यूँ ही कोई वेवफा नहीं होता:डा. पुष्पज राय ‘चमन’

प्रश्न उठता है कि क्या सीके राउत के विचार के सामने राज्य इतना निरीह और निरुत्तर हो गया है कि उसका दमन ही एक मात्र रास्ता सूझा । क्या राज्य के पास इतनी बौद्धिकता और प्रतिभा नहीं है कि उनके विचार को विचार से ही निरर्थक सावित कर सके ।


हम सभी जानते हैं कि क्या राज्य की दमनकारी नीति से गाँधी, मण्डेला, वी.पी. या रामराजा प्र. सिंह के क्रान्तिकारी विचार या अभियान समाप्त हो गये ? परिणाम सामने है । दमन जितना कठोर हुआ उक्त विचार अभियान उतनी उत्कर्षता को प्राप्त करता गया । राज्य के इस कदम से अंजाम क्या होगा हम सहज ही अनुमान कर सकते हैं ।

मै समता में श्रृंगार करु, महिमा कैसे स्वीकार करुँ
दासों के दर्जे मे रहकर, मालिक से कैसे प्यार करुँ
दासो की प्रीत खुसामद की, मालिका का प्यार रहम भर का
फिर मेरी प्यास बुझाए क्या, दुनिया का प्यार रसम भर का
मै प्यासा भृंग जनम भर का.’

