ये राह नहीं आसान:-

पंकज दास

माओवादी भीतर के आन्तरिक कलह ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सि तो पहुंचा दिया लेकिन प्रधानमंत्री बनने के दिन से ही उनके सामने चुनौतियों का पहाड ही है जिसका मुकाबला उन्हें ही करना पडेगा। अपने ही  प्रचण्ड की प्रधानमंत्री बनने की अतिमहत्वाकांक्षा के बावजूद पिछले एक वर्षों से जिस तरह की रणनीति पर भट्टर्राई चल रहे थे उन्हें उनका लक्ष्य साफ मालूम था। लेकिन भट्टर्राई हमेशा चाहते थे कि वो बहुमतीय नहीं बल्कि सहमतीय सरकार के प्रधानमंत्री बने। लेकिन परिस्थिति ने ऐसा मोड लिया कि भट्टर्राई को बहुमतीय सरकार का प्रधानमंत्री बनना पडा।
नेपाली मीडिया ने भट्टर्राई की छवि कुछ इस तरह से पेश की है कि वो इस देश के सबसे लोकप्रिय नेता बन गये हैं। जितनी बार र्सवेक्षण हुआ उतनी ही बार भट्टर्राई को ही प्रधानमंत्री बनना चाहिए ऐसा विचार व्यक्त करने वालों का प्रतिशत हमेशा ८० से ऊपर ही रहा। नेताओं के प्रति लोगों का विश्वास इस कदर कम हो गया है कि देश में शान्ति प्रक्रिया होगी और संविधान का निर्माण होगा इस बात पर लोगों का विश्वास ही उठते जा रहा है। ऐसे में डाँ भट्टर्राई के सामने लोगों का विश्वास बनाए रखना सबसे बडी चुनौती होगी।
भट्टर्राई को उनकी पार्टर्ीीाओवादी ने ऐसे समय प्रधानमंत्री का उम्मीद्वार बनाया था जब माओवादी के भीतर अर्न्तर्कलह अपने चरम पर था। पार्टर्ीीध्यक्ष के खिलाफ तीनों उपाध्यक्ष और महामंत्री की घेराबन्दी के बाद मजबूरन प्रचण्ड कुछ समय के लिए अपना महत्वाकांक्षा त्याग कर भट्टर्राई को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राजी हुए हुए थे। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि प्रचण्ड ने अपना अध्यक्ष पद और संसदीय दल के नेता का पद बचाने के लिए पार्टर्ीीें अपने विरोधी खेमा के आगे घुटने टेक दिया था। ऐसे समय भट्टर्राई को प्रधानमंत्री रहते प्रचण्ड से कितना असहयोग मिलेगा इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
लोग और कार्यकर्ता हमेशा ही सत्ता और शक्ति के पीछे ही भागते हैं। प्रचण्ड जब तक अध्यक्ष थे या उससे पहले प्रधानमंत्री थे तब तक कार्यकर्ता उनके पीछे लगे रहते थे। जैसे ही अब भट्टर्राई प्रधानमंत्री बने हैं ऐसे में आम जनता और माओवादी कार्यकर्ता का उनके पीछे जाना स्वाभाविक है। अब प्रचण्ड यह बात कितना सहृय कर पाएंगे कि पार्टर्ीीा लगाम उनके हाथों से खिसकता जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का यह अनुमान है कि भट्टर्राई को सबसे बडी चुनौती अपनी पार्टर्ीीे विरोधी गुट से मिलने वाली है। प्रचण्ड यह कभी नहीं चाहेंगे कि भट्टर्राई के कार्यकाल में शान्ति प्रक्रिया या फिर संविधान का काम संपन्न हो यदि ऐसा हुआ तो इसका सारा श्रेय भट्टर्राई ही ले जाएंगे। पार्टर्ीीे सहयोग की अपेक्षा शायद भट्टर्राई को नहीं ही करनी चाहिए। लेकिन मजबूरी यह है कि माओवादी सबसे बडी पार्टर्ीीै और उसके सहयोग के बिना ना तो शान्ति प्रक्रिया और ना ही संविधान निर्माण का काम ही पूरा हो सकता है।
