योग–चाहे सबकी खैर : नरेन्द्र दूबे

नरेन्द्र दूबे
कला का वरदान केवल मनुष्य को मिला है । यदि कोई व्यक्ति एकाध कला में ही निपुण या प्रवीण हो जाये तो उसका जीवन सार्थक और सफल माना जाता है । भारतीय सनातनी विरासत में अवतार पुरुष भगवान कृष्ण को संपूर्ण कलाआें का स्वामी माना जाता है । श्रीकृष्ण सभी १४ विद्याओं और चौसठ कलाओं में निष्णात–प्रवीण थे । उन्हें ही योगेश्वर कहा गया । योग विद्या के प्रतिष्ठाता भगवान श्रीकृष्ण की ही अवधारण हैं–‘वसुधैव कुटुम्बकं’, अर्थात् सारी पृथ्वी एक कुटुम्ब अथवा परिवार है । मनुष्य ही नहीं प्राणी मात्र या पूरे जीव जगत के प्रति ऐसी एकात्मता, प्रेम की भावना अन्यत्र नहीं मिलती । ‘वसुधैव कुटुम्बकं’ के इस आदर्श दर्शन का एक सूत्र योग है ।
जीवन में योग को साधकर ही व्यक्ति से समष्टि तक की यात्रा को सुगम और सार्थक बनाया जा सकता है । योग मात्र तन–मन को स्वस्थ्य रखने का कारक नहीं है अपितु समूचे व्यक्ति मानस को सुदृढ़ और शांत रखता है । स्वस्थ्य तन, निरोग मन और सुदृढ़–शांत मानस ही श्रेष्ठ कर्म का वाहक बनता है । योग किसी धर्म विशेष को साधने का प्रयोजन नहीं है, बल्कि मानवता के हित में दुनिया को बेहतर मानव संसाधन उपलब्ध कराने का पुण्य कर्म है । योग अभ्यास अपने विकास के ऊंचे सोपान पर पहुंचकर व्यक्ति की चेतना में अध्यात्म का प्रकाश फैलाता है, जो जीवन के अंधेरों को हरता है ।
योगेश्वर कृष्ण द्वारा प्रतिष्ठित योग विद्या को बाद के युग में ऋषि पतंजलि ने अपनी तप–साधना और प्रयोगों से अनुभूत कर वाकायदा योगशास्त्र के रूप में लिपिबद्ध कर जगत के सामने रखा । बाद के युग में गुरू गोरखनाथ का योग के लिये दिया योगदान कृतज्ञता से याद किया जाता है । आधुनिक भारत में स्वामी शिवानंद, तदंतर उनके शिष्य स्वामी चिदानंद और स्वामी सत्यानंद जी ने योग विज्ञान को बाकायदा संस्थागत रूप देकर वैज्ञानिक पद्धति और गहरे अनुशासन के साथ योग के प्रसार और प्रतिष्ठा में स्तुत्य योगदान दिया है । बिहार के मुंगेर, पश्चिम बंगाल के रिखिया और उत्तराखंड के ऋषिकेश में शिवानंद जी के योग संस्थान प्रकाश स्तंभ की तरह हैं । वर्तमान समय में स्वामी सत्यानंद जी के सुयोग्य शिष्य स्वामी निरंजनानंद सरस्वती और अन्य संन्यासी इस योग धारा को भारत और विदेश में भी अविरल प्रवाहित किये हैं । पिछले डेढ़ दशक में बाबा रामदेव योग को इलेक्ट्रानिक मीडिया और मैदानी स्तर पर भी जनमानस को योग के प्रति प्रेरित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं ।
२१ वीं सदी के इस दूसरे दशक में योग की प्रतिष्ठा में वृहत्तर और महत्तर कार्य प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने किया है । श्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर योग को प्रतिष्ठित कर ‘स्वस्थ मानव’ बनाने के वैश्विक यज्ञ में अपनी महत्वपूर्ण आहुति दी है । उनके सद्प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र सघ ने ‘२१ जून’ योग दिवस घोषित किया है । विश्व योग दिवस, लोक कल्याणकारी योग विज्ञान को समूचे जगत में पहुंचाने की एक सार्थक कोशिश है । ‘योग–क्षेमं वहाम्याहं’ की सद्भावना से समूची मानवता को योग से परिचित कराने के इस साधु कार्य के लिए मोदी जी साधुवाद के पात्र हैं ।
जैसा कि योग शब्द में ही उसके निहितार्थ छिपे हैं । योग का सामान्य अर्थ ही जोड़ना या मिलाना होता है । योग या जोड़ को धन भी कहते । धन यानि च्वेपजपअम, और पोजीटिव या धनात्मक उर्जा की महत्ता से हम परिचित ही हैं । धन के विपरीत ऋणात्मक सत्ता है । पर ऋणात्मकता की उम्र ज्यादा नहीं होती । धन और धन मिलकर धन ही होता । परन्तु ऋण और ऋण को मिलाने से परिणाम धन हो जाता है । अभिप्राय यह कि धनात्मक विचार और दर्शन ही प्रकृति और मानवता के हित में अभीष्ठ है । योग साधना से मनुष्य के भीतर अप्रतिम रूप से पाककजिटिवविटी बढ़ती है । स्वस्थ्य तन में ही स्वस्थ्य मन का रहवास हो सकता है । योग तन और मन दोनों को प्राकृतिक रूप से स्वस्थ्य रखने का उपक्रम है ।
