यह नेपाल है रुवाण्डा नहीं

कुमार सच्चिदानन्द:पिछले कुछ दिनों से नेपाल के राजनैतिक वृत्त में न जाने कैसी-कैसी चर्चाएँ जगह पाती रही हैं । पहले नेपाल के सिक्कमीकरण और भूटानीकरण की बात  की जाती थी लेकिन  इससे ऊपर उठकर कुछ दिन पर्ूव यूके्रन की चर्चा की जाने लगी । आज यूक्रेन की बात भी पीछे पडÞ गई और रुआण्डÞा की चर्चा जोरों से आगे बढÞ

एक बात तो निश्चित है कि नेपाल काराजनै तिक एवं प्रशासनिक मनो विज्ञान कुछ हद तक रुवाण्डा की परि स्िथति काबोध कराता है औ र यह असंतो ष तराई आन्दोलन के रूप में पहले भी प्रस् फुटित हो चुका है ।

रही है । देश के कतिपय नेताओं द्वारा नेपाल की आन्तरिक परिस्थितियाँ रुआण्डÞा के अनुकूल बतलायी जा रही है । नेकपा एमाले अध्यक्ष नेपाल को रुआण्डÞा न बनने देने की बात करते हैं और लगातार करते हैं । वैसे भी ओली की बोली नकारात्मकता के लिए ख्यात है और कभी-कभी यह बेजुबान या बदजुबान की श्रेणी में भी आ जाती है तथा हास्यास्पद भी बन जाती है । उनका यह बयान इसी श्रेणी का माना जा सकता है । क्योकि जो संकट है नहीं उसकी परिकल्पना कर हवा में हाथ हिलाना या चलाना संतुलित मिजाज का कारनामा नहीं माना जा सकता । वस्तुतः ओली आज जिस मुकाम पर हैं और जिस महत्वाकांक्षा का वहन कर रहे हैं, वहाँ इनकी ये बातें पर्ूण्ातः असान्दर्भिक दिखलाई देती है और इसके द्वारा वे अपनी दर्घिकालीन स्वीकार्यता पर भी जाने-अनजाने प्रश्न-चिह्न लगा रहे हैं ।
बहरहाल, ८ गते माघ संविधान का जारी होना संभावित है । लेकिन सहमति की शर्त्त पर इसकी संभावना कम है और जिस प्रक्रिया में जाने की बात की जा रही है उसके द्वारा इसकी र्सवस्वीकार्यता की संभावनाएँ भी कम हैं । लेकिन ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि संविधान जारी होने के बाद वर्त्तमान प्रधानमंत्री श्री सुशील कोईराला मिर्ठाई की थाल की तरह सत्ता उन्हें हस्तान्तरित कर देंगे । यह परिकल्पना मात्र उनकी आवाज की प्रखरता निरन्तर बढÞा रही है और उनके मुखारबिन्द से जो बातें सामने आ रही है उससे स्पष्ट है कि न वे यहाँ की आन्तरिक स्थिति को सही ढÞग से समझ पा रहे हैं या समझकर भी न समझने की मूढÞता कर रहे हैं । यह देश न तो रुवाण्डÞा है और न ही रुवाण्डÞा हो सकता है, क्योंकि इसकी सीमाएँ दो महाशक्तियों द्वारा भूपरिवेष्ठित है और वहाँ कानून का शासन है । दोनों का नेपाल के साथ सम्बन्ध मित्रवत है और इसके सम्बन्ध में इनकी धारणाएँ सकारात्मक हैं । हाँ, पाकिस्तान या अफगानिस्तान के कबायली क्षेत्रों की तरह स्थिति अगर सीमाओं पर होती तो बात कुछ अलग थी । अब सवाल उठता है कि इस तरह की अज्ञात आशंकाएँ क्यों –