अभी दूसरा मुश्किल मंत्रिमंडल चयन को लेकर भी होगा। जिस तरह से खनाल सरकार के समय भट्टर्राई और बांकी नेताओं ने प्रचण्ड के द्वारा चुने गए मंत्रियों को सरकार से वापस बुलाने पर मजबूर कर दिया था आखिर वह टीस भी प्रचण्ड के मन में अभी तक है जो कि अब बाहर निकलेगी। इस बार मंत्रिमंडल बंटवारे के दौरान सहयोगी दल मधेशी मोर्चा को ११ महत्वपर्ूण्ा मंत्रालय दिये जाने की वजह से माओवादी के भीतर भट्टर्राई का विरोध होना शुरू हो गया है। इस बार भट्टर्राई को अपने पक्षधर नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल करवाने में काफी कठिनाई होगी। क्योंकि प्रचण्ड अपने ज्यादा से ज्यादा र्समर्थकों को मंत्रिमंडल में भेजने की कोशिश में हैं। उधर पार्टर्ीीें जिनके र्समर्थन से भट्टर्राई प्रधानमंत्री बने हैं मोहन वैद्य किरण उनको भी खुश रखना भट्टर्राई के लिए किसी मुश्किल से कम नहीं होगा। प्रचण्ड और वैद्य को खुश करने की चक्कर में यह तो तय है कि अब तक हर परिस्थिति में भट्टर्राई का खुल कर साथ देने वाले नेताओं को उन्हें दरकिनार करना होगा। ऐसे में भट्टर्राई से उनकी दूरी और नाराजगी दोनों ही झेलनी होगी।
डाँ भट्टर्राई को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पार्टर्ीीे उपाध्यक्ष मोहन वैद्य किरन ने भी अहम भूमिका निभाई है। वैद्य के र्समर्थन के बिना भट्टर्राई का प्रधानमंत्री बन पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। अब जबकि भट्टर्राई प्रधानमंत्री बन गए हैं तो जाहिर सी बात है कि मोहन वैद्य की बात मानना उनके लिए मजबूरी होगी। और उनकी नीति को लागू करना जरूरी। वैद्य माओवादी में हार्डलाईनर मने जाते हैं। उनकी नीति किसी भी और दल को नहीं भा सकती है। वैद्य की नीति को लागू करने के लिए भट्टर्राई को सबसे पहले गठबन्धन दलों से ही विरोध का समाना करना पड सकता है। और बाद में विपक्षी दलों की नाराजगी भी झेलनी पड सकती है। अंतराष्ट्रीय जगत भी मोहन वैद्य के हार्डलाईन को पसन्द नहीं करता है जबकि भट्टर्राई की छवि उनसे अलग है। अपनी छवि को बचाए रखना और वैद्य की नीतियों के बीच संतुलन बनाए रखना उनके लिए काफी मुश्किल हो सकता है।
अपनी पार्टर्ीीे अलावा भट्टर्राई को उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में निर्ण्र्ााक भूमिका निभाने वाले मधेशी मोर्चा की उचित अनुचित मांगों को मानना होगा। ऐसे में भट्टर्राई की जो छवि है वह धूमिल पड सकती है। भट्टर्राई सरकार का सारा दरोमदार मधेशी मोर्चा पर ही टिका है। और मोर्चा को हमेशा खुश बनाए रखना भी भट्टर्राई के लिए एक बडी चुनौती होगी। मोर्चा के पास गृह, रक्षा, संचार जैसे महत्वपर्ूण्ा मंत्रालय है जो कि सरकार की दशा और दिशा दोनों ही तय करती है। भट्टर्राई जिस तरह से खुद कुछ अलग और उदाहरणीय बनाना चाहते हैं ऐसे ही उनके मंत्रिमंडल में सहयोगी दल के मंत्री कितना बना पाएंगे। यह देखना अभी बांकी है। किसी भी मंत्री या मंत्रालय द्वारा किए गए कामों को सीधे भट्टर्राई से जोडकर देखा जाएगा। और इससे उनकी छवि पर भी असर पडने वाला है।
इस देश की दो बडी पार्टियां नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले विपक्ष में है और भट्टर्राई के लिए विपक्ष को साथ में लेकर चलना किसी बडी मुश्किल से कम नहीं है। बात शान्ति प्रक्रिया की हो या फिर संविधान निर्माण की हर बार भट्टर्राई को विपक्ष का सहयोग आवश्यक ही होगा। कांग्रेस के उम्मीद्वार को हराकर और एमाले की सरकार को हटाकर प्रधानमंत्री बने भट्टर्राई के लिए इन दोनों पार्टियों को मिलाकर ले जाना एक बडी चुनौती होगी। सत्ता गठबन्धन के दौरान माओवादी और मधेशी मोर्चा के बीच जो सात हजार