यह महज एक मौत नहीं !!

यह महज दुष्कर्म से पीडित एक लडकी की मौत नहीं है, यह व्यवस्था पर देश के भरोसे की मौत है, यह जनता की राजनीतिक व्यवस्था से उम्मीद की मौत है और देश की राजधानी की सडÞकों पर सुरक्षा के अहसास की मौत है। बहादुर लडकी की मौत ने देश की सरकार, रहनुमाओं, नौकरशाही, पुलिस और पूरी व्यवस्था की नाकामी और उसकी संवेदनशीलता पर सवाल खडे कर दिए हैं। सरकार इन पूरे अति संवेदनशील सरोकारों पर जिन तरीकों से निपटी, वह निहायत गैर जिम्मेदाराना था।
यह तो पहले से ही देश को मालूम था कि जनांदोलनों से निपटना सरकार को नहीं आता, लेकिन जनाक्रोश से देश की सर्वोच्च चौखट खटखटाती जनता को भरोसा दे पाने में भी सरकार विफल रहेगी, यह देश ने पहली बार देखा। १६ तारीख की रात देश की राजधानी की सडÞक पर घटी इस जघन्य घटना की भयावहता का अहसास तो ३६ घंटों बाद देश की सबसे बडी जन पंचायत को हुआ। सरकार तो लगभग पांच दिन बाद जागी। वह भी तब जब देश के मन में घुमडÞ रहे लावे का जनाक्रोश राजपथ से लेकर बलिया, बस्ती, बहराइच और बीरभूमि ही नहीं, बल्कि देश के हर प्रांत और हर जनपद में फूटने लगा।
देश ने यह भी बता दिया कि सरकार जब जनता से सीधे संवाद से डरती, भागती है और अपनी जिम्मेदारी नौकरशाही, पुलिस पर छोड बैठती है तो जनता के भरोसे का कत्ल कैसे होता है। २२ और २३ तारीख को जनाक्रोश का जो मंजर देश में दिखा वह अब इतिहास बनने जा रहा है। सरकार ने संवेदनशील इस विषय पर जिस तरीके से निपटने की कोशिश की, वह बेहद बचकाना साबित हुआ। उससे अधिक पूरे मसले से निपटने व हडबडाहट की चूकों का अहसास सरकार को शायद अब हो रहा होगा। अपनी भूलों पर परदा डालने के लिए शुरुआत में सरकार ने जिस तरह अपनी ‘बी’ टीम उतारी उसका अधकचरापन तो किसी से छिपा नहीं है। कांग्रेस शासित प्रदेश के एक जिम्मेदार नेता तो यहां तक कह गए कि देश को आजादी भले ही आधी रात को मिली हो, लेकिन महिलाओं को आधी रात तक सडÞकों पर टहलने की आजादी तो नहीं होनी चाहिए।
सरकार ने संवेदनशीलता को भांपते हुए बाद में जो भी कदम उठाए, वह भले ही नेकनीयत से भरे हों, लेकिन जनता उन्हें भी संदेह की नजरों से देख रही है। देश के सबसे बडÞे अस्पताल एम्स व सफदरजंग के प्रतिष्ठित डाक्टर जिस तरह से दबी जुबान से ही सही सरकार की हडबडी पर सवाल खडÞे कर रहे हैं, वह किसी से छिपे नहीं हैं। मसलन, २७ तारीख की आधी रात को सफदरजंग अस्पताल से इलाज के लिए सिंगापुर ले जाने के तरीकों पर हर जिले में बहस जारी है। पूरे देश में फैले स्वतः स्फर्ूत राष्ट्रव्यापी जनाक्रोश के बाद ही सरकार की नींद क्यों टूटती है- बहस इस पर भी चल रही है कि देश के प्रधानमंत्री को अपना मौन तोडÞने में एक सप्ताह का समय क्यों लग गया –
सिंगापुर के मशहूर माउंट एलिजाबेथ अस्पताल के डाक्टरों को पीडिÞत को भर्ती करते समय ही यह क्यों कहना पडÞा कि मरीज की हालत बहुत नाजुक है, हम भरसक प्रयास करेंगे। देश की जनता मन में उमडÞ रहे संदेह को देखकर सरकार को आखिर यह सफाई क्यों देनी पडÞी कि यह कोई राजनीतिक फैसला नहीं बल्कि डाक्टरों की सलाह पर लिया गया निर्ण्र्ााथा।
देश की राजधानी में परिवहन विभाग, ट्रैफिक व दिल्ली पुलिस का गठजोडÞ भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। आखिर छह बार जब्त की जा चुकी बस राजधानी की छाती पर बेखौफ कैसे दौडÞती रही – इस सबके बावजूद पुलिस कमिश्नर यह साबित करने में लगे रहे कि विजय चौक से रायसीना हिल्स के बीच पुलिस ने जो किया, वह वक्त की नजाकत थी। देश की शर्ीष्ा अदालत पुलिस व उसके रवैये पर अपनी नाराजगी दिखा रही थी, लेकिन केंद्रीय गृह सचिव दिल्ली पुलिस की पीठ ठोंक रहे थे। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे भी कह रहे थे कि यदि माओवादी हथियार लेकर राजपथ पर आ जाएं तो क्या उनसे संवाद किया जाएगा। शिंदे की जगह अगर वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने न संभाली होती तो पता नहीं गृह मंत्री और क्या-क्या कह जाते। महिला व च्च्चों की सुरक्षा के लिए नीति तो २००१ में ही बन गई थी, लेकिन उसके क्रियान्वयन के प्रति सरकारें कितनी गंभीर हैं, इस पर अब सवाल पूछे जाने लगे हैं। सवाल राजधानी की जनता पर भी उठ रहे हैं। देश की जनता आज अपने रहनुमाओं व खुद अपने आप पर शर्मसार है।
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