योगः स्वस्थ जीवन का अमोघ मन्त्र : कुमार सच्चिदानन्द

कुमार सच्चिदानन्द

कुमार सच्चिदानन्द

समृद्ध ज्ञान एवं चिन्तन के कारण पौर्वात्य वाङ्मय विश्व में अपनी स्वतंत्र पहचान रखता है और कुछ ऐसी इसकी विशेषताएँ हैं जो विश्व को मागदर्शन की क्षमता भी रखती हैं । ‘सत्य और अहिंसा’ का पाठ जग को सिखलाने का श्रेय भी इसी चिन्तन परम्परा को है और समस्त विश्व को योग के माध्यम द्वारा ‘अहं’ से ‘वयं’, ‘व्यष्टि’ से ‘समष्टि’ तथा ‘आत्म’ को ‘परमात्म’ तत्व से जोड़ने का माध्यम भी यह है । यह सच है कि सदियों से यह ज्ञान ऋषि–मुनियों, साधु–सन्तों और आध्यात्मिक चेतना के संवाहकों द्वारा विभिन्न रूपों में भारतीय उपमहाद्वीप में सुरक्षित था । आधुनिकता और इसके अनुसंधानों की चमक–दमक में आमलोग इसे गम्भीरता से नहीं ले रहे थे । लेकिन विगत दशक में कुछ साधु–सन्तों ने इसे लोक से जोड़ने का प्रयास प्रारम्भ किया और लाखों लोग इससे जुड़ते चले गए तथा इसके महत्व को भी समझा । योग के द्वारा अध्यात्म की साधना के साथ–साथ सम्पूर्ण आरोग्य की चेतना का प्रवाह भी इन्होंने किया । लेकिन इसे विश्व–पटल पर स्थापित करने का काम शेष था । कहा जाता है कि राजनीति कीFor Kumar Sachhidanad yog birganj 2 For Kumar Sachhidanad yoga ktm 1 For Kumar Sachhidanad yoga ktm 3 सुदृष्टि के माध्यम से अवगुण्ठित ज्ञान और संस्कृति के तत्वों को भी व्यापक फलक दिया जा सकता है । यही काम भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने किया । विगत वर्ष के दिसम्बर में संयुक्तराष्ट्र महासभा में ‘अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस’ मनाने का प्रस्ताव रखा जिसे १७७÷१८० मतों से इस महासभा ने अनुमोदित किया और २१ जून २०१५ को प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस मनाने का निर्णय लिया गया । इसी के परिणामस्वरूप इस दिन १९२ देशों के २५१ से अधिक शहरों में योग के कार्यक्रम हुए और एक तरह से सम्पूर्ण विश्व ने इस पौर्वात्य मनीषा के प्रति सम्मान व्यक्त किया ।
संस्कृत में ‘युज्’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय के योग से ‘योग’ शब्द की व्युत्पत्ति मानी जाती है जिसका अर्थ ‘जुड़ना’ होता है । लेकिन इस शब्द का प्रयोग कई अर्थों में होता है । ‘योग’ का सामान्य अर्थ ‘सम्बन्ध’ है । दर्शन के क्षेत्र में ‘योग’ जीवात्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को कहते हैं । इस सम्बन्ध को प्राप्त करने के उपाय को भी योग कहा जाता है । इस अर्थ में योग मार्ग या प्रणाली का पर्याय है, जैसे भक्तियोग या भक्तिमार्ग, ज्ञानयोग या ज्ञानमार्ग, कर्मयोग या कर्ममार्ग । लेकिन आज योग चित्तवृत्ति के निरोध के अर्थ में भी रूढ़ हो गया है । पतंजलि ने सर्वप्रथम योगसूत्र की रचना की जिसमें इन्होंने योग को पारिभाषित किया ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ।’ पतंजलि के योग को राजयोग भी कहा जाता है । राजयोग से भिन्न ‘हठयोग’ है जिसका मूल तन्त्र ग्रन्थों में है । योग के ये दो रूप अधिक प्रचलित हैं । इसकी अन्य अनेक प्रणलियाँ भी हैं ।