गौरतलब है कि रुवाण्डÞा में सन् १९९४ में जातीय नरसंहार हुआ था और सौ दिनों की अवधि में लगभग दस लाख आदमी मारे गए थे । मरनेवालों में तुत्सी समुदाय के लोग लगभग सत्तर प्रतिशत थे । मरनेवालों में कुछ उदारवादी हुतु समुदाय के लोग भी थे जिनकी हत्या महज इसलिए हर्ुइ थी कि वे तुत्सी समुदाय के प्रति हिंसक नहीं हो पाए थे । आज भी यह देश जातीय हिंसा से मुक्त नहीं हो पाया है । यद्यपि अन्य अप|mीकी देश भी इस तरह की हिंसा से पीडिÞत और प्रभावित हुए हैं लेकिन इतना व्यापक पैमाने पर नरसंहार की घटना शायद ही कहीं मिले । इस हिंसा का कारण सन् १९६२ में स्वतंत्रता के बाद गठित बहुसंख्यक हुतु समुदाय के शासन द्वारा सृजित विभेद था । इन लोगों ने राज्य की सभी संरचनाओं को अपने अनुकूल बनाने की कोशिश की थी । हालात यहाँ तक बिगडÞी कि अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों को अन्य देशों में भी शरण लेना पडÞा । इसी जमीन पर सशस्त्र संर्घष्ा की शुरुआत हर्ुइ । यद्यपि समझौते के प्रयास भी हुए और हुए भी । सामुदायिक आधार पर शक्तियों का विभाजन भी हुआ लेकिन बहुसंख्यक कट्टरपंथी राजनेता, सैन्य अधिकारी इसे मानने के लिए तैयार नहीं थे । इसी पृष्ठभूमि में १९९४ का नरसंहार हुआ ।
एक बात तो निश्चित है कि नेपाल का राजनैतिक एवं प्रशासनिक मनोविज्ञान कुछ हद तक रुवाण्डÞा की परिस्थिति का बोध कराता है और यह असंतोष तर्राई आन्दोलन के रूप में पहले भी प्रस्फुटित हो चुका है । लेकिन कटने-मरने का यह मनोविज्ञान अभी यहाँ नहीं और भविष्य में भी ऐसी संभाव्यता नहीं दिखलाई देती । क्योंकि जबतक दोनों ही मित्रराष्ट्रों से बेहतर कूटनैतिक सबन्ध हमारे हैं तब तक संहारक हथियार आपर्ूर्ति का कोई माध्यम नहीं । लेकिन जिस मनोविज्ञान में हमारी सरकार और शासन चल रहा उसमें अहिंसक आन्दोलन की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता । यह सच है कि मधेश की राजनीति करने वाले राजनैतिक दल मधेश की संवेदनाओं का सक्षम रूप में वहन नहीं कर पाए हैं, लेकिन उन्हें आधार शून्य भी नहीं माना जा सकता । फिर ऐसे भी तत्व का समावेश मधेश की राजनीति में समावेश हो चुका है जो स्वतंत्र मधेश की बात करते है । कल तक उनके पीछे गिनती के लोग थे । आज उनकी तादाद हजारों में पहुँचने लगी है । अगर उनके र्समर्थक लाखों में पहुँच जाएँ, वे सिर पर अहिंसक रूप से ही सही, कफन बाँध ले तो हालात अलग हो सकते हैं ।
अब सवाल उठता है कि यहाँ की राजनीति में शर्ीष्ास्थ राजनेताओं द्वारा क्यों रुवाण्डÞा की बात की जाती है और वैसी हालत न पनपने देने का दावा किया जाता है – जबकि न वे हालात हैं और न ही वैसी संभावना । गौरतलब है कि रुवाण्डÞा के इस नरसंहार को अंजाम शासक वर्ग द्वारा दिया गया था । फिर सवाल यह उठता है कि क्या नेपाल के शासकवर्ग इस तरह के बयान जारी कर विपरीत राजनैतिक विचारधारा के लोगों को यह संदेश देना चाहते हैं कि उनके नेतृत्व में इस तरह की घटना नहीं घटेगी, यह राष्ट्र के लिए कृपा का विषय है या इसके द्वारा वे आगामी संविधान