यात्रा नुवाकोट की

prakash upadhyaनेपाली में एक कहावत है– पशुपतिको दर्शन र सिद्राको व्यापार । अर्थात काठमांडू जाने पर भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन का लाभ तो मिलेगा ही साथ ही सिद्रा (सूखी मछली) का व्यापार भी हो जाएगा । भगवान पशुपतिनाथ का दर्शन करते वक्त प्रसाद के रूप में सूखी मछली तो चढाई नही जा सकती । फिर यह उक्ति क्यों ? इस संबंध में बहुत सोचने पर इस निष्कर्ष पर पहँुचा कि यदि काठमांडू चला जाय तो रास्ते भर या वहाँ पहुँचने पर मछली बेची जा सकती है और इस प्रकार वहाँ के लिए खर्चेपानी का जुगाड़ हो पाएगा । अर्थात एक पंथ दो काज ।
यह उक्ति मेरे जीवन में भी उस समय लागू हुई जब मैं ४६साल के भारत प्रवास और ४२साल तक भारत सरकार की सेवा करने के बाद स्थायी रूप से काठमांडू आया । इससे मुझे कई बार भगवान पशुपतिनाथ का दर्शन करने का सौभाग्य तो प्राप्त हुआ ही ऐसे कई दरवाजे दिखते गए जो सेवाकाल में खुल नही पाए थे । अर्थात स्वदेश लौटने पर ‘पशुपतिको दर्शन र सिद्राको व्यापार’ का मार्ग प्रशस्त हो उठा । मेरे लिए ऐसा ही एक मार्ग था – पर्यटन के क्षेत्र का, जो कभी देश के अंदर के पर्यटकीय महत्व के दर्शनीय स्थल के लिए खुुलते थे तो कभी विदेश के लिए । (इस सन्दर्भ में गोरखा दरबार की नियात्रा के बारे में इस पत्रिका में एक लेख छप चुकी है ।)
गोरखा दरबार की यात्रा से लौटने के बाद इच्छा जगी नुवाकोट जाने की । यह भी काठमांडू का एक निकटवर्ती जिला है, जो पर्यटकीय महत्व के दर्शनीय स्थलों से भरा तो है ही, ऐतिहासिकता और धार्मिक पक्ष भी लिए हुए है । काठमांडू के उत्तरपश्चिम में लगभग १५किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित यह जिला पृथ्वी नारायण शाह के लिए सामरिक महत्व का था । अतः उन्होंने नेपाल एकीकरण के अभियान के सिलसिले में इसे काठमांडू का प्रवेश द्वार के रूप में माना और इसके ऊपर कई बार हमला करते रहे । अंततः इस पर विजय पाने के बाद वे काठमांडू उपत्यका के तीनों जिलों को एक–एक कर अपने कब्जे में लेने में लीन हुए ।
कई प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों से भरा यह जिला एक समय में तिब्बत के साथ व्यापार और चीन के साथ की लड़ाई और वेत्रावती में हुई संधि के कारण भी प्रसिद्ध रहा । इन्ही सब तथ्यों के कारण मैं एक दिन अपने एक मित्र शंकर लाल श्रेष्ठ के साथ निकल पड़ा इस ऐतिहासिक, पर्यटकीय और व्यापारिक महत्व के जिले की यात्रा पर ।
इस पहाडी जिले की यात्रा पर जाते हुए हम लोगों ने गल्छी का मार्ग पकड़ना उपयुक्त समझा । साथ में बैठे शंकर लाल  कहने लगे – ‘यदि हम इस मार्ग से यात्रा करें तो प्रकृति की असीम सुंदरता का आनंद उठा पाएँगे ।’ अतः हम लोगों ने उस माइक्रो बस से यात्रा शुरु की जो गल्छी होते हुए जाती थी । वास्तव में ही जब माइक्रो बस ने राजधानी को छोड़ा और गल्छी का मार्ग पकड़ा तो एक ओर त्रिशुली नदी की हरी बहती जलधारा और दूसरी ओर हरीभरी पंक्तिबद्ध छोटी–छोटी पहाडि़याँ जहाँ आँखों को शीतलता प्रदान कर रहे थे वहीं वातावरण में मनोहरता का रस भी घोल रहे थे । जब माइक्रो बस देवीघाट नामक स्थल पर पहुँचा तो शंकर लाल जी कहने लगे – ‘ कुछ देर के लिए हम यहाँ रुक जायँ और यहाँ की सुंदरता को भी नजदीक से निहार लें ।’ वास्तव में वह भी बहुत ही पावन स्थल है । एक ओर तादी और त्रिशुली की जलधारा को संगम का रूप लेते हुए देखने पर जो सुख प्राप्त होता है उसे शब्दों मे उतारना मुश्किल है । निकट की हरीभरी पहाडि़याँ इन दो नदियों के मिलन पर हर्षित हो रही सी लगती  हैं  । ऐसा लग रहा था मानों साथ ही खड़ा जालपा देवी का मंदिर इस वातावरण में पावनता का संचार कर रहा है ।