कुछ लोग योग को वेदमूलक मानते हैं, कुछ इसे जैनागमों से निकला हुआ स्वीकार करते हैं, कुछ ने बौद्ध–दर्शन से इसका सम्बन्ध जोड़ा है और कुछ ने इसकी स्वतंत्र परम्परा प्राचीनकाल से ही मान रखी है । प्रायः यह माना जाता है कि उक्त चारों परम्पराओं में चार प्रकार के योग हैं । राजयोग को वैदिक माना जाता है तो हठयोग को किसी स्वतंत्र परम्परा का निदर्शन, जिसे हम तन्त्रशास्त्र कहते हैं । जैनों और बौद्धों के योग को इन योगों से भिन्न माना जाता है । राजयोग और हठयोग, दोनों के स्वतन्त्र प्रवाह आद्योपान्त मिलते हैं, कभी–कभी कुछ साधनों में दोनों का मेल भी होता है । जहाँ दोनों का समन्वय होता है वहाँ यह माना जाता है कि हठयोग प्रथम सोपान या साधन है तो राजयोग द्वितीय सोपान अर्थात् साध्य । हठयोग का सम्बन्ध अधिकतर शरीर–विकास या कायाकल्प से है और राजयोग का सम्बन्ध मुक्ति या मोक्ष से । हिन्दी के सन्तों ने राजयोग से प्राप्त समाधि को सहज समाधि और हठयोग से प्राप्त समाधि को हठ–समाधि कहा है । गोरखपंथी योगियों को हठयोगी समझा जाता है जबकि निर्गुण सन्तों और अद्वैतवादियों को राजयोगी ।
महर्षि पतंजलि को आदियोग गुरु माना जाता है । उन्होंने अष्टांगयोग का पथ प्रतिपादित किया । यह कोई मत, पन्थ या सम्प्रदाय नहीं अपितु एक सम्पूर्ण जीवन पद्धति है । इसके द्वारा वैयक्तिक और सामाजिक समरसता, सामाजिक स्वास्थ्य, बौद्धिक जागरण, मानसिक शान्ति और आत्मिक आनन्द की अनुभूति हो सकती है । इस अष्टांग योग के सम्बन्ध में महर्षि पतंजलि अपने योगसूत्र में लिखते हैं ः
‘यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोःअष्टावंगानि ।’
अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणयाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि — ये योग के आठ अंग हैं । इन सब योगांगों का पालन किए बगैर कोई व्यक्ति योगी नहीं हो सकता । यह अष्टांग योग केवल योगियों के लिए नहीं, अपितु जो भी व्यक्ति जीवन में स्वयं को पूर्ण सुखी होना चाहता है और प्राणी मात्र को सुखी देखना चाहता है उन सबके लिए अष्टांग योग का पालन अनिवार्य है । वर्तमान सन्दर्भों में हमारा काम्य यही अष्टांग योग है जो हमारे जीवन को भौतिक और आत्मिक—दोनों ही स्तरों पर ‘सुन्दरम्’ बनाने का विज्ञान है ।
स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती मानते हैं कि मन के विकास के लिए मानसिक संयम और शान्ति आवश्यक है और शरीर के विकास के लिए अन्न एवं प्राण । अन्न से शरीर प्राण लेता है और प्राण स्फूर्ति, शक्ति तथा सामथ्र्य का रूप लेता है । आहार में संयम न रहे तो शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं । रोग के तीन प्राथमिक कारण माने गए हैं—शारीरिक अव्यवस्था, आहार में अव्यवस्था और निद्रा में अव्यवस्था । शारीरिक अस्वस्थता का सबसे बड़ा कारण है आहार और निद्रा में अव्यवस्था । शारीरिक श्रम और नियमित दिनचर्या के अभाव में निद्रा में अव्यवस्था होती है जो शारीरिक अस्वस्थता का कारण बनती है । इसका दूसरा कारण अनियमित आहार है क्योंकि वर्तमान समय में आहार का सम्बन्ध स्वास्थ्य से नहीं अपितु स्वाद से है । अनुचित आहार के कारण जब हमारे शरीर में प्राणतत्व की कमी हो जाती है तो शरीर निर्बल हो जाता है ।
