। चलिए कुछ देर यमलोक घूम आते हैं। शरमाईए मत ! आ जाईए ! आ जाईए !!
क्या फरमाया आपने – र्स्वर्ग चलें घूमने – र्स्वर्ग में इन्ट्री मारने के लिए धरम-करम करना लाजीमी होता है। और मैंने तो वैसा कुछ आज तक किया नहीं, आपने भी धरम-करम किया होगा, ऐसा तो नहीं लगता। इस लफडÞे में टाइम बर्बाद न करें। चलिए यमलोक घूम आते हैं। पासपोर्ट भीसा किसी चीज की जरूरत नहीं है। मुँह उठाकर चले आईए। बाद में तो यहीं आ कर रहना है ही। लीजिए, हम लोग आ गए, यमलोक में। यहाँ की सुन्दरता लाजवाव है। यहाँ के राजा यमराज जी ओर उनके सारे अफसरान भैंसे की सवारी करते हैं। डिजेल पेट्रोल के भाव असमान छू रहे हों तो भी यहाँ कोई र्फक नहीं पडÞता। abu-jindal-and-kasab
नेपाल में मम, ममचा, मोमो, छोयला-कचिला, सेकुवा, तास -मास के विविध व्यंजन) आजकल महंगे हो रहे हैं, उसका खास कारण है, यहाँ यमलोक में पूरे शासनतन्त्र के लिए भैस-भैंसा का इस्तेमाल धडÞल्ले से और शान से होता है। बेहतर होता हमारे नेपाल में भी लोग भैंसे की वेराइटी खाने के बजाय उसकी सवारी करते तो देश का अर्थतन्त्र दिन दूना रात चौगुना तरक्की करता। पेट्रोलियम पदार्थों की ओर हम फूटी आँखों से भी न देखते ! भाँड में जाए आयल निगम !
काले भैंसे पर सवार काले कलूटे यमराजजी की छवि निहारिए। अरे उधर देखिए, मुहल्ले के तोलारामजी इधर ही आ रहे हैं।
‘सेठ जी जय रामजी की !’
‘जय रामजी की। जयराम जी की।’ सेठजी ने पसीना पोंछा।
‘अरे आप तो बहुत बडेÞ धर्मात्मा थे। हर रोज मंदिर में माथा टेकने जाया करते थे। आपको तो र्स्वर्ग में सैर करना चाहिए था। यहाँ नर्क में कैसे आना हुआ –
सेठ तोलाराम ने मन ही मन कुछ बोलते हुए कहा, देखो भाया ! यहां का नियम कानून बडÞा विचित्र है। मुझे र्स्वर्गसे यहाँ नर्क में धक्का मर कर गिरा दिया गया है। कमर में कस कर चोट लगी है !
क्यों – सेठजी ऐसा अन्याय क्यों हुआ – -मैने सार्श्चर्य पूछा। ‘यहाँ भी यमराज की दादागिरी चलती है। मैंने तो बहुत कहा- मैं हर रोज भगवान के मन्दिर जानेवाला धर्मात्मा प्राणी हूँ, मुझे क्यों नर्क में घसीट रहे हो – वैसे भी नर्क में बहुत भीडÞ पहले से है। यमराज के गर्ुगाें ने कहाँ- तूँ मन्दिर तो जाता था, मगर तेरा ध्यान भगवान के बदले अपने जूते की ओर ज्यादा रहता था। इसीलिए तुझे यहां जूते मिलेंगे, यानी जूते पडेंगे।’ हम लोग सेठ जी को जूते खिलाने ले जा रहे हैं।
और सेठजी ने आजतक और जो धर्म किया, उसका क्या – -मैने पूछा।
इसका जवाव एक यमदूत ने दिया- सेठजी का असली ध्यान तो जूते पर रहता था। तो धरम काहे का – भगवान के मन्दिर में इनको सबसे बढÞकर जूते ही प्रिय थे तो यहाँ भी उन को जूते ही मिलेंगे न। रोपे पेडÞ बबूल के तो आम कहाँ से होय – आप ने सुना ही होगा।
इतने में सेठ चोंथमल नमूदार हुए। उन्हें भी काले काले मुस्तंड यमदूत घसीट कर नर्क की ओर लिए जा रहे थे। मैंने पूछा- सेठजी ! आप तो बहुत बडेÞ समाजसेवी थे। आपसे क्या गल्ती हर्ुइ कि नर्क में आपकी खींचाई हो रही है –
सेठ चोंथमल ने कहा- अब आपसे क्या छुपना। मैं भी समाजसेवा करते समय कुछ हेराफेरी कर लेता था। उसीके एवज में मुझे नंगा कर के सरेआम दौडÞाने वाले हैं। यहाँ तो नेपाल से भी ज्यादा अन्धेर है। अरे काम करते समय थोडÞी सी गल्ती हो गई तो कौन सा पहाडÞ टूट गया। खडूस कहीं के !
‘देखिए आचार्य जी ! आप तो पुराने पत्रकार हैं। आप जब यहाँ से लौट कर मर्त्यलोक में जाएंगे तो इस बारे में पत्रिका में चर्चा कीजिए। हद हो गई भैया। यहाँ तो ‘अन्धेर नगरी चौपट राज, टके सेर भाजी टके सेट खाजा’ वाली बात चरितार्थ हो गई।’ -सेठजी बहुत ही झल्लाए हुए थे। बेचारे ….!
मैंने उन्हें आश्वस्त किया, सेठजी आप बेफिक्र रहें। मैं जरूर इस मामले का जिक्र जोरदार ढंग से करुंगा। यहाँ भी मैं लोकतन्त्र की स्थापना के लिए जरूर पेपरवाजी करुंगा।
सेठजी को मेरे सामने ही यमदूत घसीटते हुए ले गए। मैं कुछ न कर सका। उनके बचाव में मन ही मन खुद को धिक्कारता रहा, अपनी वेवसी पर ! बुरी तरह कुढÞता रहा।
सेठजी को नंगा कर के दौडÞया जाएगा, यह जानकर मुझे बहुत दुःख हुआ। इतने में एक अच्छे खासे महंगे क्याम्पस के प्रिंन्सिपल को अभिभावक लोग खदेडÞ-खदेडÞ कर मार रहे थे। मैंने आगे बढÞकर उनको रोका और इस तरह मारने का कारण पूछा। तो एक अभिभावक ने बताया- शिक्षा देने के नाम पर इस क्याम्पस चीफ ने खूब लूटा है। बच्चू को उसीका मजा चखा रहे हैं, हम लोग ! पकडÞ में आ जाए तो उसकी बोटी-बोटी काट कर कुत्तों को खिला देंगे।
क्या कहा आपने – डर लग रहा है – कैसा डर – काहेका डर – ‘हम लोग भी तो नेपाल में अपने मांसाहार में भैसे पाडÞा-पाडÞी सब को निगल जाते हैं। मरने पर तो हम लोगों को भी भैसे के भाई भतीजे यहाँ मार-मार कर कचूमार निकाल देंगे। चलिए यहाँ से भाग चलें। यहां रुकना खतरे से खाली नहीं है।’ -एक सहयात्री ने कहा।
यात्रा में सहयात्री साथ न दें तो मजा नहीं आता। हम लोग फिर काठमांडू एक्सप्रेस से वापस आगए।

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