योगः विद्वद्वर्ग के लिए अपरिहार्य है : डॉ. सुबोध शुक्ला

डॉ. सुबोध शुक्ला …
हमारे पूर्वीयदर्शन का उद्गम स्थल, विचारस्रोत,आस्था एवं श्रद्घा का केन्द्र साक्षात्कृतधर्म मन्त्रद्रष्टाऋषियों द्वारा प्रतिपादित वेद है ,वेदव्यास द्वारा विभाजित कर चार ऋक्, यजु, साम, अथर्व वेद के रूप में प्रसिद्ध हैं । इनमें ऋग्वेद संहिता का स्पष्ट निर्देशन है कि योग विद्वान् के लिए अपरिहार्य है –
“यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन ।
स धीनां योगमिन्वति ।।” ऋग्वेद १÷१८÷७
अर्थात् योगके विना विद्वान् का कोई यज्ञकर्म सिद्घ नहीं होता हैं । वह योग क्या है ? वह योग चित्तवृत्तियों का निरोध है । १ योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः वह कर्तव्य कर्ममात्र में व्याप्त है । कर्मयज्ञ, उपासना, ज्ञानयज्ञ, इन तीनों को कर्मकाण्ड, ज्ञानकाण्ड एवं उपासना काण्ड के नाम से भी जाना जाता है । वे तीनों प्रकार के यज्ञकर्म योग के विना निष्पन्न नहीं हो सकते हैं ।
अज्ञानी की तो बात ही क्या, ज्ञानी भी योग की सहायता के विना कर्म,उपासना एवं ज्ञानयज्ञ सिद्घ करने में असमर्थ है । क्योंकि चित्तवृत्तिनिरोधरूपी योग या एकाग्रता से समस्त कर्तव्य व्याप्त है । अर्थात् सब कर्मों की निष्पत्ति का एकमात्र उपाय चित्तसमाधि (कैवल्यप्राप्ति) या योग ही है ।
“न तु योगमृते प्राप्तुं शक्या सा परमा शान्तिः ।”
वह योग विविध नामों से हमारे द्वारा उच्चरित किया जाता है । जैसे– ज्ञानयोग, कर्मयोग, मन्त्रयोग, हठयोग, राजयोग ,लययोग, नादयोग, कुष्ठलिनीयोग, भक्तियोग तन्त्रयोग आदि ।
“नास्ति योगात् परं बलम् नास्ति ज्ञानात् परो बन्धुः ।”
२. वैसे विद्वान् जिन्होंने जीव की पूर्ववर्ती सांसारिक दशा (अवस्था) और अन्तिम दशा को शास्त्रों के माध्यम से ज्ञान कर लिया है अर्थात जान चुके हैं उन सभी विद्वानों को योगाभ्यास अपरिहार्य है ।
जो भी जीव जन्मलेता है, वह मृत्यु को अवश्य प्राप्त होता है और जन्म लेगा वह मरेगा,वह जन्म भी अवश्य लेगा । परन्तु इस नियम में एक अपवाद है कि जो विवेकज्ञान विवेकख्याति प्राप्त कर लेता है और तृष्णाएँ जिसकी क्षीण हो गई हैं वह जीवात्मा मरकर फिर से जन्म न लेकर मोक्षानन्द को प्राप्त कर लेता है और यह सबकुछ योग से ही संभव होता है “नान्यः पन्था विद्यते ऽयनाय”
“न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्”
योग का फल बताते हुए–योगरूप अग्निवाले शरीरको न बीमारी होती है, न बुढापा और मृत्यु होती है । सिद्घान्त के समर्थन में परंपूज्य अचार्यचूणामणिआदिशङ्कराचार्य भी कहते है–शास्त्रज्ञोऽपि स्वातन्त्ररूपेण ब्रह्म ज्ञानान्वेषणं न कुर्यात् ।।
शास्त्रज्ञ अनेक शास्त्रों को जाननेवाला विद्वान् स्वतन्त्र रूपसे ब्रह्मज्ञान –योग विज्ञान का अन्वेषण अनुसन्धान न करें । अर्थात् विद्वान् को यह कर्तव्य है कि—गुरू के पास जाकर उसके देख–रेख में योगाभ्यास करना चाहिए ।
“युञ्जते मनऽउतयुञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य वृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेकऽइन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ।।”
