यह महिला अधिकार की लड़ाई नहीं, मानवता की लड़ाई है

आरती चटौत, पत्रकार
नेपाल टेलीविजन
वर्तमान संविधान में हमने क्या खोया क्या पाया इस विषय पर मैं कुछ आधारभूत बातों को इस सन्दर्भ में रखना चाहती हूँ । विगत ४७ का संविधान,

आरती चटौत, पत्रकार नेपाल टेलीविजन

आरती चटौत, पत्रकार
नेपाल टेलीविजन

अंतरिम संविधान या आज का संविधान हर बार हमने इसका अध्ययन किया और महिलाओं के मुद्दे पर आवाज भी उठाने की कोशिश की । अंतरिम संविधान के आने के बाद हम जितने उत्साहित हुए आज जब हमें संविधान मिला तो सच पूछिए महिला वर्ग इससे निराश ही हुआ है । निराशा का अर्थ यह नहीं कि हम थक गए हैं । इस संविधान ने तो हमें और भी प्रेरित किया है कि हम अपने अधिकार की प्राप्ति के लिए और भी जोश के साथ आगे बढ़ें । वर्तमान संविधान में कई तथ्य ऐसे हैं जिनसे लगता है कि यह संविधान हमारे लिए सकारात्मक है किन्तु जब इसका गहराई से अध्ययन किया जाता है तो पता चलता है कि दिए हुए अधिकार को भी बड़ी होशियारी के साथ ले लिया गया है ।