घूमते हुए इस जिले के नाम के बारे में भी बड़ी रोचक जानकारी मिली । यहाँ नौ किला अवस्थित होने के  कारण इसका मूल नाम नवक्वाथ था, जो अपभ्रंश होते होते नुवाकोट हुआ । यहाँ त्रिशुली बजार नाम का एक प्रसिद्ध बाजार है  । लगता है त्रिशुली नदी के तट पर अवस्थित होने के कारण ही इसका यह नाम पड़ा । यहाँ से कुछ ही दूरी पर अवस्थित एक टीले पर पृथ्वी नारायण शाह का प्रसिद्ध सात तल्ले दरबार (सात मंजिला प्रासाद) है जहाँ हमें पैदल पहुँचने में लगभग आधे घंटे लगे । नुवाकोट के ऊपर विजय प्राप्त करने के बाद उन्होंने इसे राजधानी का रूप देते हुए इस प्रासाद को बनवाया । इस प्रासाद की विशेषता यह है कि पृथ्वी नारायण शाह के जमाने में यह राजा का निवास तो था ही इसके अतिरिक्त इसके विभिन्न मंजिलों का उपयोग सभा भवन, पूजा कक्ष, होम आदि पुण्य कर्म और सैनिकों के निवास जैसे विभिन्न कार्यों के लिए किया जाता था । यहाँ के एक मंजिल को कालकोठरी का  रूप भी दिया गया था, जहाँ कुख्यात और भयानक अपराध में संलग्न अपराधी, डाकू आदि रखे जाते थे ।  सबसे ऊपरी मंजिल से सैनिकगण लोगों के आवागमन पर निगरानी किया करते थे । वर्तमान समय में यह इमारत पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है । इसके बारे में यह भी कहा जाता है कि पहले यह नौ मंजिला प्रासाद था, लेकिन विक्रम संवत १९९०के महाभूकंप में इसके दो मंजिल क्षतिग्रस्त हो गए । फिर भी अपनी ऊँचाई तथा पैगोडा शैली की सुंदरता के कारण यह इमारत पर्यटकों को दूर से ही आकर्षित करती है ।
यहाँ का भैरवी का मंदिर भी हिंदू धर्मावलम्बियों के लिए एक अत्यंत पावन स्थल है । वर्तमान समय में यह मंदिर यहाँ का प्रमुख आराधना स्थल है । इस प्राचीन मंदिर का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है कि यह पृथ्वी नारायण शाह के जीवन से भी सम्बन्धित है । वे नित्य ही यहाँ देवी की पूजा के लिए आते थे । कहा तो यह भी जाता है कि एक बार पृथ्वी नारायण शाह ने अपनी जन्मकुण्डली कुछ ज्योतिषियों को दिखाई । कुण्डली देखकर सबों ने उनकी आयु ५२वर्ष से अधिक नही होने की बात बताई । इससे वे चिंतित हो उठे । क्योंकि उनकी राज्य विस्तार की आंकांक्षा पूरी नही हुई थी । अतः वे पहुँचे भैरवी के मंंदिर में और बैठ गए देवी भैरवी के ध्यान में । मंदिर में अकेले ध्यान में लीन पृथ्वी नारायण शाह को आकाशवाणी हुई । देवी भैरवी ने कहा –‘जो पूर्वाद्र्ध में लिखा जा चुका है उसे मिटाया नही जा सकता है । हाँ, तुम मेरी शरण में प्राण त्याग दो, मैं तुम्हें नेपाल का सुख भोगने का अवसर दूूँगी ।’ कहते है – ५२वर्ष की आयु पूरी होने से कुछ पहले वे पास के ही देविघाट पर चले गए जहाँ तादी और त्रिशुली नदी के संगम स्थल पर समय बिताते हुए उनके प्राण पखेरु उड़ गए ।
त्रिशुली बजार से कुछ ही दूरी पर भारत सरकार द्वारा बनाई गई त्रिशुली पन बिजली परियोजना है । बाद में इसे विस्तारित करते हुए देविघाट पन बिजली परियोजना से संबद्ध किया गया । यह परियोजना नेपाल–भारत मित्रता के प्रतीक के रुप में विद्यमान है औेर लोडसेडिंग के वर्तमान वातावरण में इस क्षेत्र के घरों को आलोकित करता रहता है ।
त्रिशुली बजार, भैरवी मंदिर, सात तल्ले दरबार, त्रिशुली पन बिजली परियोजना और देवीघाट पन बिजली परियोजना के अतिरिक्त कई धार्मिक स्थलों को देखने के बाद हम लोग काठमांडू लौट आए ।
३,७५०मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित है इस जिले का सर्वोच्च स्थल रउचुली जहाँ से कई पर्वतमालाओं की सुंदरता का अवलोकन किया जा सकता है, जिनमें प्रमुख हैं गौरीशंकर हिमाल, गणेश हिमाल, लमजुंग हिमाल आदि । गौरीशंकर हिमाल की पर्वतमालाओंं को हम लोग त्रिशुली बाजार से भी देखने में सफल हुए ।
ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सम्पदाओं से परिपूर्ण बागमती अँचल के इस जिले में विभिन्न धर्म और सम्प्रदाय के लोग निवास करते हैं । आपसी स्नेह ओर भाईचारे की भावनाएँ परस्पर मेंं सामाजिक और साम्प्रदायिक सद्भाव को अक्ष्क्षुण रखने में सहायक रही है  । मकर संक्रान्ति के अवसर पर आयोजित मेले में बैलों को लड़ाने की प्रतिस्पद्र्धा यहाँ की प्राचीन परम्परा रही है । इसे देखने दूर–दूर से लोग आया करते. हैं । विभिन्न धार्मिक अवसरों पर निकाली जानेवाली रथयात्रा यहाँ की सांस्कृतिक विरासत को सम्पन्नता प्रदान करती है और लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है ।
(मैंने ऐतिहासिक महत्व प्राप्त, प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक स्थलों से भरे इस नुवाकोट जिले की यात्रा वर्तमान भूकंप से इसके क्षतिग्रस्त होने से कुछ साल पहले की थी ।)

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