परब्रहम की प्राप्ति का सच्चा उपाय एक ही है और वह है योग—जो भी मेधावी विद्वान् लोग महान् गुणोंं को प्राप्त कर सकल विद्याओं से युक्त आप्त विद्वान्,सर्व शास्त्रों को ज्ञानने वाले मेधावी विद्वानों से योगविद्या प्राप्त करके समस्तजगत् के देव सविता जगदीश्वर की महती स्तुति एवं उपासना करता है तथा अपने मन (चत्त) को समाधि में समाधिस्थ करता है । वही परब्रहम की प्राप्ति करता है । परमात्मा की सबसे बड़ी स्तुति यह है कि मनुष्य विद्वान् उसके स्वरूप को जानकर अपने मन और प्राणों को परमात्मा में ही लगाये । अर्थात् अपने को “ब्रहमविद् ब्रहमैव भवति” अहं ब्रहमास्मि की अनुभूति कर ले ।
“यथा नद्यः स्यन्दमानः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरूषमुपैति दिव्यम् ।।”
जैसे नदियां अपने प्रवाहित होती हुई नाम और रूप को खोकर समुद्रमें अस्त हो जाती हैं मिल जाती है वैसे ही विद्वान् योगाभ्यास से अपने नामस्वरूप से विमुक्त होकर उस परात्पर दिव्य पुरुष (परब्रहम) में मिलजाता है । मोक्षप्राप्त्यर्थ ज्ञान और योग दोनों ही अति आवश्यक हैं । योगहीनं कथं ज्ञानं मोक्षदं भवति ध्रुवम् ।
योगोऽपि ज्ञानहीनस्तु न क्षमो मोक्षकर्मणि ।। अर्थात् योग के विना ज्ञान ध्रुव मोक्ष का देनेवाला भला कैसे हो सकता है ? कहने का तात्पर्य योग अत्यावश्यक है । उसी प्रकार ज्ञानहीन योग भी मोक्षकर्म में असमर्थ है ।
“त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य ।
ब्रहमोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ।”
“प्रणान् प्रपीड्येह स युक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत ।
दुष्टाश्व युक्तमिव वाहमेनं विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्तः ।।”
अर्थात शरीर को त्रिरुन्नत अर्थात छाती, गर्दन और शिर उन्नत और सम करके मन सहित इन्द्रियों को हृदयमें नियत कर ब्रह्मरूपी नौका अर्थात् योगभ्यास से विद्वान् सभी भयानक प्रवाहों को तर जाय । यहां भयानक प्रवाह का तात्पर्य सांसारिक दुःखों से है । इस प्रकार योगाभ्यास के द्वारा सभी डरावनी दुःखों से पार कर जाय विद्वान् ।
इस शरीरमें प्राणों को अच्छी तरह विलीन करके युक्तचेष्ट हो जाय और प्राण के क्षीण होने पर नासिका द्वारों से श्वासको छोडेÞ (रेचन करें ) और इन दुष्ट घोडों के लगाम मन को विद्वान् अप्रमत्त होकर धारण करे ।
योगेन योगो योक्तव्यो..।
आत्मज्ञान जिन साधनों द्वारा प्राप्त होता है वे साधन यद्यपि भिन्न–भिन्न स्थानों में भिन्न–भिन्न रूप से मानना समुचित है क्योंकि यही समस्त वेदादि शास्त्रसम्मत है ।
“आत्मज्ञानेन मुक्तिः स्यात् तच्च योगादृते न हि”
आत्मज्ञानसे मुक्ति होती है यह सर्वथा सत्य है और वह आत्मज्ञान योगाभ्य (योग) के विना दुर्लभ है ।
“योगाग्निर्दहति क्षिप्रमशेषं पापपञ्जरम् ।
प्रसन्नं जायते ज्ञानं ज्ञानान्निर्वाणमृच्छति ।।”
योगरूप अग्नि शीघ ्रही निखिल पापपञ्जरपुञ्जको दग्ध अर्थात जलाकर भस्म कर देता है । और उस पापपुञ्ज के दग्ध होने से प्रतिबन्धरहितज्ञान प्राप्त होता है । और ज्ञान से ही निर्वाणसंज्ञक मोक्ष प्राप्त होता है ।
यौगिक साधना आर्यसभ्यता की मौलिक विभूति है । अज्ञातकाल से आर्यसभ्यता की अनोखी अनुपम और अद्वितीय यदि कोई महाविभूति है तो वह है यौगिकसाधना ।
योगसाधना के विना वेद की गम्भीर गुत्थियां खुल नहीं सकती है,वैदिक सिद्घान्तों का मर्म निखर नहीं सकता है । विशुद्घ वैदिक वातावरण भी योग के अभाव में बनना असम्भव सा ही है । आदिकाल (अज्ञातकाल) से सत्यसनातन वैदिकधर्म के उपासक प्रचारक यौगिक साधना से सम्पन्न व्यक्तित्व जैसे महर्षि दयानन्द,विवेकानन्द आदि योगी हुए हैं ।
दर्शनसूत्रों के प्रणेता लेखक समस्त ऋषि मुनि महानुभाव योगमार्ग के प्रवीण पान्थ हुए है ।
योगेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते ।
योग से धर्म और विद्या दोनों की रक्षा होती है ? शिव पार्वती को इसकी अपरिहार्यता बताते हुए—
कि देवताओं को भी विना योग के परं पद प्राप्त नहीं होता ।
“ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा धर्मज्ञोऽपि जितेन्द्रियः ।
विना योगेन देवोऽपि न मोक्षं लभते प्रिये ।।”
कोई मनुष्य चाहे जितना भी विद्वान् ज्ञानि, विरक्त,धर्मिष्ठ, जितेन्द्रिय, ल्ब्क्ब् का वैज्ञानिक ही क्यों न हो, आधुनिक वर्तमान में भी पाश्चात्य दार्शनिक न्यूटन,प्लेटो,अरस्तु दार्शनिक विद्वान् क्यों न हो किन्तु वह विना योग के मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकता है ।
उत्थान में और अनुत्थान में भी अप्रमत्त और जितेन्द्रिय होकर यत्नशील साधक इस समाधिषट्क का अभ्यास करें । मायाजनित आवरण और विक्षेप सर्वथा जब तक नष्ट नहीं होते तब तक इस समाधि का निरन्तर अभ्यास (योग) करते रहना चाहिये ।
“न प्रमादोऽत्र कर्तव्यो विदुषा मोक्षमिच्छता ।”
अर्थात् मोक्षकी इच्छा करनेवाला विद्वान् इस अभ्यास (योगाभ्यास) में कदापि प्रमाद (गलती,आलस्य) न होने दे । “तथा योगं समासाध्य तत्वज्ञानं च लभ्यते ” योग की साधना से ही तत्वज्ञान की उपलब्धि होती है । ऋषिमुनियों ने तप योग के द्वारा ही वैदिकमन्त्रों के द्रष्टा के रूप में प्रतिष्ठित हुए । योगसिद्घयर्थ प्रार्थना भी वेदोमन्त्रों में परिपूर्ण है ।
योगक्षेमो नो कल्पताम् यजुर्वेद
योगे योगे तवस्तरं वाजे वाजे हवामहे ।
सखाय इन्द्रमूतये ।।
ऋग्वेद—१।३०।७।शुक्लयुजु—१।१४ सामवेद उत्तरार्चिक १।२।११।१ पूर्वार्चिक—२।२।७।१। अथर्ववेद—।१।२४।७ एवं २०।२७।१
स घा नो योग अभुवत् स राये स पुरं ध्याम् ।
गमद् वाजेभिरा स नः । ऋग्वेद—१।५।३
सामवेद—उत्तरार्चिक—१।२।१०।३ अथर्व—२०।६९।१ धौतिर्बस्तिस्तथा नेति..।
षट् कर्माणि समाचरेत् । केवल शास्त्रावलोकन से नहीं तिष्ठेत् सिद्घासने तदा ।
क्व त्रीचव्रmा त्रिवृतो रथस्य क्व त्रयो बन्धुरो ये सनीष्ठाः । कदा योगो वाजिनो रास्भस्य येन यज्ञं नासत्योपयाथः ।।
निष्कर्ष के तौर पर इन उपरोक्त तर्क एवं साक्ष्य प्रमाणों से यह स्पष्टरूप से लिखा जा सकता है कि योग अनन्यसाधना के रूप में लिया गया है । महर्षि व्यास के वचनों में योग को साधन और साध्य दोनों रूपों में स्वीकार किया गया है । विद्वानों को भी योग अपरिहार्य है तथा एक योगी विद्वान् योगाभ्यास के द्वारा ही विद्या की रक्षा करता है । योगेश्वर श्री कृष्ण ने ज्ञानियों, तपस्वियों आदि से योगियों को सर्वोपरि बताया है और धनुर्धारी पार्थ अर्जुन को योगी होने के लिए प्रबल समर्थन किया है । और आदेश भी दिया कि—“तस्मद्योगी भवार्जुन”अर्थात योगी बनो ।
कविकुलगुरु कविताविलास कालिदास ने—शैशवावस्था में विद्या का अभ्यास यौवनावस्था में विषयों का सेवन और वार्धक्यावस्था में ऋषिमुनियों की वृत्तियों का अनुसरण कर तथा अन्तिमावस्था में योगाभ्यास के द्वारा इस नश्वर तन अर्थात् अनित्य भौतिक शरीर का त्याग कर देना है । यही मानवसंनातनसंस्कृति का सिद्घान्त बताया है ।
“न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्”
“ तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय” हमें यह विरासत में प्राप्त योगमार्ग से परं गन्तव्य पर पहँुचना है । योगाभ्यास करते हुए योग में ही चिरकाल तक रमण करना है । इति अलं विस्तरेण ।

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