में अपनी माँगों को संबोधित न होने पर असंतोष प्रकट करनेवालों के प्रति भावी दमन का संकेत दे रही है । एक बात तो निश्चित है कि सघीयता और शासकीय स्वरूप जैसे मुद्दे पर सहमति बन पाने की संभावना बिल्कुल नहीं है । प्रक्रिया में जाने की बात जोर शोर से की जा रही है । लेकिन यह भी तय है कि इन मुद्दों को सुलझाए बिना अगर संविधान जारी हुआ तो अवस्था जटिल होगी और हालात बिगडÞ सकते हैं ।
एक बात तो कि संविधान नेपाल में बहुप्रतिक्षित है और इसका जारी होना देश को संक्रमणकाल से निकालने के लिए आवश्यक है । लेकिन आधा-अधूरा, महत्वपर्ूण्ा मुद्दों को सुलझाए बिना बगैर सहमति सिर्फसत्ता के हस्तान्तरण के लिए संविधान जारी होता है तो इसे राजनैतिक दुराग्रह ही कहा जाएगा और यह राष्ट्र के लिए किसी भी रूप में विधायी नहीं हो सकता । नेपाल में संविधान जारी करने के लिए सहमति कितना आवश्यक है इस बात का संकेत भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पिछले दौरे में ही किया था और सबको समेट कर चलने की नसीहत दी थी । लेकिन यह सुझाव हमारी राजनीति के लिए सुपाच्य नहीं हुआ और इसके खण्डÞन के लिए आन्तरिक स्तर पर अनेक तर्क-कर्ुतर्क दिए गए । लेकिन चीन के द्वारा भी इसी तरह के सुझाव आए हैं और उन्होंने भी साझा बिन्दु खोजने की बात कही है । चीनी विदेश मंत्री ने अपनी काठमाण्डÞू यात्रा के दौरान निर्धारित समय में संविधान आने की बात तो कही ही लेकिन प्रमुख दलों के नेताओं को सहमति के बिन्दु तलाशने का सुझाव दिया । लेकिन ‘बिन यद्धेन केशवः’ के मनोविज्ञान से गुजरती हमारी सरकार और उसमें शामिल दल इन सारी बातों की उपेक्षा कर एक दुराग्रह की ओर लगातार अग्रसर है ।
संघीयता जो संविधान निर्माण की अब तक की यात्रा में गले का फाँस बनकर उभरी है उसके सर्न्दर्भ में मधेशियों और आदिवासी जनजातियों की अपनी व्याख्या है और सरकार तथा उसमें सहभागिता दे रहे दलों की अपनी । सच यह है कि कुछ समुदाय के लोगों ने स्वयं को राज्य द्वारा शोषित और उपेक्षित महसूस किया है – चाहे राजतंत्रात्मक व्यवस्था हो या प्रजातांत्रिक । इसलिए आगामी संविधान में पहचान सहित की संघीयता उनकी प्राथमिक माँग बन कर उभरी है । मगर संघीयता के इस सूत्र में शासक वर्ग विखण्डÞण की छाया देखते हैं । यह भी सच है कि छोटे-छोटे जातीय राज्य स्रोत, संसाधन और आर्थिक संभाव्यता की दृष्टि से आदर्श नहीं हो सकते लेकिन भिन्न पहचान वाले क्षेत्रों को सहमति के आधार पर एकर् इकाई में आबद्ध किया जा सकता है । इसके लिए सहमति की आवश्यकता है । लेकिन हमारी दुराग्रह-भावना इतना प्रबल है कि अब तक हमने इस दिशा में कदम ही नहीं बढÞाया और जाने-अनजाने देश को एक अनिश्चितता, अस्थिरता और द्वन्द्व की ओर धकेल रहे हैं ।
