रणनीति विहीन राजनीति : रणधीर चौधरी

राजपा गठन पश्चात शायद पहली विरोध सभा थी विराटनगर मे । उपेन्द्र यादव और राजपा अध्यक्ष मण्डल के महन्थ ठाकुर भी विरोध सभा में सहभागी हुए थे । आम जनमानस को सम्बोधन करते हुए ठाकुर ने कहा था कि– संविधान संशोधन के बगैर राजपा चुनाव में भाग नहीं लेगा । परंतु उनके चेहरे पर विश्वास की आभा नहीं दिख रही थी । वे थकेथके से दिख रहे थे । कार्यक्रम पश्चात मैंने उनसे विराटनगर स्थित स्वागतम होटल में मुलाकात की थी । मेरा उनसे प्रश्न था, संविधान मे संशोधन होने की सम्भावना कितनी लग रही है आपको ? उनका जवाब था– हमारी राजनीति संविधान घोषणा के पश्चात धराप में पर गयी है । हमारे अनुकूल संशोधन होगा ऐसा लग नहीं रहा है ।
तो जब पहले से ही यह प्रतीत था कि संशोधन की सम्भावना नहीं है तो आन्दोलन को निरन्तरता देने की नौटंकी क्यूँ ? संविधान संशोधन पर वोटिङ मान लेने वाली शर्त को प्रथम और दूसरे चरण के चुनाव के दौरान क्यों नहीं लागू किया गया ? सत्ता के सामने जब आत्मसमर्पण ही करना था तो इतना देर क्यों ? संविधान संशोधन पर वोटिङ उस वक्त करवाया जब वर्तमान सरकार को यह यकीन हो चुका था कि यह संशोधन सम्भव नहीं है । एमाले इस में सहभागी नहीं है और सत्ता पक्ष के भी सभासद बागी होंगे ही । असल मे कांगे्रस, माओवादी के इस चातुर्य के बीच उनकी कोई गलती नहीं है । वे अपने रणनीतिक राजनीति को सफल कराने मे सफल रहे । प्रदेश–२ के चुनाव में आज कांग्रेस यही कहते नहीं थक रहा है कि हमने तो संविधान संशोधन के लिए सारा उर्जा लगा दिया परंतु एमाले, जो मधेश विरोधी है । नतिजतन आज कांग्रेस और माओवादी का चुनावी ताप सब से अधिक दिखाई दे रहा है । बेचारा मधेशवादी । अपनी ही रणनीतिक असफलता के कारण कहीं का नहीं रहा । प्रदेश एक ओर पाँच मे तो चुनाव को बहिस्कार करके असफल हुआ और प्रदेश–२ की अवस्था तो सब के सामने है ।
इन राजनीतिक रस्साकस्सी के बीच दो बात साबित हुई है । पहली यह, कि नेपाल का संविधान विभेदकारी है । नब्बे प्रतिशत द्वारा डंका पीट कर और मधेशियाें की हत्या करके लाया गया संविधान के बारे मे राष्ट्रीय कहलाने वाले दलाें के बासठ प्रतिशत सभासदाें ने अनुमोदित किया है कि यह संविधान वास्तव में संशोधन को लालायित है । दूसरी यह कि, अभी हताश दिख रहे मधेशवादी दलों के द्वारा ही मधेश का अब कल्याण सम्भव नहीं है । थोड़ा बहुत जो परिवर्तन संस्थागत हुआ है उसका प्रमुख कारण है माओवादी । बात चाहे गणतन्त्र, धर्मनिरपेक्षता या समावेशी समानुपातिक की हो । एक मधेश स्वायत्त प्रदेश, एक मधेश एक प्रदेश की यात्रा मे असफल मधेशवादी एक मधेश दो प्रदेश तक भी नहीं संस्थागत कर पाया ।
रातों रात प्रदेश–२ के चुनाव मे भाग लेने के बाद प्रदेश एक और पाँच के राजपा के कार्यकर्ता सब मे अलग–थलग की भावना उत्पन्न होना स्वाभाविक है । इसी सन्दर्भ मे विराटनगर स्थित राजपा के फ्रन्टलाइनर नेता राकेश रोशन यादव का कहना है कि– राजपा के अपरिपक्व निर्णय ने हमें राजनीतिक हिसाब से सिर्फ घायल ही नहीं कर दिया है बल्कि हमलोग अलग–थलग महसूस कर रहे हैं । दिनरात मेहनत करके जो संगठन मजबूत किया था वह भी आज बिखर रहा है । राजप प्रति के स्नेह पर हम पुनर्विचार करने पर बाध्य हो चुके हैं ।
बिना संशोधन करबाए राजपा के चुनाव में भाग लेने वाले आत्मघाती निर्णय के पश्चात राष्ट्रीय कहलाने वाले दलों मेें खुशी का माहौल छाया हुआ है । परंतु यह खुशियाली माहौल के आयु के बारे में वे शायद अवगत नहीं हैं । उनको यह लगना कि अब तो देश शान्ति के पथ पर आ गया शायद गलत है । क्योंकि कथित मधेशवादी दल फिर से संविधान घोषणा किए गए दिन काला दिवस मनाने की तैयारी में लगा हुआ है और राजनीतिक बाजार में चर्चा यही भी है कि तीसरे चरण के चुनाव के बाद फिर से आन्दोलन का आगाज किया जाएगा । यह अलग बात है कि मधेशवादियों के फरमान पर अब मधेश में आन्दोलन असम्भवप्रायः है । फिर भी नेपाली स्थायी सत्ता के दलालाें के लिये परेशानीवाला समाचार अवश्य साबित होगा और फिर कोई न कोई लालीपॉप दिखा के माहोल बनाने में लग जाएँगे ।