शारीरिक दुर्बलता को दूर करने के लिए योगियों ने एक योग सामने रखा है और वह है हठयोग । हठयोग के पाँच चरण है । पहला है शरीर को उन विकारों से मुक्त करना जो अव्यवस्थित जीवनशैली के कारण उत्पन्न होते हैं । इन विकारों से मुक्ति के लिए शुद्धीकरण की विशेष प्रक्रियाओं के द्वारा शरीर की सफाई की जाती है जिन्हें षट्कर्म कहते हैं । इसके अलावा आसन, प्राणयाम, मुद्रा और बंध–ये भी हठयोग के अंग हैं । जब हठयोग को हम सिद्ध कर लेते हैं तब शरीर में प्राणों का संचार सुचारू रूप से होता है, रोग दूर होते हैं और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है ।
शरीर की तरह मन की भी आवश्यकताएँ होती हैं । संयम और शान्ति मन की आवश्यकताएँ हैं । मन में संयम और शान्ति लाने के लिए और इसे व्यवस्थित करने के लिए योगियों ने एक दूसरे प्रकार के योग को सामने रखा है और वह है राजयोग । मन में एक क्षमता होती है,  जो उसे एक विशेष केन्द्र–बिन्दु से जोड़ती है, जिसे अंतरात्मा भी कहा जाता है । लेकिन जब तक मन उसकी ओर आकर्षित नहीं होता तब तक वह मनुष्य को संसार में ही बाँधे रहता है और मन में अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न होते रहते हैं जिन्हें वृत्ति कहते हैं । राजयोग में कहा गया है ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ।’ मन में उत्पन्न हो रहे विकारों और वृत्तियों का निरोध करना ही योग है । निरोध का तात्पर्य यहाँ है मानसिक व्यवहार को होने देना, केवल तनाव के स्तर तक उसे नहीं पहुँचने देना । जो भी चीजें मन में आ रही हैं, जो भी भावनाएँ उत्पन्न हो रही है, जो भी इच्छाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, वासनाएँ मन में उत्पन्न हो रही है उसे रोकने का प्रयास न करना । लेकिन उसके नकारात्मक प्रभाव को अपने आप पर नहीं पड़ने देना । राजयोग में सबसे पहले आते हैं यम–नियम, फिर आसन–प्राणायाम, फिर प्रत्याहार–धारणा और अन्त में ध्यान और समाधि । यम–नियम व्यक्ति के व्यवहार को संशोधित और परिष्कृत करते हैं । प्रत्याहार तथा धारणा में अपने मन को एक बिंदु पर एकाग्र किया जाता है । इसमें चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन को व्यवस्थित किया जाता है । मन को एक अनुभव में स्थिर करने के बाद ध्यान की अवस्था आती है और ध्यान से ही समाधि की अवस्था में साधक पहुँचता है जिसमें ब्रह्मलीन होने की अवस्था आती है ।
