रविवार व्रत-2017 माहात्म्य : आचार्य राधाकान्त शास्त्री

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काठमांडू, २३ अप्रैल |

इस वर्ष सामान्यतः रविवार व्रत
30 अप्रैल 2017 को भी किया जा सकता है ।
किन्तु 7 मई 2017 वाला रविवार व्रत  सर्वार्थ सिद्धि हेतु सर्वोत्तम है
रविवार व्रत :-
रविवार व्रत भगवान सूर्यदेव की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।जिस व्यक्ति की जन्मकुण्डली अथवा गोचर मे सूर्य अनिष्टकारी हो ; उसे रविवार व्रत अवश्य करना चाहिए।
विधि —
रविवार व्रत का आरम्भ विशेषकर वैशाख ; मार्गशीर्ष और माघ मे किया जाता है।कुछ लोगों के अनुसार कार्तिक मास भी रविवार व्रत के लिए उत्तम माना गया है।व्रती को चाहिए कि वह प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प ले।फिर सुवर्ण निर्मित सूर्यमूर्ति का गन्धाक्षत आदि से विधिवत पूजन करे।मूर्ति के अभाव मे सूर्यदेव की ओर देखते हुए उन्हें गन्ध पुष्प आदि अर्पित करे।फिर जल मे लाल पुष्प डालकर सूर्यार्घ्य प्रदान करे।सम्पूर्ण दिन शान्तचित्त होकर परमात्मा का स्मरण करे।
रविवार व्रत मे सूर्यास्त के पूर्व एक बार नमक रहित भोजन लेना चाहिए।यदि केवल फलाहार लेना हो तो भी सूर्यास्त के पूर्व ही लेना चाहिए।इस प्रकार एक वर्ष तक व्रत करके उद्यापन करना चाहिए।
माहात्म्य —
रविवार व्रत करने से मनुष्य तेजस्वी ; स्वाभिमानी एवं प्रसिद्ध हो जाता है। दाद ; कुष्ठ आदि रक्तविकार ; नेत्रपीड़ा ; दीर्घरोग से मुक्ति पाने के लिए रविवार व्रत बहुत फलकारी माना जाता है।इस व्रत से मनुष्य की सभी कामनायें पूर्ण हो जाती हैं।स्वास्थ्य लाभ के लिए रविवार व्रत रामबाण सदृश प्रभावशाली है।
रविवार सूर्य देवता की पूजा का वार है। जीवन में सुख-समृद्धि, धन-संपत्ति और शत्रुओं से सुरक्षा के लिए रविवार का व्रत सर्वश्रेष्ठ है। रविवार का व्रत करने व कथा सुनने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। मान-सम्मान, धन-यश तथा उत्तम स्वास्थ्य मिलता है। कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है।

प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त हो, स्वच्छ वस्त्र धारण कर परमात्मा का स्मरण करें।
एक समय भोजन करें।
भोजन इत्यादि सूर्य प्रकाश रहते ही करें।

इस दिन नमकीन तेल युक्त भोजन ना करें।
व्रत के दिन क्या न करें
इस दिन उपासक को तेल से निर्मित नमकीन खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। सूर्य अस्त होने के बाद भोजन नहीं करना चाहिए।

रविवार व्रत विधि :-

रविवार को सूर्योदय से पूर्व बिस्तर से उठकर शौच व स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें। तत्पश्चात घर के ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान सूर्य की स्वर्ण निर्मित मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद विधि-विधान से गंध-पुष्पादि से भगवान सूर्य का पूजन करें। पूजन के बाद व्रतकथा सुनें। व्रतकथा सुनने के बाद आरती करें। तत्पश्चात सूर्य भगवान का स्मरण करते हुए सूर्य को जल देकर सात्विक भोजन व फलाहार करें।

यदि किसी कारणवश सूर्य अस्त हो जाए और व्रत करने वाला भोजन न कर पाए तो अगले दिन सूर्योदय तक वह निराहार रहे तथा फिर स्नानादि से निवृत्त होकर, सूर्य भगवान को जल देकर, उनका स्मरण करने के बाद ही भोजन ग्रहण करे।

