यह कैसी नीति और कैसा कार्यक्रम ? बिम्मीशर्मा

बिम्मीशर्मा, काठमांडू ,९ मई  |

इस बार भी नेपाल सरकार ने नीति तथा कार्यक्रम नाम के दो जुड़वाँ बच्चों को जनम दिया है । जो हर साल इसी महीने या मौसम में नेपाल सरकार पैदा करती आई है । जिस तरह गरीब लोग बच्चे तो पैदा कर देते हैं उन्हे पालने और पोसने की जहमत नहीं उठाते । गरीब के बच्चे सड़क में ही जिन्दगी गुजार देते हैं । उसी तरह नेपाल सरकार भी हर साल नीति तथा कार्यक्रम नाम के इन जुड़वाँ बच्चों को पैदा तो करती है पर इन्हें पालने, पोसने या अमल में लाने का काम भाड़ में जाए उसकी बला से । बिना किसी पूर्व तयारी या योजना के यह हर साल काल कवलित हो जाती है ।

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नेपाल में कब क्या हो जाए और कौन सा पासा कब पलट जाए यह कोई नहीं जानता । नाम से “प्रचण्ड” पर बिचार से फिसड्डी और पैसे के आगे फिसल जाने वाले माओवादी सुप्रिमो पुष्पकमल दहाल आज सरकार से समर्थन वापस लेते हैं और दूसरे ही दिन फिर समर्थन करते हैं । शासन सत्ता इन्हें मजाक की वस्तु लगती है । बेचारा करे भी तो क्या करें ? जनयुद्ध में मारे गए १७ हजार नेपाली यों का भूत इन्हें सोने नहीं देता और हेग का अन्तराष्ट्रिय अदालत सपने में आ कर डराता रहता है । प्रचण्ड कि स्थिति “आम से गिरे और खजुर मे अटके” जैसी हो गई है ।

ओली की सरकार न निगलते बन रहा है न उगलते बन रहा है । इसीलिए अपनी पार्टी और खुद को बचाने के लिए ९ बुंदे सहमति कर के गंगा नहा रहे हैं । उस सहमति में जनयुद्धकाल के अपराध और मुद्धे को न उठाने और उन पर कोई कार्वाही न करने की नेकपाएमाले और एमाओवादी के बीच में सहमति और समझदारी हुई है । इस के बाद ओली गोली और बोली पर टिकी हुई खोखली सरकार की म्याद और कुछ महीनों के लिए बढ़ गई है । पिएमओली जो निष्कटंक सत्ता चलाना चाहते हैं ।rashtr

जब प्रचण्ड ने फिर से समर्थन किया तब ओली की मझदार में डोलती सत्ता की नैया कुछ महीनों के लिए थम सी गयी है । तब चैन की सांस लेते हुए पीएमओली की सरकार ने इस साल की नीति तथा कार्यक्रम संसद में प्रस्तुत किया । यह नीति तथा कार्यक्रम कम जनता को लुभाने के लिए लाया गया ललिपप है । जिस में महंगाई और कालाबजारी का कोई जिक्र नहीं हैं । इस में तो देश के नागरिकों का शैक्षिक प्रमाणपत्र और योग्यता का खरदि फरोख्त करने का एलान किया गया है । जिन के पास कोई योग्यता या डिग्री है उन्हे उसी हिसाब से बैंक से लोन मिलेगा । अब बैंक से लोन ले कर कोई क्या करेगा ? देश का माहोल इतना खराब है तब अपने शैक्षिक प्रमाणपत्र को बैंक मे गिरवी रख कर मिले लोन से यहां का बेरोजगार युवा रोजगारी के लिए विदेश या खाड़ी मुल्क जाएगा ।