लडाकुओं के समायोजन की बात हर्ुइ है उसे पूरा करना काफी कठिन है। कांग्रेस और एमाले हमेशा से इसका विरोध करती आ रही है और आगे भी करती रहेगी। इसके अलवा इस समझौते में आम माफी दिए जाने की बात है जिसपर तो विरोध भी शुरू हो गया है। मधेशी मोर्चा ने भी ५ हजार मधेशी दलित जनजाति और पिछडा तथा अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं को नेपाली सेना में सामूहिक प्रवेश की बात कही है उसका भी कांग्रेस और एमाले द्वारा व्यापक विरोध होने वाला है।
भट्टर्राई की आम जनता में छवि एक अच्छे, इमान्दार, कुशल प्रशासक और देश के हित में ही काम करने वाले नेता के रूप हैं। नेपाली जनता को भी उनसे काफी अपेक्षा है। भट्टर्राई के आते ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। शान्ति प्रक्रिया पूरी हो जाएगी संविधान निर्माण हो जाएगा। देश में हर तरफ खुशहाली होगी। अमन चैन से लोग जी पाएंगे। इस तरह की अपेक्षा लोग पाले हैं। अब भट्टर्राई के पास कोई जादू की छडी तो है नहीं कि आते ही सबकुछ ठीक कर देंगे। ऊपर से आम नेपाली जनता खासकर मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय जनता तो यही चाहती है कि इस देश में बन्द हडताल खत्म हो, उन्हें सुरक्षा का अहसास हो, रोजमर्रा की जिंदगी में झेलने वाली कठिनाईयों से छुटकरा मिले, सरकारी तंत्र में घुसखोरी बन्द हो कम से कम दो वक्त की रोटी मिले और चैन की जिंदगी बसर हो एक अच्छे और सच्चे प्रधानमंत्री से आम जनता इतनी तो अपेक्षा कर ही सकती है।
अंतराष्ट्रीय जगत में भी भट्टर्राई की अपनी एक अलग छवि है। उस छवि को बरकरार रखना और उनका दिल जीतना भी भट्टर्राई के लिए आसान नहीं होगा। यदि पार्टर्ीीी उन नीतियों को अपनाते हैं जिनका कि पूरी दुनियां विरोध करती है तो ऐसे में भट्टर्राई की छवि धूमिल हो सकती है। और नहीं करते हैं तो उनके ही पार्टर्ीीाले उनसे नाराज हो सकते हैं। अपने पडोसी देशों से मधुर और संतुलित संबंध बनाए रखना भी भट्टर्राई के लिए मुश्किल है। भट्टर्राई पर भारत के प्रति नरम होने का आरोप है जिस कारण चीन उन्हें कितना सहयोग करेगा और किस तरह का रवैया अपनाएगा इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भट्टर्राई के प्रधानमंत्री बनने पर जहां भारतीय प्रधानमंत्री डाँ मनमोहन सिंह ने उन्हें फोन कर बधाई दी वहीं चिनियां राजदूत ने अपनी सरकार के तरफ से भट्टर्राई को बधाई देने के बजाए माओवादी पार्टर्ीीे विदेश विभाग प्रमुख कृष्ण बहादुर महरा के जरिये एक पत्र भेजकर महज औपचारिकता पूरी कर दी। दूसरी तरफ अमेरिका ने अभी तक माओवादी को आतंकवादी की सूची से बाहर नहीं किया है। ऐसे में भट्टर्राई यह जरूर चाहेंगे कि माओवादी पर लगा यह कलंक उनके कार्यकाल में धुल जाए।
इन सब उदाहरण का लब्बोलुवाब यह है कि भट्टर्राई के सामने चुनैतियों का पहाड है। उनके हर कदम और हर फैसले पर देश की आम जनता से लेकर अंतराष्ट्रीय जगत की भी नजर है। अब यह भट्टर्राई के ऊपर निर्भर करता है कि वो लोगों की अपेक्षा पर किस तरह से खडे उतरते हैं। उनके पहले मंत्रित्व काल में जो उनकी एक अच्छी छवि बनी है और लोगों को लगता है कि भट्टर्राई में कुछ कर दिखाने का माद्दा है तो उनकी अग्नि परीक्षा शुरू हो गई है। अब देखना यह है कि अपने अग्नि परीक्षा को भट्टर्राई किस कदर पार करते हैं

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