आज सरकार में शामिल दल और ऊपरी स्तर के राजनीतिकर्मी जो संघीयता का विरोध कर रहे हैं और पहचान सहित की संघीयता की माँग को धूमिल करने के लिए उत्तर-दक्षिण राज्यों का विभाजन करने का तर्क दे रहे हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि अगर पंचायती व्यवस्था के काल को छोडÞ भी दिया जाए तो प्रजातांत्रिक काल और जनान्दोलन-२ के बाद भी राजनैतिक प्रशासनिक क्रियाकलापों में क्यों नहीं उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि ‘देश की सारी जनता और सारा समुदाय समान है । राज्य सबका है और सबके लिए है । नेपाल एक छोटा देश है और छोटे-छोटे खण्डÞों मे. इसे विभाजित करना न तो उचित है और न ही वैज्ञानिक । इसलिए हम सब समानता के आधार पर एक छतरी के नीचे और एक इकाई के रूप में रह सकते हैं ।’ कहा जा सकता है कि अभिजात्यवादी विचारधारा, अतिवादी राजनैतिक चिन्तन और अदूर्रर्शिता के कारण हम इस अवस्था में पहुँचे है और आज भी हमारी राजनीति उसी दिशा में अग्रसर है ।
आज मधेश से सम्बन्धित माँगों के सर्न्दर्भ में जो व्याख्या-अपव्याख्या प्रस्तुत की जा रही है उसके मूल में मधेशी दलों का विचलन और दिशाहीन राजनीति है । मधेश की राजनैतिक दलों की सबसे बडÞी समस्या यह है कि वे आज भी उस मधुमास की मनःस्थिति से गुजर रहे हैं जिसका सुख उन्होंने प्रथम संविधानसभा के कार्यकाल में भोगा था । आज परिस्थितियाँ बदली हैं और गणितीय समीकरण उनके पक्ष में नहीं है । इसके अतिरिक्त सरकार या शासन तंत्र द्वारा उपेक्षा का दबाब भी उनपर बहुत गहरा है । लेकिन परिस्थितियों की यह जटिलता भी न तो इन्हें संगठित होने की प्रेरणा दे पायी और न ही कोई संयुक्त एजेण्डÞा ही इनके द्वारा प्रकाश में आया है । यद्यपि भारत के प्रधानमंत्री मोदी के आगमन से पर्ूव संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा के पुनर्जीवित होने की बात प्रकाश में आयी मगर इसकी कोई सक्रिय कार्य-दिशा अब तक प्रकाश में नहीं आई है । मधेशी राजनीति की यही यथास्थितिवादी प्रवृत्ति नेपाल की राजनीति में मधेश के लिए प्रतिकूल राजनैतिक चिन्तन को प्रोत्साहित करती है । मधेशी दलों की राजनैतिक दिशाहीनता, स्वार्थपरकता और अवसरवादिता उनकी राष्ट्रीय पहचान बन चुकी है । इसलिए आधा-अधूरा संविधान जारी होने पर मधेश में उठनेवाले असंतोष के रक्षाकवच के रूप में मधेशी दलों को सरकार में शामिल होने का आमंत्रण दिया जा रहा है और कुछ नेता इसमें र्सर्ुखरू ले रहे हैं । मगर इसके द्वारा वे मधेश को क्या संदेश देंगे, इस बात को वही बखूबी जानते हैं ।