शास्त्रों के अनुसार जिन व्यक्तियों की कुण्डली में सूर्य पीडित अवस्था में हो, उन व्यक्तियों के लिये रविवार का व्रत करना विशेष रूप से लाभकारी रहता है। इसके अतिरिक्त रविवार का व्रत आत्मविश्वास मे वृद्धि करने के लिये भी किया जाता है। इस व्रत के स्वामी सूर्य देव है ।
नवग्रहों में सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिये रविवार का व्रत किया जाता है। यह व्रत अच्छा स्वास्थय व तेजस्विता देता है। शास्त्रों में ग्रहों की शान्ति करने के लिये व्रत के अतिरिक्त पूजन, दान- स्नान व मंत्र जाप आदि कार्य किये जाते हैं। इनमें से व्रत उपाय को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। पुरे नौ ग्रहों के लिये अलग- अलग वारों का निर्धारण किया गया है। रविवार का व्रत समस्त कामनाओं की सिद्धि, नेत्र रोगों में मी, कुष्ठादि व चर्म रोगों में कमी, आयु व सौभाग्य वृद्धि के लिये किया जाता है।
रविवार व्रत महत्व
यह व्रत अगहन, वैशाख, या भाद्रपद  मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से प्रारम्भ करके कम से कम एक वर्ष और अधिक से अधिक बारह वर्ष के लिये किया जा सकता है
रविवार क्योंकि सूर्य देवता की पूजा का दिन है। इस दिन सूर्य देव की पूजा करने से सुख -समृद्धि, धन- संपति और शत्रुओं से सुरक्षा के लिये इस व्रत का महत्व कहा गया है। रविवार का व्रत करने व कथा सुनने से व्यक्ति कि सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। इस उपवास करने वाले व्यक्ति को मान-सम्मान, धन, यश और साथ ही उतम स्वास्थय भी प्राप होता है। रविवार के व्रत को करने से सभी पापों का नाश होता है। तथा स्त्रियों के द्वारा इस व्रत को करने से उनका बांझपन भी दूर करता है। इसके अतिरित्क यह व्रत उपवासक को मोक्ष देने वाला होता है।
रविवार व्रत विधि-विधान
रविवार के व्रत को करने वाले व्यक्ति को प्रात: काल में उठकर नित्यकर्म क्रियाओं से निवृत होने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। घर में किसी एकान्त स्थान में ईशान कोण में भगवान सूर्य देव की स्वर्ण निर्मित मूर्ति या चित्र स्थापित करना चाहिए। इसके बाद गंध, पुष्प, धूप, दीप आदि से भगवान सूर्य देव का पूजन करना चाहिए।
पूजन से पहले व्रत का संकल्प लिया जाता है। दोपहर के समय फिर से भगवान सूर्य को अर्ध्य देकर पूजा करे और कथा करें। और व्रत के दिन केवल गेहूं कि रोटी अथवा गुड से बना दलिया, घी, शक्कर के साथ भोजन करें। भगवान सूर्य को लाल फूल बेहद प्रिय है। इसलिये इस दिन भगवान सूर्य की पूजा काल रंग के फूलों से करना और भी शुभ होता है। रविवार व्रत कथा |
कथा के अनुसार एक बुढिया थी, उसके जीवन का नियम था कि व प्रत्येक रविवार के दिन प्रात: स्नान कर, घर को गोबर से लीप कर शुद्ध करती थी। इसके बाद वह भोजन तैयार करती थी, भगवान को भोग लगा कर स्वयं भोजन ग्रहण करती थी। यह क्रिया वह लम्बें समय से करती चली आ रही थी। ऎसा करने से उसका घर सभी धन – धान्य से परिपूर्ण था। वह बुढिया अपने घर को शुद्ध करने के लिये, पडौस में रहने वाली एक अन्य बुढिया की गाय का गोबर लाया करती थी। जिस घर से वह बुढिया गोबर लाती थी, वह विचार करने लगी कि यह मेरे गाय का ही गोबर क्यों लेकर आती है। इसलिये वह अपनी गाय को घर के भीतर बांधले लगी। बुढिया गोबर न मिलने से रविवार के दिन अपने घर को गोबर से लीप कर शुद्ध न कर सकी। इसके कारण न तो उसने भोजन ही बनाया और न ही भोग ही लगाया. इस प्रकार उसका उस दिन निराहार व्रत हो गया। रात्रि होने पर वह भूखी ही सो गई। रात्रि में भगवान सूर्य देव ने उसे स्वप्न में आकर इसका कारण पूछा. वृद्धा ने जो कारण था, वह बता दिया। तब भगवान ने कहा कि, माता तुम्हें सर्वकामना पूरक गाय देते हैं, भगवान ने उसे वरदान में गाय दी, धन और पुत्र दिया। और मोक्ष का वरदान देकर वे अन्तर्धान हो गयें. प्रात: बुढिया की आंख खुलने पर उसने आंगन में अति सुंदर गाय और बछडा पाया। वृद्धा अति प्रसन्न हो गई। जब उसकी पड़ोसन ने घर के बाहर गाय बछडे को बंधे देखा, तो द्वेष से जल उठी. साथ ही देखा, कि गाय ने सोने का गोबर किया है। उसने वह गोबर अपनी गाय् के गोबर से बदल दिया।
रोज ही ऐसा करने से बुढ़िया को इसकी खबर भी ना लगी। भगवान ने देखा, कि चालाक पड़ोसन बुढ़िया को ठग रही है, तो उन्होंने जोर की आंधी चला दी। इससे बुढ़िया ने गाय को घर के अंदर बांध लिया। सुबह होने पर उसने गाय के सोने के गोबर को देखा, तो उसके आश्चर्य की सीमा ना रही। अब वह गाय को भीतर ही बांधने लगी। उधर पड़ोसन ने ईर्ष्या से राजा को शिकायत कर दी, कि बुढ़िया के पास राजाओं के योग्य गाय है, जो सोना देती है। राजा ने यह सुन अपने दूतों से गाय मंगवा ली। बुढ़िया ने वियोग में, अखंड व्रत रखे रखा। उधर राजा का सारा महल गाय के गोबर से भर गया। राजा ने रात को उसे स्पने में गाय लौटाने को कहा. प्रातः होते ही राजा ने ऐसा ही किया। साथ ही पड़ोसन को उचित दण्ड दिया। राजा ने सभी नगर वासियों को व्रत रखने का निर्देश दिया। तब से सभी नगरवासी यह व्रत रखने लगे। और वे खुशियों को प्राप्त हुए. रविवार के व्रत के विषय में यह कहा जाता है कि इस व्रत को सूर्य अस्त के समय ही समाप्त किया जाता है। अगर किसी कारणवश सूर्य अस्त हो जाये और व्रत करने वाला भोजन न कर पाये तो अगले दिन सूर्योदय तक उसे निराहार नहीं रहना चाहिए। अगले दिन भी स्नानादि से निवृत होकर, सूर्य भगवान को जल देकर, उनका स्मरण करने के बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।

आचार्य राधाकान्त शास्त्री

आचार्य राधाकान्त शास्त्री

आचार्य राधाकान्त शास्त्री, बेतिया, प. चम्पारण, बिहार, भारत।

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