राकेश मिश्र संबंधी समाचार के बारे में रिपब्लिका के सम्पादक घिमिरे को एक पत्र

              रक्षाराम हरिजन/लेखक

सम्पादक श्री सुभाष घिमिरे जी,

कुछ साल पहिले, आप कसमस विश्वकर्मा के बदले ‘रिपब्लिका’ दैनिक में सम्पादक के रुप आए थे, उस वक्त पाठकों को जानकारी दिया था कि आपने संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित हावर्ड केनेडी स्कुल से शिक्षा प्राप्त किया है । तसर्थ हम आशावादी हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका में जो संविधान है, उसमें किया गया प्रथम संशोधन के बारे में भी आप को पता है । संयुक्त राज्य अमेरिका में अभी जो संविधान है, उसके अनुसार वहां की कांग्रेस कोई भी इसतरह का कानून नहीं बना सकती, जिसके चलते आम नागरिक की मौलिक अधिकार हनन हो । अर्थात् नयां धर्म की स्थापना, धर्म की स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग, वाक स्वतन्त्रता में हर नागरिक खुला होते हैं । इसीतरह यहां संचार में प्रतिबन्ध और शान्तिपूर्ण सभा–सम्मेलन में रोक लगाना भी संवैधानिक रुप में बर्जित है । हर नागरिक संवैधानिक और कानुनी रुप में न्याय पाने के लिए योग्य होते हैं । स्वतन्त्र विश्व के लिए यह आधारभूत मान्यता और विषय भी है । हो सकता है कि हम में से कई लोग इस दुनियां के सारे खबरों से बेखबर हैं । लेकिन नेपाल भी विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय संधी–सम्झौता, मानव अधिकार–सन्धी के पक्षधर अथवा हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्र है, जिसके चलते हमें भी मानव अधिकार को संरक्षण, स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी विचार व्यक्त करने का अधिकार है । और मानव अधिकार को अनिवार्य सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी भी बनती है ।
रिपब्लिका दैनिक में वि.सं. २०७४ मार्गशीर्ष १४ गते डी.आफ.आई.डी. (डिफिड) में कार्यरत राकेश मिश्र के बारे में एक समाचार प्रकाशित है । समाचार में उल्लेखित विषयवस्तु, पात्र और उनके मौलिक अधिकार के सम्बन्ध में आपसे कुछ पूछने को मन किया, इसीलिए यह पत्र लिख रहा हूं । उक्त समाचार में राकेश मिश्र के ऊपर आरोप है कि वह फेशबुक के जरिए चुनाव विरोधी गतिविधि में सक्रिय हो रहे हैं ।
घिमिरे जी ! सर्वप्रथम, आप उनके फेशबुक फ्रेण्ड नहीं हैं, तो आप को उनकी व्यक्तिगत विचार कैसे पता चला ? दूसरी बात, आपने जिसकी फेशबुक स्टेटस को साभार किया है, क्या संबंधित व्यक्तिसे आपने अनुमति लिया है ? जहांतक मुझे पता है– मिश्रके फेशबुक प्रोफाइल में उनके सिमित फ्रेण्ड और परिवार के सदस्य ही पहुँच रखते हैं, उसमें से आप नहीं हैं । यहां आशंका की जा सकती है कि आपने सूचना प्राप्ति के लिए उनके फेशबुक को ही ह्याक तो नहीं किया ? क्योंकि फेसबुक, टविटर की तरह नहीं है, जहाँ हर सूचना संबंधित व्यक्तियों की इच्छा विपरित सार्वजनिक हो सकता है । फेसबुक को नितान्त व्यक्तिगत भी बनाया जा सकता है, सिमित व्यक्तियों में सूचना आदान–प्रदान भी किया जा सकता है । इसीलिए सम्पादक जी, कहीं आपने आपने सम्वादताओं को नागरिकों की व्यक्तिगत सूचना सम्प्रेषण के लिए निर्देशन तो नहीं दिया है ? और उसके लिए आप जासुसी संयन्त्र तो परिचालित नहीं कर रहे है ? मुझे विश्वास है कि हावर्ड केनेडी स्कुल ने दूसरों की गोपनियता हनन् करने के लिए आप को नहीं सिखाया है ।
समाचार प्रकाशित करने से पूर्व आप को कैसे पता चला कि आपने जिसके बारे में लिखें हैं, वह डिफिड में कार्यरत राकेश मिश्र ही हैं ? क्योंकि आप उनके फेशबुक फ्रेण्ड नहीं है । वहां तो उनके प्रोफाइल पिक्चर भी नहीं है, न ही उक्त एकाण्ट भेरिफाइड ही है । इस तरह की पृष्ठभूमि में आप कैसे सुनिश्चित हो सकते हैं कि वह व्यक्ति डिफिड में कार्यरत राकेश मिश्र ही है ? सम्पादक जी, आज हम जो डिजिटल विश्व में जी रहे हैं, इसके बारे में आप अनभिज्ञ हैं, इसमें कई आशंका किया जा सकता है ।
