ये है, राजधानी ..

गंगेश मिश्र

ktm
यहाँ आम, जाम है,
जाम, आम है।
दिखता हर-पल;
सुबह-शाम है।
रुक-रुक कर,
चलती है गाड़ी,
दिल थामे,
चलते हैं लोग,
साँस भी लेना,
दूभर है पर;
मज़बूरी में,
सहते लोग।
धक्का-मुक्की,
बस के अन्दर,
सीट मिला,
वो बना सिकन्दर।
सर के ऊपर,
बैग धरा है;
उसका है जो,
बस में खड़ा है।
धूल उड़े,
धूँवें से मिलकर,
साँसों को,
अवरुद्ध करे,
सड़क हो रही,
चौड़ी अब तो,
अच्छे की;
उम्मीद करें।
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