योग विद्या के आदि पुरुष महर्षि पतंजलि का ‘योग सूत्र’ आज भी मानक गं्रथ के रूप में हमारा मार्गदर्शन करता है । उनके प्रारंभिक तीन सूत्रों में ही योगदर्शन का लब्बोलुआब निहित है ।
१. अथ योगानुशासनम्
२. योगश्चित्तवृत्ति निरोधः
३. तदा दु्र्रष्टः स्वरूपे अवस्थानम
अभिप्राय यह कि योग जीवन में अनुशासन है । वह जीवनचर्या को प्राकृतिक रूप से स्वस्थ्य जीवन के लिए व्यवस्थित करता है । और शरीर को आत्मा की सत्ता से जोड़कर परमात्मा तक पहुंचाने का मार्ग है । योग मनुष्य की संपूर्ण वृत्तियों की निवृत्ति है । योग वृत्तियों का नियामक भी है और निरोध भी । गीता में योग को ‘योगः कर्मसु कौशलम’ भी कहा गया है । योग का अर्थ विस्तार बड़ा व्यापक है । श्रीकृष्ण के ही मुखारबिंद से कहा गया है –
‘अनन्याश्चिन्तयन्तो मांये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योग–क्षेमं वहाम्यहम । ।’
इस ‘योग–क्षेम’ का परिपालन ही मनुष्य के लिए कल्याणकारी है । योग हमारे विवेक को जागृत और बुद्धि को पुष्ट करता है । साथ ही हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाता है । आत्मा से बड़ी कोई शक्ति नहीं है और जिस व्यक्ति में आत्मबल आ जाये, वह सबसे शक्तिशाली व्यक्ति साबित होता है ।
यूं तो श्रीकृष्ण के कर्मयोग, सांख्ययोग से लेकर सहजयोग तक योग के अनेकानेक प्रकार हैं । परन्तु योग का सर्वमान्य और लोकप्रिय स्वरूप पतंजलि प्रवर्तित ‘अष्टांग योग’ ही है । जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि के आठ अंगों के माध्यम से योग साधना की जाती है ।
यहां यह उल्लेखनीय है कि योग आसन कोई साधारण व्यायाम नहीं है । बल्कि श्वास प्रश्वास की संगति के साथ आराम से, धीरे–धीरे व एकाग्रता के साथ किये जाने का अभ्यास है । इससे वाह्य एवं आन्तरिक दोनों ही शरीर संस्थानों पर प्रभाव आता है । स्नायुमंडल, अंतःस्त्रावी ग्रंथियां, आंतरिक अंग तथा मांसपेशियाँ सुचारू रूप से कार्य करने लगती हैं । रक्त संचार में संतुलन आता है । श्वसन प्रणाली एवं उत्सर्जन प्रणाली व्यवस्थित होती है । अनुकंपी सैलउचंजीमजपबद्ध तथा परानुकंपी सच्ंतेंलउचंजीमजपबद्ध तंत्रिका प्रणालियों में संतुलन आता है । आसनों के कुशल अभ्यास के बाद ही प्राणायाम एवं आगे की योग साधना होती है । योग अभ्यास हमेशा प्रशिक्षित गुरू या अनुदेशक की देखरेख में ही सीखना चाहिए । पूर्ण अभ्यस्त हो जाने के बाद ही योग स्वतंत्र रूप से करना चाहिए । योग अभ्यास में थोड़ी सी लापरवाही भी नुकसानदायक हो जाती है ।
समग्ररूप से कह सकते हैं कि आधुनिक युग में जब हमारी दिनचर्या पूर्णतः मशीनों पर निर्भर हो गई है । शारीरिक श्रम कम और मानसिक श्रम ज्यादा करते हैं । भोजन के स्तर पर भी रसायनिक खादों और दवाईयों से युक्त अनाज और जंक फुड का सेवन कई बीमारियाँ दे रहा है । तब योग अभ्यास का मार्ग ही प्रकृतिस्थ होकर स्वस्थ्य प्रसन्न जीवन प्रदान कर सकता है ।
दुनिया द्वन्द्वात्मकता से परिपूर्ण है । विश्व स्तर पर सभी प्राणियों की अपनी अपनी भूमिकाएं हैं । योग हमें प्रतिकूल परिस्थितियों में भी निर्विकार और सहज भाव से स्वीकार्य की शक्ति प्रदान करता है । वह हमें समरसता समहनंदपउपजलद्ध सिखाता है । दरअसल सफलता और असफलता दोनों में ही अनासक्त रहना योग है । योग की चेतना हमें सभी प्राणियों में रहने वाली एक सी ‘दिव्य चेतना’ का साक्षात्कार कराती है । और हमें द्वन्द्व मुक्त कर निर्मल बनाती है ।
प्रधानमंत्री मोदी की पहल और संयुक्त राष्ट्र संघ का यह वैश्विक प्रयास योग विज्ञान के जरिए लोगों को उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा ।
गार्ड लाइन, दमोह (म.प्र.), भारत

 

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