इस बिन्दु पर आकर यह स्पष्ट हो जाता है कि योग महज एक धार्मिक या साम्प्रदायिक क्रिया नहीं वरन् शारीरिक और मानसिक स्तर पर एक सम्पूर्ण चिकित्सा विज्ञान है जो सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है । इसलिए यहाँ आचार्य बालकृष्ण सान्दर्भिक हो उठते हैं कि ‘योग एक पूर्ण जीवन शैली है, एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति एवं एक पूर्ण अध्यात्म विद्या । योग की लोकप्रियता का रहस्य यह है कि यह लिंग, जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा–भेद की संकीर्णताओं से कभी आवद्ध नहीं रहा है । साधक, चिन्तक, वैरागी, अभ्यासी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ—कोई भी इसका सान्निध्य पाकर लाभान्वित हो सकता है । व्यक्ति के निर्माण और उत्थान में ही नहीं बल्कि परिवार, समाज, राष्ट्र के चहुँमुखी विकास में भी यह उपयोगी सिद्ध हुआ है । आधुनिक मानव–समाज जिस तनाव, अशांति, आतंकवाद, अभाव एवं अज्ञान का शिकार है, उसका समाधान केवल योग के पास है । योग मनुष्य को सकारात्मक चिंतन के प्रशस्त पथ पर लाने की अद्भुत विद्या है…।’
बौद्ध साहित्य में योग की परम्परा तो मिलती ही है, सूफी संगीत के विकास में भी योगाभ्यास का प्रभाव माना जाता है जहाँ शारीरिक मुद्राओं और श्वास को क्रमशः आसन और प्राणायाम के द्वारा नियंत्रित और अनुकूलित किया जाता है । ११ वीं शताब्दी में प्राचीन भारतीय योगपाठ ‘अमृतकुण्ड’ का अरबी और फारसी भाषाओं में अनुवाद किया गया था । यद्यपि सन् २००८ में मलेशिया की शीर्ष इस्लामिक समिति ने इसका विरोध किया था और योगाभ्यास में विश्वास करने वाले मुसलमानों के विरुद्ध फतवा जारी किया था । लेकिन मलेशिया के योग शिक्षकों ने ‘अपमान’ कहकर इस फतवे की आलोचना की थी और यहाँ की महिलाएँ भी इसके प्रति निराशा व्यक्त की थी तथा योग कक्षाओं को जारी रखने का निर्णय लिया था । इसी तरह की अवस्था इंडोनेशिया में भी देखने को मिलती है जहाँ कुछ लोग धर्म के आधार पर इसे प्रतिबंधित करने की बात करते हैं और कुछ लोग आधुनिकता से समन्वित होकर इसके पक्ष में खड़े नजर आते हैं । प्रसिद्ध भारतीय पत्रकार एम. जे. अकबर स्वीकार करते हैं कि ‘यह मुद्दा धार्मिक नहीं बल्कि परस्पर घुलने–मिलने का है जो हमारी विविधतापूर्ण संस्कृति की अभिन्न प्रवृत्ति है । हम एक साथ एक ही भूमि के अलग–अलग बगीचे से उपजे फूलों का गुलदस्ता बनाते हैं । यह रचनात्मक सदभाव दर्शन, कविता, कला, मनोभावों, फैशन, भोजन आदि में परिलक्षित होता है । इसमें कुछ नया नहीं है । दिल्ली सल्तनत के मुसलमान शासक गंगा के पानी में नहाते थे, जिसे बैलगारियों से ढोया जाता था । इससे वे अधार्मिक या गैरमुसलिम नहीं हो गए थे । हिन्दू अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती जैसे सूफियों की मजारों पर सिर झुकाते हैं, इससे वे गैर हिन्दू नहीं हो जाते ।’
