राजतन्त्र वापसी की संभावना नहींं

नेपाली जनता की निगाह भारत के चुनाव पर टिकी हर्ुइ है । सभी अपने-अपने हिसाब से विश्लेषण कर रहे हैं । इसी सर्न्दर्भ मेंे काँग्रेस सभासद श्री डा. अमरेश कुमार ंसिह जो भारतीय मुद्दों के जानकार माने जाते हैं, के समक्ष कुछ महत्वपर्ूण्ा मुद्दों पर बातचीत हर्ुइ जिसका अत्यन्त स्पष्टता और सुलझे हुए अंदाज में सभासद डा. अमरेश ने जवाब दिया । बातचीत का सार यहाँ प्रस्तुत है-

dr.amresh kumar singh

श्री डा. अमरेश कुमार ंसिह

० भारत में हो रहे चुनाव का नेपाल या नेपाली जनता पर क्या प्रभाव पडÞेगा –
मुझे नहीं लगता कि इस चुनाव से नेपाल या नेपाली जनता पर कुछ अनपेक्षित प्रभाव पडÞने वाला है । हमारी जिज्ञासा अवश्य है इस चुनाव को लेकर लेकिन हम किसी जादर्ुइ परिवर्तन की अपेक्षा नहीं कर रहे हैं ।
० भारत के नए प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को देखा जा रहा है, उनका प्रधानमंत्री बनना नेपाल के लिए क्या मायने रखता है –
सरकार किसी की भी बने और प्रधानमंत्री पद पर कोई भी व्यक्ति विशेष आए, उनके लिए राजनीतिक स्तर पर कोई धारणा नहीं बनाई जा सकती क्योंकि भारत नेपाल का रिश्ता सिर्फराजनेताओं के आधार पर नहीं है । भारत में एक सिस्टम के तहत विदेश नीति बनती है, जिसमें सुरक्षा निकाय, विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, राजदूतावास इन सबकी सहभागिता रहती है । यह उनकी सुरक्षा का मामला है जिसके प्रति वो सजग होते हैं, ऐसे में कोई भी राजनेता किसी भी विदेश मसले पर अपनी व्यक्तिगत विचारधारा लागु नहीं कर सकता और न ही उसपर हाथ डालना चाहेगा । इसलिए मोदी जी के आने से भी मुझे नहीं लगता कि कोई खास प्रभाव पडÞने वाला है ।
० मोदी के आने से राजतंत्र या हिन्दुवादी र्समर्थक में काफी उत्साह नजर आ रहा है, इस सर्न्दर्भ में आपकी क्या राय है –
यह सच है कि मोदी हिन्दुवादी नेता के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन मैं फिर कहूँगा कि किसी भी दूसरे राष्ट्र के मामले में कोई भी राजनेता हस्तक्षेप नहीं करना चाहेगा क्योंकि इससे उसकी और उसके देश की छवि पर असर पडÞ सकता है । हाँ यह मैं मानता हूँ कि, मोदी के आने से आंशिक असर पडÞ सकता है क्योंकि, उनका अपना नजरिया है, पर इसका यह अर्थ तो बिल्कुल नहीं है कि नेपाल में फिर से राजतंत्र आ जाएगा, यह सोचना गलत होगा । यह धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की राह पर चल पडÞा है जहाँ से पीछे लौटने की तो बिल्कुल सम्भावना नहीं है । अगर कोई छोटी-मोटी पार्टियाँ यह दावा कर रही है तो यह मात्र उनके दिमाग की उपज है । बन्द कमरे में दावा करने से कुछ नहीं होता है, नहीं इतनी हिम्मत और हिमाकत किसी में है । फिर किसी भी परिवर्तन के लिए बहुमत की आवश्यकता होती है, देश की आन्तरिक व्यवस्था और प्रजातांत्रिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है । इसलिए यह सिर्फएक कपोल कल्पना है ।
० भारत और नेपाल के सम्बन्धों पर हमेशा सवाल उठता आया है, आप इस सम्बन्ध में क्या सोचते हैं –
