योग उतपाति के मुखय कारन :सच्चिदानन्द चौवे

न भूतकोपान्नच दोषकोपान्न, चैव सांवत्सरिको परिष्टान्
ग्रह प्रकोपात्प्रभवन्ति रोगाः कर्मोदयोंदीरण भावतस्ते।
अर्थात्ः- पृथ्वी आदि भूतों के कोप से रोग उत्पन्न नहीं होते हैं। और न कोई दोषों के प्रकोप से होते हैं। तथा वर्षmल के खराब होने से और मंगल आदि ग्रहों के प्रकोप से भी रोग उत्पन्न नहीं होते हैं। परन्तु कर्मों के उदय और उदीरण से रोग उत्पन्न होते हैं।
यथार्थ में कर्मोपशान्ति करने वाली क्रिया ही चिकित्सा है। ऐसा आचायोर्ं का अभिमत हैं। कहा भी है-
तस्मात्स्वकमार्ंर्ेेम क्रियायाः व्याध्रि्रशान्ति प्रवदंति तज्ज्ञा
स्वकर्म पाको द्विविधोपभाव, दुषायकाल क्रम भेद भिन्नः।
अर्थात्ः- कमोर्ं की उपशमन-क्रिया -देव पूजा ध्यानादि) को रोग शान्ति करनेवाली क्रिया तथा चिकित्सा कहते हैं। अपने कमार्ंर्ेेा पकाना दो प्रकार से होता है, एक तो यथाकाल स्वयं पकना, दूसरा उपाय से पकाना। जिस प्रकार वृक्ष के फल समय आने पर स्वयं पकते हैं, परन्तु बुद्धिमान लोग उन्हें उपायों से भी पका लेते हैं, ठीक उसी प्रकार प्रकुपित रोग भी उपाय -चिकित्सा) और काल क्रम से पकते हैं। रोग के कच्चेपन को दूर करनेवाली औषधियों का प्रयोग करके दोषों -रोगों) को पकाना ‘उपाय पाक’ कहलाता है तथा कालान्तर में अपनी अवधि के अन्दर स्वयंमेव बिना औषधि के ही पक जाने को ‘कालपाक’ कहते है, जैसे पशु-पक्षी तथा अनाथों में देखा जाता है। तार्त्पर्य यह है कि बुद्धिमानों को पुरुषार्थ करके अपने शरीर को रोगों से बचाना चाहिए क्योंकि यह मानव देह रत्नमय धर्म का साधन है।
लोक में यह बात र्सवमान्य है कि जीवों के रोगों की उत्पत्ति पाप के उदय से होती है, पाप और धर्म परस्पर विरोधी हैं। धर्म के अस्तित्व से पापों का नाश हो जाता है। पाप से उत्पन्न रोग पाप से नहीं मिटते परन्तु धर्माचरण से एवं शुद्ध औषधियों के प्रयोग से उनका शमन होता है। परन्तु खेद है कि आज का मानव रोग होने पर अक्सर धर्म कायोर्ं से उदास देखा जाता है। अतः रोगादि हो जाने पर धार्मिक कार्यों में अपना विशेष योग देना चाहिए तथा शुद्ध औषधियों से रोग मिटाना चाहिए। रोग उत्पन्न होने पर आप को मन-बचन कर्म से सत्कार्यों में लग जाना चाहिए। भगवद्भक्ति में इतनी शक्ति है, जो व्यक्ति को दुःख से निकाल कर सुख में स्थापित कर दे, कहा भी है कि-
व्रतं शीलं तपो दानं संयोमो˜हत पूजनम्।
दुःख विच्छित्तये र्सव, प्रोक्त मेतन्न संशयः।।
धार्मिक क्रियाओं से दुःख रोग का निवारण हो जाता है। अतः प्राणियों को सत्कार्य में उत्साह रखते हुए सोचना चाहिए कि ‘शरीरं व्याधि मन्दिरम्’। आचार्यों ने रोगों की गणना करते हुए बताया है कि इस शरीर में पाँच करोडÞ, अडÞसठ लाख, नवासी हजार पाँच सौ चौरासी रोग हो सकते हैं। यह सब पापोदय में होते हैं और पाप के अस्त होने पर मिटते हैं।
इसके अतिरिक्त रोगों की उत्पत्ति के बाह्य कारण- विरुद्ध आहार, विहार व असत् आचरण आदि भी हैं। अतः रोगों से बचने के लिए खान-पान की शुद्धता व सदाचारपर्ूण्ा क्रियाओं की आवश्यकता होती है।
यदि असाध्य रोग होकर आयु सामाप्ति का समय आ गया हो तो मानवों को बिना प्रमाद के -समाधि मरण) के सम्मुख हो जाना चाहिए। संसार, शरीर और भोगों से विरक्त होकर बारह भावनाओं का चिन्तन करना चाहिए। इसीसे मानव धर्म की र्सार्थकता होगी। यदि मानव जीवन प्राप्त करके इन्द्रियों को सिर्फभोगवासना में व शरीर के व्यामोह में ही व्यतीत कर दिया तो यह बडÞी भारी भूल होगी, अन्त में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बचेगा। अस्तु।

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