राकेश मिश्रा के फेसबुक स्टेटस को लेकर सवाल खड़ा करना क्या यही लोकतंत्र है ? श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू | इस देश में विकास, रोजगार, बिगडती शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, पिछडती उद्योग व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था और भी देश से सम्बद्ध बातों या मुद्दों पर आजकल न तो सरकार की नजर जाती है और न ही देश के प्रमुख अंग सूचना एवं संचार को इसकी आवश्यकता नजर आती है । क्योंकि इससे परे हमारे संचार माध्यम तो आजकल फेसबुक से समाचार और सेेंसेशन खोज रहे हैं क्योंकि अब देश से सम्बन्धित कोई मुद्दा तो रह नहीं गया है । यह सभी जानते हैं कि सूचना एवं संचार जगत का मुख्य उद्देश्य होता है पक्षपातरहित सूचना या समाचार का सम्प्रेषण ।

पर अगर बारीकी से खंगाला जाय और खोज की जाय तो प्रायः नेपाल के संचार माध्यम में इस उद्देश्य की कमी नजर आती है । इतना ही नहीं आजकल संचार माध्यम को तो सामाजिक संजाल फेसबुक (जिसकी विश्वसनीयता पर अक्सर शक जताया जाता है) में भी ताकझाँक करने की आदत होती जा रही है । जबकि फेसबुक एक ऐसा सामाजिक संजाल है जहाँ विचारों को अभिव्यक्त करने की छूट होती है । बड़े बड़े नेताओं को मंच मिलता है, पर आम जनता के लिए फेसबुक ही उसका मंच है, जहाँ वह अपने विचारों का बैखौफ रखना चाहता है । वह विचार चाहे असंतुष्टि का हो या संतुष्टि का, सरकार की नीति या नेताओं से सहमति या असहमति का हो फेसबुक यूजर उसे अपने फेसबुक वाल पर व्यक्त करता है ।

हम सभी जानते हैं कि नेपाल लोकतंत्र की राह पर कदम बढा चुका है । इसकी शुरुआत संविधान निर्माण के साथ हो चुकी है । पर यह भी यह जग जाहिर है कि वर्तमान संविधान अपनी कई कमियों और कमजोरियों की वजह से देश के एक हिस्से को अपनेपन का अहसास नहीं कर पाई है । संविधान संशोधन को लेकर मधेश आन्दोलनरत था और आज भी है । मधेश का एक तबका ऐसा है जो चुनाव को आज भी स्वीकार नहीं कर पाया है । आज भी सीके राउत जैसे संगठन मत बदर का अभियान चलाए हुए है, जिसका असर स्थानीय निकाय के चुनाव में भी दिखा । मत देने या न देने का अधिकार जनता का है । वो किसे चुने यह उसका अधिकार है । मतपत्र में एक कालम ऐसा भी होना चाहिए जहाँ जनता अगर उसकी पसन्द का कोई नेता या पार्टी नहीं है तो अपनी असहमति जता सके । पर ऐसा तो है नहीं, तो यह असंतोष जनता कई बार अपने फेसबुक वाल पर जताती रही है । अब इस वाल पर व्यक्त विचारों को किसी की नौकरी या संस्था से जोडकर उसके व्यक्तित्वहनन की जो कोशिश आजकल हो रही है वह अति निन्दनीय है । कहीं किसी संस्था से आबद्धता आपके विचारों और अभिव्यक्तियों को गिरवी नहीं रख लेती । हम अपने व्यक्तिगत वाल पर स्वतंत्र हैं ।

परन्तु यह कितनी दुर्भाग्य की बात है कि किसी के फेसबुक वाल का फोटो शॉट लेकर आप किसी का चरित्रहनन कर रहे हैं । किसी के व्यक्तिगत विचारों को जो वो अपने फेसबुक वाल पर रखता है और जिसे उसने खुद पब्लिक नहीं किए हुआ है, उसे किसी पत्रिका या सम्पादक को सार्वजनिक करने का हक किसने दे दिया ?

( रिपब्लिका दैनिक में वि.सं. २०७४ मार्गशीर्ष १४ गते डी.आफ.आई.डी. (डिफिड) में कार्यरत राकेश मिश्र के बारे में एक समाचार प्रकाशित है । समाचार में उल्लेखित विषयवस्तु, पात्र और उनके मौलिक अधिकार के सम्बन्ध में आपसे कुछ पूछने को मन किया, इसीलिए यह पत्र लिख रहा हूं । उक्त समाचार में राकेश मिश्र के ऊपर आरोप है कि वह फेशबुक के जरिए चुनाव विरोधी गतिविधि में सक्रिय हो रहे हैं । रक्षाराम हरिजन के पत्र से )

कुछ दिनों पहले सजिलो खबर ने एक युटयूब के जरिए मोहना अँसारी जी के उपर कीचड़ ही नहीं उछाला बल्कि उनके चयन पद्धति को लेकर पूरी निकाय को सवाल के कटघरे में खड़ा कर दिया था पर उस लेखक से कोई सवाल जवाब नहीं किया गया । आज राकेश मिश्रा के फेसबुक स्टेटस को लेकर सवाल खड़ा किया जा रहा है । क्या यही लोकतंत्र है जिसे हम व्यवहार में ला रहे हैं ? क्या इस बात से यह नहीं समझा जाय कि यह सब प्रायोजित है ? देश के सबसे महत्तपूर्ण निकाय सूचना एवं संचार माध्यम से ऐसे गैरजिम्मेदाराना व्यवहार की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती । इसके स्पष्टीकरण की आवश्यकता है क्योंकि यह सवाल देश की आम जनता का है जो स्वतंत्र है और देश से आबद्ध किसी भी संगठन, नेता, योजना या फिर सरकार ही क्यों ना हो उससे सवाल करने का उसका अधिकार होता है और जवाब लेना भी ।

 

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