यूएमएल द्वारा बेतुकी प्रतिरोध नहीं होनी चाहिए : रामनारायण देव

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रामनारायण देव (एडवोकेट, लेखक तथा राजनीतिक विश्लेषक), राजबिराज , २२ दिसिम्बर | सरकार द्वारा पंजीकृत संशोधन विधेयक एक सराहनीय कार्य है । विशेषकर मधेश की समस्याओं को सुलझाने के लिए यह एक ठोस पहल है । लेकिन जिस प्रकार से संविधान संशोधन होकर पंजीकृत होना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ है । इसीलिए यह अपूर्ण है । जैसे, संशोधन प्रस्ताव में पूर्वी मधेश के झापा, मोरंग और सुनसरी तथा पश्चिमी मधेश के कैलाली और कंचनपुर जिले को पहाड़ी जिलों में मिलाया गया है, जो आपत्तिजनक है । यद्यपि ये सभी जिले मधेश के ही भूभाग में अवस्थित हैं ।

फिलहाल, संशोधन विधेयक को लेकर यूएमएल व अन्य दलों के द्वारा प्रतिरोध हो रहा है । मेरा मानना है कि ऐसी बेतुकी प्रतिरोध नहीं होना चाहिए । उन्हें समझना चाहिए कि मधेश की मांगों को लेकर ही विगत में आंदोलन हुआ था । छह दर्जन से अधिक मधेशी सपूत शहीद हुए, हजारों घायल भी हुए । उसी का प्रतिफल है यह संशोधन विधेयक ।

जमीनी सच्चाई यह है कि यूएमएल में सदियों से तराई–मधेश के प्रति कूंठा की भावना रही है । और समय–समय पर यह कूंठा प्रकट करती आ रही है । जैसे, मधेश में समानुपातिक समावेशी, जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधियों का चयन आदि सकारात्मक पक्ष होते हुए भी इन पक्षों में यूएमएल अपनी असंतुष्टि व्यक्त कर रही है । उन्हें संस्मरण करना चाहिए कि पिछली बार हुई संविधान सभा के चुनाव में मधेश की जनता ने उन्हें भारी मतों से जिताया था । दूसरी बड़ी पार्टी के रूप में पहचान भी दिलाई । इसी प्रकार यूएमएल के नेतागण भारत को गिद्ध दृष्टि से देखते हैं । पंजीकृत विधेयक में सीधा आक्षेप लगाया है कि यह भारत के इशारों में आया हुआ है, जबकि वैसा नहीं है । उन्हें यह समझना चाहिए कि नेपाल और भारत का अलग–अलग मामला हैं । उन्हें यह भी भूलना नहीं चाहिए कि भारत सदैव नेपाल के हित में है, और रहेगा । इसीलिए उन्हें भारत पर मिथ्या दोषारोपन नहीं लगाना चाहिए । भलाई इसी में है कि वे पंजीकृत विधेयक को पारित करें । अगर विधेयक को पारित करवाने से वे पीछे हटते हैं, तो संविधान कार्यान्वयन में ही नहीं, नेपाली राष्ट्रीयता पर भी बुरा प्रभाव पडेगा । इससे भी अधिक आगामी चुनाव उनके लिए महंगा सिद्ध होगा ।

अब जहां तक सवाल है चुनाव करवाने का तो, मेरा मानना है कि संघीय संरचना का निर्माण के पश्चात ही चुनाव करवाना श्रेयस्कर होगा । क्योंकि स्थानीय चुनाव प्रदेश सभा द्वारा होना चाहिए । अगर ऐसा नहीं हुआ तो संघीय व्यवस्था कमजोर हो जाएगी । संविधान का मुख्य मकसद पूर्ण नहीं हो पाएगा और संविधान भी सदैव आलोचित बना रहेगा ।

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