देखिए पीएमओली के सरकार का शातिर दिमाग कैसे काम कर रहा है । शैक्षिक प्रमाणपत्र के आधार पर सरकार देश के नागरिकों को लोन देगी उसी पैसे को वह देश में नए उधोग या कारखाना खोल कर भी तो रोजगार दे सकती है । पर नहीं देश के युवा सरकार के लिए फसाद के जड हैं । जब वह यहां रहेंगे सरकार के खिलाफ बवाल या विद्रोह करेंगे । जब वह उसी पैसे से विदेश पलायन हो जाएँगें तो सरकार शांति से अपना काम करेगी । सरकार की वैशाखी के रूप में मंहगाई और बेरोजगारी तो है ही साथ देने के लिए । यहां रहेंगे तो यूनियनबाजी कर के मुश्किले खड़ी करेंगे ।

इसीलिए यह सरकार नाक को घुमा कर छूते हुए देश के नागरिकों की प्रतिष्ठा और अस्तित्व पर ही वार कर रही है । देश में ही अच्छा माहौल बना कर नागरिकों का भविष्य सुरक्षित बनाना तो दूर की बात वह तो किसी माल, सामान या वस्तु की तरह नागरिकों की योग्यता का खरीद, फरोख्त कर रही है । यदि कोई बैंक का यह लोन समय पर दे नहीं पाया तो क्या बैंक किसी प्रोपर्टी की तरह उस शैक्षिक प्रमाण पत्र की निलामी भी करेगी । तब उस निलामी को खरिदेगा कौन ?क्या किसी की शैक्षिक प्रमाणपत्र या योग्यता कोई पैसे से आंकी जाने वाली वस्तु है ?

देश के नागरिकों का शैक्षिक प्रमाणपत्र और योग्यता का मूल्य तय करने के बाद अब उनको भी शेयर बजार में सूचिकृत कर देना चाहिए । ताकि जिस के पास जितनीज् यादा योग्यता और मेरिट लिष्ट है उस पर कोई कालेज या कंपनी अपना दावं लगाएं और पैसे कमाए । हो सकता है कोई निरक्षर इस प्रमाणपत्र को खरीद कर खुद के साक्षर होने का दावा करे । आखिर बैंक वही तो करता है । कभी हाइड्रो पावर या बैंक के शेयर का उठापटक होती थी अब शैक्षिक प्रमाणपत्रों का होगा ।

सब से हंसी की बात आने वाले मंसिर (नवंबर या दिसंबर) में स्थानीय निकाय के निर्वाचन करने का एलान किया गया है । क्या इतनी आसानी से एमाओवादी यह चुनाव होने देगी । जिस पार्टी के पांच टुकड़े हो चुके हैं । उस छितरे हुए पार्टी जिसका जनता विश्वास नहीं करती, जनता का मोहभंग जिन से हो चुका हो वह कभी नहीं चाहेगी स्थानीय निकाय का निर्वाचन हो । कथनी और करनी का कितना मजाक इस नीति तथा कार्यक्रम में उड़ाया गया है उस का कोई सानी नहीं ।

जिस दिन नीति तथा कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है उस दिन राजधानी की ट्रैफिक जाम का तो कहना ही क्या ? इस के बारे में एक उपन्यास लिख कर छापा जा सकता है । देश के महामहिम राष्ट्रपति की सवारी देश के नागरिकों के लिए बेबसी का सबब बन जाती है । उस जाम में पड़ कर कोई बीमार अपना प्राण त्याग दे या कोई गर्भवती महिला अस्पताल जाने से पहले रास्ते में ही बच्चे को जनम दे दे राष्ट्रपति की बला से । वह तो राष्ट्रपति है देश के नागरिकों के दुख और सरोकारों से उन्हे क्या मतलब । उन्होंने ने तो बस शीतलनिवास, सिंह दरवार और बालुवाटार का ही ठेका लिया हुआ है । बांकी देश और जनता जाए भाड़ मे । वह क्यों सोचे मुफ्त में मिला हुआ पद जो है ।

यह कैसी नीति और कैसा कार्यक्रम है जिस में जनता के न्यूनतम आवश्यक्ता की पूर्ति करना तो दूर की बात उन के अभावों के बेलुन पर सपने की हवा भर कर आकाश में उड़ाया गया । लाचार और बेबस जनता आकाश पर उड़ते उसी बेलुन को देख रही है ।  (व्यग्ंय)

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