आज का जो राजनैतिक परिवेश है उसके अनुसार सरकार में सहभागी दोनों ही राजनैतिक दल प्रबल संघीयता विरोधी के रूप में अपनी छवि प्रस्तुत कर रहे है । नेकपा एमाले तो प्रबलतर रूप में । इस दृष्टि से नेपाली काँग्रेस नेकपा एमाले के पिछलग्गू की भूमिका में नजर आती है । इसलिए उत्तर-दक्षिण सात राज्यों का संयुक्त मानचित्र उन्होंने जारी किया है । वास्तव में संघीयता की माँग का यह लक्ष्य कथमपि नहीं था । लेकिन सरकार और शासन इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ है कि पर्ूव में अनेक चरणों में अनेक दलों से किए हुए संधि-समझौते भी हैं । अगर इसकी उपेक्षा की जाती है तो इससे किसी न किसी रूप में सरकार की विश्वसनीयता भी खण्डिÞत होती है । आज दो दलों को मिलाकर प्राप्त हुए दो तिहाई बहुमत को आधार बनाकर संविधान में जो मानदण्डÞ तय किए जा रहे हैं, उससे असन्तुष्ट उनके भी मतदाता हैंं जो अवसर मिलने पर सत्ता के समीकरण बदल सकते हैं । आज जो दल हाशिये पर हैं कल मुख्य धारा में आ सकते हैं । इसलिए उठी हर्ुइ माँगों की उपेक्षा और दुराग्रह का कोई आधार नहीं । इसका वैज्ञानिक समाधान ढँूढना ही इस संक्रमण काल में बुद्धिमत्ता है ।
नेकपा माओवादी आज स्वयं को थकित महसूस कर रहे हैं, क्योंकि नेपाल की मुख्यधारा की राजनीति में परिवर्त्तन का संवाहक बनकर वे आए । लेकिन आज सत्ता यथास्थितिवादियों के हाथ में है और संविधान निर्माण के लिए जादर्ुइ आँकडÞा भी उनके पास है । सरकार का मनोभाव जानकर वे प्रबल विरोध के मनोभाव में है । अन्य अनेक असन्तुष्ट दल भी उनका साथ दे रहे हैं । नेकपा माओवादी के नेतृत्व में २२ दलों के मोर्चे को इसी सर्न्दर्भ में देखा जाना चाहिए । फिर वे दलगत विभाजन की पीडÞा भी भोग रहे हैं । यह सच है कि संविधान सभा के भीतर अपनी माँग मनवाने के लिए इन्हें अपेक्षित बहुमत नहीं लेकिन सडÞक के द्वारा इन्होंने सरकार पर दबाब सृजित करने का प्रयास किया तो परिस्थितियाँ उलझः सकती हैं । क्योंकि सरकार की संभावित संवैधानिक नीतियों का विरोधी अनेक वर्ग के लोग हैं और जब यह आग फैलेगी तो तर्राई या पहाडÞ -कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रहेगा ।
राजनीति सिर्फबयानों और नजीरों का खुला क्षेत्र नहीं, वह तर्कों और कुतर्कों का अखाडÞा भी नहीं, वह दुराग्रह और पर्ूवाग्रह का का दंगल मात्र भी नहीं, यहाँ राष्ट्रकल्याण अैर जनकल्याण की भावना से प्रेरित होकर समय सान्दर्भिक निर्ण्र्ाालेने होते हैं । देश किसी दल मात्र का नहीं, आम जनता का है और उनकी आकांक्षाओं को एक सिरे से कुतर्कों के आधार पर नकार देना किसी भी तरह उचित नहीं । इतिहास के जंगल में जब कभी हम गुजरते हैं तो इसका अर्थ सत्य के, मर्यादा के और प्रकाश के कणों को बटोरना ही होता है, बयानों की आँधी द्वारा रोशनी के दीये को बुझाना नहीं । इसलिए हमारी राजनीति को दिशा देनेवालों को समझना चाहिए कि यूक्रेन और रुवाण्डÞा का इतिहास हमारे लिए नीति-निर्धारण और परिमार्जन के लिए आवश्यक है, सिर्फबयानों के आधार पर अंधकार को गहराने के लिए नहीं । हमें यह समझना चाहिए कि यह नेपाल है, इसकी अपनी परिस्थितियाँ हैं, रुवाण्डÞा नहीं ।

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