राजनीतिक जोड़–तोड़ और गठबन्धन की कोशिश जारी है

श्वेता दीप्ति, हिमालिनी, अक्टूबर अंक । संसद विघटित हो चुका है और भूतपूर्व साँसद एक बार फिर से जनता के बीच जाने की तैयारी में हैं । दो नम्बर प्रदेश के चुनाव के साथ ही जहाँ स्थानीय चुनावों की सरगर्मी समाप्त हुई, वहीं आगामी संसद एवं प्रान्तीय निर्वाचन की तैयारी रंग पकड़ने लगी है और इसके साथ ही राजनीतिक जोड़–तोड़ और नीतिविहीन गठबन्धनों का व्यापार जोर–शोर से शुरु है । एक दूसरे को गाली देने वाले आज गले लगने को तैयार हैं, जिसकी वजह साफ है “ऐन–केन– प्रकारेण” सत्ता प्राप्ति की कोशिश । जनता के लिए लुभावने वादे और रंगीन सपने तथा प्रत्याशियों के लिए जिन्दगी भर की शानोशौकत की राह तय करने के लिए ही चुनाव की प्रक्रिया सम्पन्न होती है, यह आम धारणा बनती जा रही है । क्योंकि, भंग हुए संविधान सभा को उपलब्धि से अधिक सत्ता बँटवारे, साँसदों की सुविधाओं में बढोत्तरी और आवश्यकता से अधिक मंत्रीमण्डल के गठन के लिए ही जनता याद करेगी और याद करेगी रक्ताम्भ संविधान जारी करने के लिए भी । बावजूद इसके चुनाव की प्रक्रिया एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जिसमें हर सजग नागरिक को हिस्सा लेना ही होता है, चाहे उनके सामने वही घिसे पिटे वादे करने वाले चेहरे ही क्यों ना हाें । फिर भी हमें याद करना होगा विवेकानन्द की इस उक्ति को, जिसमें उन्होंने कहा था कि, ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से ही हमारी हैं, वो हमीं हैं जो अपनी आँखों पर हाँथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है ! इसलिए आँखों पर हाथ रखकर अन्धेरे का भ्रम नहीं पालना है, बल्कि अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना है और सही चयन करना है ।
त्योहारों का मौसम समाप्ति की ओर है, पर लोकतंत्र का महापर्व हमारे समक्ष है, जिसे हम अपनी सजगता और चेतनशीलता से ही परिपूर्ण कर सकते हैं । इस महापर्व के हवनकुँड के लिए समिधा है, जनता का बहुमूल्य मत । जनता को अपने बहुमूल्य मत की कीमत को समझना होगा और देश के विकास की राह प्रशस्त करनेवालों का चुनाव करना होगा । हालाँकि यह एक कठिन कार्य है, क्योंकि जनता के समक्ष विकल्प की कमी है । फिलहाल तो जनता अपने प्रतिनिधियों के ऊपर नजर रखे हुए है, जो हर रोज एक नया हाथ और नया साथ तलाश कर रहे हैं । सम्पादकीय

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