गोपाल सिंह नेपाली के इस् पद की बरवस याद आ जाती है । जो समता और मानवता का पुजारी हो वह अहंकार से मंडित महिमा को कैसे स्वीकार कर सकता है । ऐसी परिस्थिति में जब महिमा को स्वीकार करने की बाध्यकारी अवस्था सृजित की जाय तो किसी विद्रोही का पैदा होना अस्वभाविक नही माना जा सकता । मालिक और दासाें के बीच सहज प्रेम असम्भव है । मालिक को जब दासों पर रहम आ जाए तो नाटकीय तौर पर प्रेम कर लिया जाता है । इसी तरह नाटकीय रूप में ही सही दासों की खुसामदी प्रीत इजहार कर दी जाती है और जो जन्माें की प्यास है वह महज रसम भर से कैसे बुझ सकती है ।
नेपाल में मधेसियों की दर्दभरी दास्ता क्या इस जन्म के प्यासा भृंग से पृथक है । वर्षों से दासता की बेडि़याें में जबरन जकड़ा गया, जल, जंगल, जमीन ही नही उनकी भाषा साहित्य, संस्कृति के साथ–साथ उनके अस्मिता और जान से भी खेलने में कोई कसर नही बरता गया जिसका इतिहास गवाह है । ऐसे सिलसिलेवार आघात से आहत हृदय में विशुद्ध राष्ट्रीयता का अंकुरण कैसे हो सकता है ? बीज का अंकुरण तभी सम्भव हो सकता है जब उपयुक्त जमीन और वातावरण के साथ समय–समय पर आवश्यकतानुसार समुचित सिंचन एवं पोषण की व्यवस्था हो । राज्य द्वारा ऐसे चट्टान पर बीज उगाने की नाकामयाब कोशिश की जा रही है । जहाँ आवश्यक सभी पूर्वाधार नदारद है । ऐसे मे सी. के. राउत जैसे व्यक्ति का अभ्युदय अस्वयंभावी है ।
दमन या बल से हम किसी को पराजित कर सकते हैं, जीत नहीं सकते । किसी व्यक्ति विशेष को बन्दी बना लेना समस्या का समाधान कदापि नहीं हो सकता, न कभी हुआ है न कभी हो सकता है । इतिहास से कम से कम इतनी शिक्षा ली ही जा सकती है । जिस राज्य, समाज या परिवार मे असहमति की कद्र नही, असहमति के प्रति बैरी भाव हो और समाधान दमन हो वह अन्ततः पतन को प्राप्त करेगा । इसमें कोई समस्या नहीं है ।
हम भलिभाँति समझ सकते हैं कि क्या व्यक्ति को कैद कर उनके विचार को कैद कर सकते हैं, क्या व्यक्ति विशेष की हत्या से उनके विचार और अभियान को समाप्त किया जा सकता है । ऐसा कदम उस विचार और अभियान को प्राण वायु संचरण कर उर्जा और सशक्तता प्रदान करेगा । हम सभी जानते हैं कि क्या राज्य की दमनकारी नीति से गाँधी, मण्डेला, वी.पी. या रामराजा प्र. सिंह के क्रान्तिकारी विचार या अभियान समाप्त हो गये ? परिणाम सामने है । दमन जितना कठोर हुआ उक्त विचार अभियान उतनी उत्कर्षता को प्राप्त करता गया । राज्य के इस कदम से अंजाम क्या होगा हम सहज ही अनुमान कर सकते हैं ।
प्रश्न उठता है कि क्या सीके राउत के विचार के सामने राज्य इतना निरीह और निरुत्तर हो गया है कि उसका दमन ही एक मात्र रास्ता सूझा । क्या राज्य के पास इतनी बौद्धिकता और प्रतिभा नहीं है कि उनके विचार को विचार से ही निरर्थक सावित कर सके । या ये तो नही ग्रैण्ड डिजाइन के तहत इन्हें नेपाल का गान्धी या मण्डेला बनाने की कवायत की जा रही हो । कारण जो भी हो इक्कसवी सदी के इस वैश्विक परिदृश्य मे जहाँ अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता को मौलिक अधिकार माना गया है राज्य के इस कदम को जायज कदापि नही ठहराया जा सकता है ।
किसी भी परिणाम के जन्म के पीछे कारण होता है । अकारण किसी परिणाम का जन्म असम्भव है । यह प्रकृति का नियम है । इस प्रकरण में भी कुछ कारण होगा, अतः अतीत का सिंहावलोकन आवश्यक है । शाहवंशीय शासको ने विभिन्न षडयन्त्रों के द्वारा मधेश को कब्जा तो कर लिया पर नागरिक को अपनाने का प्रयास नही किया । भू–खण्ड को कब्जा कर मधेशी नागरिक को अधिकार से वन्चित रखने का सम्भव सभी प्रयास किया जाने लगा । सन् १८१५ मे अंग्रेज गोरखाली सुगौली सन्धि के साथ ही मधेश उपनिवेश के रूप में गोरखाली शासकों द्वारा उपयोग होने लगा जो सिलसिला परिवर्तित रूप में ही सही अभी तक बरकरार है । और तब से ही असंगठित या संगठित रूप में विभिन्न स्वरूपो का मुक्ति आन्दोलन मधेशी समुदाय द्वारा निरन्तर जारी है । मधेश मुक्ति आन्दोलन ने अपने जन्म से अब तक के सफर से कितना कुछ खोया और क्या पाया किसी से कुछ छुपा हुआ नहीं है । मधेश मुक्ति आन्दोलन उत्कर्ष पर है, मधेशी जनता निर्णायक मूड में है पर राज्य का रवैया पूर्ववत ही दिखाई दे रहा है ।
आन्दोलन जब उत्कर्ष पर हो और जनता निर्णायक मूड में फिर भी ऐसी परिस्थिति में राज्य असम्वेदनशील हो जाये तो परिणाम कुछ भी हो सकता है और यही कारण सी के अंकुरण के परिणाम के रूप में उभरा है ।
बार बार के आन्दोलन, दमन, उत्पीड़न से मधेशी जनता तंग आ चुकी है । काफी लम्बे अरसे से किया जाने वाला आन्दोलन और उसमें इतनी शहादत एवं अन्य अपूरणीय क्षति देने के पश्चात भी समस्या का समुचित समाधान न होने के कारण मधेशी जनता राज्य के प्रति आक्रोशित है, मधेशी मोर्चा के अपरिपक्व राजनीति एवं घोषित निर्णायक आन्दोलन के परिणामविहीन अनिर्णय के बन्दी बनाने के कारण मधेशी मोर्चा से असन्तुष्ट है, निराश हो चुकी है । ऐसे में पृथक धार की राजनीति से जुड़ने की प्रवल सम्भावना बनती है । ऐसे विषम परिस्थिति की नजाकत को समय में समझ कर उचित समाधान की ओर ध्यान केन्द्रित करना ही एकमात्र विकल्प हो सकता है ।
सी.के. राउत पर दमनकारी नीति समाधान का उपाय कदापि नहीं हो सकता । मधेशी मोर्चा के वर्तमान मुद्दा एवं मांगो को सम्बोधन करने से भी सी.के. राउत के विचार एवं अभियान को लम्बे समय के लिए निस्तेज किया जा सकता है । मेरे हिसाब से राज्य के पास यह सर्वोत्तम उपाय है । अधिकांश मधेशी जनता भी तत्काल यही चाहती है । मधेशी जनता राज्य से जो अपनत्व और पैतृक अधिकार माँग रही है । उसे निःर्शत दे दिया जाय । यही वर्तमान राजनीतिक संकट का समाधान और समृद्ध राष्ट्र निर्माण का आधार है ।

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