क्योंकि इन्टरनेट में सर्च करने पर वहां दो दर्जन से ज्यादा राकेश मिश्र नाम के फेशबुक एकाउन्ट मिल जाता है । लेकिन आपने जो राकेश मिश्र को आरोपित कर रहे हैं, क्या वह वहीं हैं ? और जिसके ऊपर आपने गम्भीर आरोप लगाए हैं, इसके संबंध में वह क्या कहते है ? आपने पूछा ? नहीं । समाचार पढ़ने पर पता चलता है कि आपने तो आरोपित पक्ष को उनके विचार के लिए कोई भी अवसर नहीं दिया हैं । क्या ऐसा करना पित–पत्रकारिता नहीं है ? सम्पादक जी, इसीसे पता चलता है कि आप अपनी पदीय गरीमा को दुरुपयोग कर रहे हैं । और मीडिया को दुरुपयोग कर अपने व्यक्तिगत विरोधी के ऊपर विष–बमन कर रहे हैं ।
समाचार पढ़ने पर आपके ऊपर दया भाव पैदा हो जाती है । क्योंकि आपके अनुसार मिश्र ने नेताओं को ‘बास्टर्ड’ कह कर गाली दिया है, लेकिन आपने उस परिवेश को पूरी तरह अनदेखा किया है । यहाँ मुझे फ्रैकलिन डि रुजवेल्ट की कथन याद आती है । शितयुद्ध के समय में निकारागुवा के तत्कालिन राष्ट्रपति समोजा डिवेल के बारे में रुजवेल्ट के सचिव ने कहा था– ‘उव बास्टर्ड है ।’ अपने सचिव के कथन पर प्रतिक्रिया देते हुए रुजवेल्ट ने कहा था– ‘हां वह बास्टर्ड हैं, लेकिन हमारे बास्टर्ड है ।’ आपने भी संयुक्त राज्य अमेरिका में अध्ययन किया है । सम्पादक जी ! लेकिन आप को इतनी छोटी–सी बात भी समझ में नहीं आ सकी, मुझे खेद है ।
समाचार की शीर्षक को ही देखिए, जिसका आशय है कि राकेश मिश्र द्वारा संचालित फेशबुक और उनके विचार के कारण डिफिड ने माफी मांग लिया है । सम्पादक जी, क्या आप को शासन–विज्ञ के बारे में पता है ? कोई भी सरकारी कर्मचारी, राजनीतिज्ञ अथवा शासन प्रणाली में आवद्ध व्यक्तियों के व्यक्तिगत विचार के कारण किसी को भी पेशागत कार्य को प्रभावित नहीं किया जाता । आप को पता होना चाहिए कि डिफिड में जो वरिष्ठ अधिकारी होते हैं, वह निर्वाचित अथवा राजनीतिक रुपसे नियुक्त नहीं होते हैं । तसर्थ उन लोगों की निजी विचार सार्वजनिक खबरदारी का विषय ही नहीं बन सकता । अगर कोई अपनी व्यक्तिगत कुण्ठा फेशबुक के जरिए अभिव्यक्त करना चाहते हैं, तो क्या यह जायज नहीं हो सकता ?
सम्पादक जी ! यहां सिर्फ एक व्यक्ति का सवाल नहीं हैं । यहां तो कई व्यक्तियों के इस तरह बदनाम करने का प्रयास हो रहा है, जो श्रृंखलावद्ध रुप में जारी है । इससे पहले राष्ट्रीय मानवाअधिकार आयोग की प्रवक्ता तथा माननीय सदस्य मोहना अन्सारी के बारे में भी ऐसा ही हुआ था । मोहना अन्सारी के संबंध में एस.डि.सी. द्वारा निर्मित वृत्तचित्र के कारण उन को विवाद में लाया गया । इसमें वह व्यक्ति शामील है, जो अपने इष्ट–देवता की पूजा करते वक्त हो अथवा अपनी सन्तती के नामाकरण करते वक्त, विदेशी दातृ निकायों की आशिर्वाद चाहते हैं । ऐसे लोग ही आज माननीय मोहना अन्सारी संबंधी प्रसंग को लेकर दातृ निकाय के ऊपर कारवाही करने की मांग कर रहे हैं । उन लोगों की इस तरह की हरकत विभिन्न पत्रिपत्रका से लेकर सामाजिक संजाल तक दिख रहे हैं । सत्ता के पुजारी के लिए आज राकेश मिश्र मिल गया है । दातृ निकाय से जो रकम प्राप्त हो रहा था, उसमें कुछ खास व्यक्तियों ने किस तरह दुरुपयोग किया है, अब वह सामने आ रहा है । खूद को मूलाधार की संचार माध्यम कहनेवाले सञ्चार माध्यम आज किस तरह समाचार को तोड़मतोड कर जनता को गलत सन्देश प्रवाह करने की प्रयास करते हैं, वह भी सामने आ रहा है । इस तरह प्रकाशित समाचार के संबंध में कहां की जनता किस तरह समझ रहे हैं, वह भी धिरे–धिरे समझ में आ ही जाएगा । लेकिन एक बात तो तय है कि इस तरह समाचार प्रकाशित कर सिमान्तकृत समुदाय की आवाज को मिटाने का प्रयास कथित मूल धार के सञ्चार माध्यम कर रहा है । लेकिन यह प्रयास सिर्फ प्रयास ही रहेगा, सफल होनेवाला नहीं है । लेकिन आप को पता होना चाहिए कि इस तरह के समाचार के कारण कुछ खास समुदाय और सिमान्तकृत नागरिकों में राज्य और सत्ता के प्रति वितृष्णा पैदा भी हो सकता है ।

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