वर्तमान संविधान में जो प्रस्तावना के अन्तर्गत पितृसत्तात्मक संरचना शब्द को हटा दिया गया है, और इस बात को अगर नागरिकता से ले जाकर जोड़ा जाय तो यह बात इस मानसिकता को दर्शाती है कि हमारे शासक कर्ता महिला के प्रति किस दृष्टिकोण को रखते हैं । वो आज भी पुरातन सोच से ही ग्रसित हैं और इसका उदाहरण वर्तमान संविधान में स्पष्ट परिलक्षित होता है । अगर नागरिकता की बात ही ली जाय तो हम देखते हैं कि एक महिला अपने जीवन में किसको अपना जीवन साथी चयन करती है इस अधिकार को राज्य निर्देशित करता है । कितनी अजीब बात है कि राज्य हमें कहता है कि तुम किस से, कहाँ के और किस समुदाय के साथ ब्याह करोगी तो तुम्हें नागरिकता का अधिकार प्राप्त होगा यही नहीं जिस संतान को माँ अपने कोख में रखती है जन्म देती है और माँ ही बताती है कि उसका पिता कौन है ? माँ सत्य है और पिता विश्वास, जिसका निर्धारण माँ करती है । किन्तु कैसी विडम्बना है इस देश की कि माँ अपने संतान को देश का नागरिक बनने का अधिकार नहीं दिला सकती । माँ के नाम से बच्चा तब पहचाना जाएगा, जब उसका पिता लापता हो जाता है किसी भी वजह से । यह कैसी सोच है ? इतना ही नहीं एक नेपाली महिला विदेशी पुरुष से विवाह करती है, तो उसके बाद क्या परिस्थिति होगी हमारा संविधान वहाँ भी मौन है । एक महिला कहाँ और किससे शादी करती है इस बात पर हमारा राज्य नियंत्रण करता है किसका बच्चा हम अपनी कोख में रखें या ना रखें इस पर भी राज्य निंयत्रण करता है । हमारा संविधान उसी पितृसत्तात्मक सोच को स्थापित करता है, जहाँ यह निर्धारित है कि महिला का अर्थ एक सीमित दायरे में आता है और जिसका रहन सहन समाज या परिवार और राज्य निर्धारित करता है । महिला को मानव नहीं प्राणी मात्र देखने की सोच को ही संविधान स्थापित कर रहा है । पितृसत्तात्मक समाज महिला के सार्वजनिक जीवन की कल्पना नहीं करता है और न ही स्वतंत्र पहचान की कल्पना करता है । उसे हमेशा किसी ना किसी मर्द के नाम से ही पहचान मिलती है, यही इस समाज की परिकल्पना है । जो महिला के यौनिक पहचान को नियंत्रित करती है । महिला किससे शारीरिक सम्बन्ध रखे ना रखे वो चरित्रहीन है या चरित्रशील, यह सभी पितृसत्तात्मक समाज तय करता है । इससे नारी बाहर न निकले इसके लिए धर्म, परम्परा, संस्कृति, परिवार इन सभी का भय उसे दिखाया जाता है । अगर इसे वह तोड़ती है तो वह चरित्रहीन है । इसी व्यवस्था को यह संविधान स्थापित करता है । यह एक ऐसा संविधान है जो बार बार यह अहसास दिलाता है कि तुम एक नारी हो इसलिए तुम्हें किसी स्वतंत्र पहचान या अधिकार की आवश्यकता नहीं है । तुम नारी हो और दूसरे दर्जे की नागरिक हो इस बात की पुष्टि ही आज का संविधान हमें कराता है । जनआन्दोलन हुआ जिसके पश्चात् एक नई शुरुआत हुई । दमित को आगे बढ़ाना और सीमान्तकृत को उठाना यह तय हुआ । हजारों हजार नेपाली जनता ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया । उस समय यह अवधारणा आई कि माँ के नाम से नागरिकता मिलेगी किन्तु इसे पुरुष प्रधान सोच ने मानने से इनकार किया जिसका परिणाम आज का संविधान है । कुछ ने अदालत के बल पर इस आधार के अनुसार नागरिकता भी प्राप्त किया । कानून ने जब यह फैसला दिया तो इसका कार्यान्वय हमेशा के लिए होना चाहिए था इसे आधार बना कर औरों को नागरिकता मिलनी चाहिए । परन्तु ऐसा नहीं हुआ । हमारे नीति निर्माता ने इसे अनदेखा किया । अर्थात् सर्वोच्च का फैसला भी इस देश में लाचार हो गया जिसके पीछे वजह है इस समाज और सत्ता में बैठे लोगों की पितृसत्तात्मक सोच । मानसिकता आज भी यही है कि नारी को यह समाज मानव नहीं मानता है । ऐसा भी नहीं है कि सभी पुरुष की सोच ऐसी ही है कई लोग ऐसे हैं जो हमसे भी अधिक क्रांतिकारी सोच हमारे प्रति रखते है और कई महिलाएँ ऐसी हैं जो खुद ही खुद के लिए दुश्मन बनी हुई हैं । ३३ प्रतिशत की हमारी सहभागिता को चार दलों ने मिलकर काटा और ऐसे संविधान का निर्माण किया जहाँ हमें दूसरे दर्जे का बना दिया गया । हमारी आवाज को दबाया गया या फिर यूँ कहें हमारी आवाज में ही दम नहीं था । यानि हमें और भी बुलन्दी के साथ अपनी आवाज सत्ता तक पहुँचानी होगी । यह आवाज सिर्फ सड़क से सम्भव नहीं है, इसे संसद में अपनी उपस्थिति को मजबूत कर के सामने लाना होगा । पुरानी सोच और चेहरे से परिवर्तन सम्भव नहीं है । एक और बात कि यह मत सोचिए कि यह महिला की लड़ाई है इसे मानवता की लड़ाई समझिए और हमारा साथ दीजिए । एक पुरुष के जीवन में कम से कम तीन चार महिला तो होती है चाहे वो माँ, बहन, बेटी या पत्नी के रूप में हो । अगर ये तकलीफ में हैं तो आप कैसे खुश रह सकते हैं ? इस बात को समझने की आवश्यकता है तभी हमारा समाज और हमारी मानसिकता परिवर्तित हो सकता है तथा विभेद समाप्त हो सकता है ।

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