मैं अन्तर्रर्ाा्रीय सम्बन्धों का विद्यार्थी रह चुका हूँ, इस नाते मैं स्पष्टता के साथ यह कहना चाहता हूँ कि भारत और नेपाल के सम्बन्ध कभी अच्छे रहे ही नहीं हैं । यह भी सच है कि इसमें समस्या नेपाल की तरफ से ही ज्यादा है । सिर्फकहने के लिए भारत और नेपाल के सम्बन्ध अच्छे हैं क्योंकि, अगर यह सम्बन्ध अच्छे होते तो क्या भारत नेपाल को इतना नजरअंदाज करता – अगर राष्ट्रीयता की यही परिभाषा रही तो सम्बन्धों में कभी सुधार नहीं आएँगे । भुटान एक छोटा सा देश है और नेपाल उससे कहीं ज्यादा बडÞा, फिर भी नेपाल को जहाँ भारत महज ४ सौ करोडÞ का अनुदान देता है वहीं भूटान को १६ सौ करोडÞ का अनुदान मिलता है । अफगानिस्तान को ३ हजार करोडÞ मिलता है । नेपाल के साथ राजनीतिक सम्बन्ध अच्छे नहीं होने के कारण ही तो अनुदान की राशि नहीं बढर्Þाई जा रही है । अगर भारत नेपाल पर ध्यान देता तो आज यहाँ हाइड्रोपावर की स्थापना हो गई होती, यहाँ की स्थिति इतनी बदतर नहीं होती । नेपाल के कोई भी राजा या कोई भी पार्टर्ीीारत से अच्छे सम्बन्ध बना ही नहीं पाई ।  मैं तो यह मानता हूँ कि नेपाल का भारत और चीन दोनों से अच्छे सम्बन्ध नहीं हैं । नेपाल इन दोनों समृद्ध देशों के बीच अवस्थित है पर इसे कभी भी इस बात का फायदा ही नहीं मिला । नेपाल एक पर्यटकीय देश के रूप में स्थापित होता और अगर चीन और नेपाल की एक प्रतिशत जनता यहाँ पर्यटक के रूप में आती तो यहाँ इतनी गरीबी ही नहीं होती न इतनी बेरोजगारी ही होती । यहाँ की अर्थव्यवस्था मजबूत हो गई होती । नेपाल दोनों देशों को दिखाने के शान में आर्थिक रूप में बर्बाद हो गया । मैं किसी आग्रह दुराग्रह के तहत बात नहीं कर रहा हूँ, मैं तो इस सर्न्दर्भ में किसी से भी खुली बहस करने को तैयार हूँ ।
० भारत में अगर सत्ता परिवर्तित होती है तो मधेश पर इसका क्या असर पडÞेगा –
कुछ नहीं, क्योंकि मधेश अगर नेपाल की प्राथमिकता नहीं है तो वह किसी भी देश के लिए प्राथमिक नहीं हो सकता है ।  भारत ने अब तक मधेश के लिए किया ही क्या है – न तो वहाँ कोई बडÞी परियोजना है उनकी और न ही कोई विशेष दृष्टि । जब पहाडÞ पर कुछ परियोजना करता है तो थोडÞा मधेश में कर देता है । अगर आपको लगता है कि भारत मधेश पर कुछ ज्यादा मेहरबान है तो ऐसा कुछ नहीं है । मधेश जब नेपाल में मजबूत होगा तभी वह भारत की निगाह में भी आएगा । इसलिए मधेश को अपनी स्थिति पहले नेपाल में ही मजबूत करनी पडÞेगी ।
० खुली सीमा के विषय में आपकी क्या सोच है –
सीमा पर दिन-ब-दिन कडर्Þाई बढÞती जा रही है । जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था क्योंकि, इसका असर सीधे मधेश की आर्थिक स्थिति पर पडÞता है । पहले जहाँ मधेश के सीमावर्ती क्षेत्र में शादियाँ हुआ करती थीं आज पहले की अपेक्षा ये रिश्ते कम हो रहे हैं । इसके कई कारण हैं, पहले माओवादियों के कारण ऐसा हुआ फिर आर्थिक स्थिति में निरन्तर ह्रास के कारण ऐसा हो रहा है, आवागमन की असुविधा भी इसका एक कारण है । असमानता बढÞती जा रही है । पहले छात्र आसानी से भारत में अध्ययन किया करते थे पर आज उसमें भी कठिनाई है । निरन्तर स्थिति गम्भीर हो रही है ।
० नेपाल को लेकर भारत कितना गम्भीर है –
मुझे लगता है कि हम भारत को लेकर जितने जिज्ञासु होते हैं वह स्थिति भारत की नहीं है । वह यहाँ की किसी भी घटना पर ज्यादा फोकस नहीं करती । हम वहाँ की हर छोटी-बडÞी घटना पर नजर रखते हैं, किन्तु वहाँ ऐसा माहौल नहीं है । मैं भारत में लम्बे समय तक रहा हूँ और मैंने वहाँ यही देखा है कि, उनकी जिज्ञासा चीन को लेकर होती है, पाकिस्तान को लेकर होती है, अमेरिका को लेकर होती है । नेपाल इसमें कहीं नहीं होता ।
अंत मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि भारत में सत्ता परिवर्त्तन का नेपाल पर कोई खास असर नहीं पडÞने वाला, हाँ आंशिक रूप में असर पडÞ सकता है, किन्तु ऐसा नहीं है कि कोई बडÞा बदलाव हो जाएगा । जो सदियों से जैसा है, वैसा ही रहेगा । धन्यवाद ।
प्रस्तुतिः डा श्वेता दीप्ति

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