इन सभी उथल–पुथल के बीच मधेश में कुछ समूह उभर कर आ रहा है । मधेशवादियों के आत्मसमर्पणवाली राजनीतिक चरित्र स्पष्ट हो जाने के बाद हजारों ऐसे युवा है जिनमें यह भावना पैदा हो गयी है कि मधेशवादियों ने उनकी भावनाआें के साथ खिलवाड़ किया है । आज सामाजिक संजाल मे “बहिष्कारवादी” ह् यास टेगिंग चल रहा है । बहिष्कारवादी समुह मे वे सब लगे हैं जिनको सक्रिय राजनीति से कोई सरोकार नहीं है । मधेश का हक अधिकार सुनिश्चित हो इससे ज्यादा लालच नहीं है उनमें । कुछ युवा संगठन, जैसे कि– तराई मधेश राष्ट्रीय परिषद, मास, यूनाइटेड ग्रुप ऑफ मधेशी । और सीके लाल, खगेन्द्र संग्रौला जैसी हस्ती भी अपने आपको बहिष्कारवादी पक्ष में ही हैं । काठमांडू के माइतिघर मण्डला मे सिके लाल का भाषण उर्जा प्रदान करने लायक था । उनका मानना है कि, मधेशवादी दल अपनी औकात के मुताबिक जितना कर सकते थे उतना संघर्ष किए । इससे आगे वे कर भी नहीं सकते थे । अब बारी है राजनीति इतर वाले लोगों की जो इस मुद्दा को जीवित रख सकते हैं । इसीलिए सीमांतकृत समुदाय के मुद्दाें को जीवित रखना आवश्यक हो गया है । हर एक मधेशियों को संकल्प लेना चाहिये और इस चुनाव को अर्थपूर्ण तरीके से बहिष्कार करना चाहिए ।
साथ ही मेरे बिचार में अब मधेश की राजनीति में एक अलग नयी शक्ति की आवश्यकता है जो मध्यमार्गी हो और रणनीतिक हिसाब से राजनीति को आगे ले जा सके । एक ऐसी फोर्स जो मधेश के स्वभाव अनुकूल राजनीतिक रथ को आगे ले जा सके न की किसी प्रकार के बाहरी या भीतरी प्रभाव में आ कर राजनीति को गंदा कर दे । जैसा अभी हुआ है । मधेशवादी दल ने १६ सूत्री समझौते का जोर शोेर से विरोध किया था । कर्मकाण्ड रूप में संबिधान सभा से राजीनामा का नौटंकी भी किया था परंतु मधेश से घाटी तक पहुँच कर समय–समय पर संसद मे कभी किसी को हराने के लिए तो कभी किसी को विजय करवाने के लिए प्रधानमन्त्री चुनाव मे अपना मतदान करते गए और यह हरकत मधेशी जनता को बिल्कुल हजम नहीं हो रहा था । न जाने किसके प्रभाव में आ कर वे ऐसा करने पर विवश हो रहे थे ।
वर्तमान समय में मधेशवादियो की राजनीति और राष्ट्रीय कहलाने वाले दलों के बीच कोई तात्विक फर्क नहीं दिख रहा है । दो प्रकार का प्रभाव नजर आ रहा है राजनीति में अभी । पहला, मधेशी युवा मानसिक हिसाब से और राजनीति में सक्रियता के हिसाब से बँटे हुए दिख रहे हैं । अधिकांश मधेश के युवा का झुकाव राष्ट्रीय कहलाने वाले दलाें की ओर जाता दिख रहा है जो दुखद है । दूसरा, स्वतन्त्र मधेश गठबंधन जैसे संगठन को लोग अन्तिम विकल्प के रूप में ले रहे है ।
अन्त में, नहीं भूलना चाहिए कि आमजन के मानसपटल में जो मुद्दा डेरा जमा लेने में सम्भव होता है वैसे मुद्दाें को विस्थापित कर देना आसान नहीं होता है । नेपाली शासक द्वारा लाए गए “ घरघर मे सिंहदरवार” तो क्या गाँव–गाँव में सिंहदरवार जैसे दिखावटी नारा भी अधिकार के मुद्दाें को विस्थापित कर सकता है । अभी जो शान्ति दिख रही है यह “मुर्दा शान्ति” से ज्यादा कुछ नहीं है । इसीलिए, राजपा को चुनाव मे सहभागी होते देख नेपाल के स्थायी सत्ता को ज्यादा उछलना नहीं चाहिए । अधिकार की राजनीति करने वाले को थका कर और गला कर देश मे शान्ति नहीं कायम हो सकती है । अतः नेपाल सरकार को यथाशीघ्र मधेशी की माँगों को सम्बोधन कर देश को वास्तविक शान्ति पथ पर लाना चाहिए ।

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