यह सच है कि संसार में अन्य अनेक चिकित्सा पद्धतियाँ हैं जो लोगों को स्वस्थ करती है औ नए–नए अनुसंधानों से इस दिशा में नियमित क्रियाशील हैं । लेकिन इन सबकी अपनी सीमाएँ हैं । आर्थिक बोझ तो इससे पड़ता ही है लेकिन कुछ परिस्थितियों में शारीरिक कष्ट भी झेलने होते हैं । इसके बावजूद ये शारीरिक स्तर पर तो हमें स्वस्थ कर पाते हैं लेकिन मन से इसका कोई जुड़ाव नहीं होता । इच्छाओं, कामनाओं, वासनाओं पर नियंत्रण का कोई नुस्खा यहाँ नहीं । योग शरीर और मन दोनों ही स्तर पर हमें स्वस्थ रखने के लिए प्रतिबद्ध है । हम जानते हैं कि ‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का निवास होता है ।’ इसलिए पास आए रोगों के इलाज के लिए हम चाहे जिस किसी चिकित्सा पद्धति को अपनाएँ, यद्यपि यह योग के द्वारा भी संभव है, लेकिन रोग को पास न आने देने का सबसे सहज और सरल माध्यम योग है । धर्म–सम्प्रदाय की सीमाएँ इसे किसी हद में बाँधने में सक्षम नहीं । योग की क्रिया में उच्चरित किसी मंत्र से किसी की धार्मिक आस्था पर अगर आघात पहुँचता है तो उस अंश की अवज्ञा करके भी योग की क्रियाओं को अपनाया जा सकता है ।
योग की एक विशेषता यह है कि यह सूक्ष्म के स्तर पर आधिभौतिक सत्ता को नियंत्रित करता है, दूसरे शब्दों में मन के संयमन के द्वारा तन को स्वस्थ रखता है । एक उदाहरण के द्वारा इसे समझा जा सकता है कि होमियोपैथ एक ऐसी चिकित्सापद्धति है जिसमें दवा की मात्रा हम जितना ही कम करते हैं उसकी शक्ति उतनी ही बढ़ जाती है । ‘सम सम शमयति’ के सिद्धान्त पर चलता हुआ यह शास्त्र दवाओं की सूक्ष्म मात्रा से शरीर की रोगमुक्ति की क्षमता को जागृत कर देता है.और बिना किसी कुप्रभाव रोगी क्रमशः रोगमुक्त हो जाता है । योग इससे भी सूक्ष्म चिकित्सा विज्ञान है जिसका सम्बन्ध शरीर और मन दोनों से है । यहाँ विभिन्न आसनों और प्राणायाम के माध्यम से हम अपने शरीर की सुषुप्त शक्तियों को ही जागृत करते हैं और जब हमारी प्राण शक्ति जागृत होती है तो कम परिश्रम में ही वह अपने अनुकूल शरीर को बनाने का प्रयास करती है और हम शीघ्रता से रोगों से दूर भी होते है और रोग से मुक्त भी होते हैं । विज्ञान कहता है कि एक रोटी से हमें इतनी ऊर्जा मिलती है कि हम बारह किलोमीटर तक चल सकते हैं । लेकिन योग के द्वारा महज कुछ आसनों से हम इस ऊर्जा का निष्कासन कर सकते हैं ।
इतने गुणों से परिपूर्ण योग संसार और मानवता के लिए कल्याणकारी है । यह मनुष्य को स्वस्थ रखने के साथ–साथ सात्विक वृत्तियों को जागृत करता है, संसार में रहकर उसके पंक से स्वयं को दूर रखने की क्षमता विकसित करता है । इससे मनुष्य स्वयं को और अपनी क्षमताओं को पहचानता है । संतोष, स्नेह, प्रेम और परोपकार जैसे भाव जागृत होते हैं और वह तनावों से स्वयं को मुक्त रख सकता है । अगर ये वृत्तियाँ मानव मात्र में जागृत हो जाती है तो संसार में जो संघर्ष देखा जा रहा है और दूसरे का स्वत्व हड़पने की प्रवृत्ति देखी जा रही है उससे विश्व मुक्त हो सकता है, संकीर्णताओं की सीमा समाप्त हो सकती है, आतंक के साम्राज्य का अन्त हो सकता है और वेदों के ‘सर्वेअपिसुखिनःसन्तु सर्वेसन्तु निरामया’ की वाणी सार्थक हो सकती ।

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