राजनीतिक निकास और संवैधानिक प्रश्न:श्रीमन नारायण

राजनीति में ‘सहमति’ शब्द कर्ण्र्ाा्रय होता है, पर लोकतन्त्र में सहमति ढूंढना सहज नहीं। इस rambaran yadavअसहज या असम्भव की प्राप्ति की उम्मीद में देश के राष्ट्रपति को भी लग जना समझ से परे है। हकीकत में अनेकों असहमतियों का विधिसम्मत व्यवस्थापन करना ही सहमति है। पर आर्श्चर्य, नेपाल में विधि निर्माण के लिए नहीं, इसे तोडÞने के लिए सहमति के प्रयास होते हैं। अब तक के हालात तो यही बयान कर रहे हैं। यह प्रवृति उसी समय से शुरु है, जब से अन्तरिम संविधान में ही ‘सहमति’ शब्द को संवैधानिक जामा पहनाया गया। यह अलग बात है कि तथाकथित सहमति की प्रक्रिया दो महिने तक भी बरकरार नहीं रही तथा राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के चुनाव के दरम्यान संविधान में संशोधन करना पडÞा।
राजनीतिक गतिरोध से उत्पन्न नेपाल का संक्रमणकाल संवैधानिक होते सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक गतिरोध तक बढÞ चुका है। महज राजनीतिक सहमति से ही इसका निराकरण सम्भव नहीं है। नेपाल में लोकतन्त्र के लिए सहमतीय पद्धति खुद में एक आत्मघाती प्रयोग ही अब तक साबित हुआ है। इतिहास के किसी कालखण्ड में पंचायती शासन में र्’र्सवसम्मति’ का सिद्धान्त लागू हुआ था, तीस साल के बाद अन्तरिम संविधान में फिर से इसे ग्रहण किया गया परन्तु सहमति की प्रणाली से क्या बदलते हालात में भी नैतिक, राजनीतिक, कानूनी, न्यायिक, मान्यताएं एवं परम्परागत अभ्यास और विधि की प्रक्रिया में प्रवेश किए बगैर अब तो गतिरोध हटने की सम्भवना क्षीण होती जा रही है।
सवाल संविधानसभा की पर्ुनर्बहाली और नये निर्वाचन का नहीं है। सवाल डा. बाबुराम भट्टर्राई सरकार रहेगी या नहीं, इसका भी नहीं, प्रश्न संवैधानिक सर्वोच्चता का है। अगर हमने मनसा, कर्मणा एवं वाचा संविधान की सर्वोच्चता को स्वीकार किया है तो कुछ खास सियासी दलों के अन्य नेताओं की आपसी सहमति को क्या चुनौती नहीं दिया जा सकता – देश का संविधान प्रचण्ड, खनाल, नेपाल, कोइराला, यादव या गच्छदार को नहीं पहचानता है। अगर हम संविधानवाद को मानते हैं तो बन्द कमरे में कुछ दल के नेता क्या करते हैं, या बोलते है – यह कोई मायने नहीं रखता। संविधान के अक्षर क्या कहते हैं, यह महत्वपर्ूण्ा बात है। इस बावत अन्तरिम संविधान ने अधिकार प्रत्यायोजन किये गए संविधान सम्मत निकाय, संस्था एवं अंग का ही पहले अग्रसर होना जरुरी है। विधायकी अंग की भौतिक उपस्थिति एवं अस्तित्व न करने की अवस्था में देश का संविधान, पहल कामचलाऊ सरकार, फिर राष्ट्रपति और सर्वोच्च अदालत को पहचानता है। यथार्थ में देश के सियासी गतिरोध को दूर करने की जिम्मेवारी भी इन्ही तीन पर है। इन सभी को मान्य हो सके, यह उपाय ढूंढने का काम सर्वोच्च अदालत ही कर सकती है। यह अपने संवैधानिक दायित्व को न तो दूसरों के सिर मढÞ सकते है, ना ही किसी को दे सकते है।
संविधान सभा का भंग, निवर्तमान व्यवस्थापिका संसद एवं सर्वोच्च अदालत के द्वारा सुझाए गए मार्गचित्र के अनुसार हुआ। अगर सर्वोच्च अदालत ६ माह पर्ूव ही संविधान सभा की अवधि को फिर से नहीं बढÞाने के लिए सख्त आदेश जारी नहीं किया होता तो कथित सहमति का यह खेल विभिन्न नेताओं के घर में हो रहा होता। संविधानसभा के विघटन के बाद देश के अरबों रुपये बच तो रहे हैं। देश के संविधान अनुसार संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति हैं, इसकी व्याख्या करने वाला सर्वोच्च अदालत है जबकि कार्यान्वयन का दायित्व सरकार पर है। भले ही तीनों के काम, कर्तव्य एवं अधिकार अलग-अलग ढंग से परिभाषित किए गए है परन्तु संक्रमणकाल में इनकी भूमिकाएं विशेष हो जाती हैं। सहमति के नाम पर संविधान और कानून की सीमा का उल्लंघन कर कुछ सिमित लोगों के मौखिक आदेश मुखरित होना, संवैधानिक सर्वोच्चता की अवज्ञा एवं लोकतान्त्रिक प्रणाली के साथ मजाक करना है।
राष्ट्रपति को देश का सर्वोच्च पदाधिकारी एवं सेना के परमाधिपति के रुप में संविधान में ही स्थापित किया गया है। किसी भी देश का संविधान अगर आगे के मार्ग सही ढंग से दिखाना बन्द कर देता है तो राष्ट्रपति का अधिकार स्वतः क्रियाशील होता है, यह इमरजेन्सी लाईट की तरह है, जो बिजली के आजाने के बाद खुद बन्द हो जाती है। परन्तु राष्ट्रपति की रचनात्मक भूमिका का अर्थ एक सरकार को हटाकर नयी सरकार का गठन करना नहीं होता है। ऐसे सोचवाले लोग नेपाल में बहुत हैं। ऐसे सोच रखने वाले लोग देश को और अधिक जटिल अवस्था में डाल देना चाहते हैं। राष्ट्र प्रमुख के रचनात्मक भूमिका का अर्थ संविधानवाद एवं संवैधानिक परम्परा को केन्द्रीय भावभूमि में रखकर निदान का प्रयास करना है। इसका अर्थ सहमति  ढूंढना नहीं है। कोई भी राजनीतिक सहमति संविधान के दायरे से बाहर की नहीं हो।
अपनी कमी-कमजोरी एवं असफलताओं पर पर्दा डÞालने के लिए संविधान के बाहर से सहमति या विकल्प ढंूढÞने का प्रयास देश के सियासी दल का है। अगर देश में विधि का शासन है तो किसी नेता विशेष की पसन्द, नापसन्द, विचार या दर्शन से नहीं चल सकता है। सर्वोच्च अदालत को छोडÞ राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, निर्वाचन आयोग या किसी भी अन्य निकाय को संविधान की व्याख्या करने का अधिकार नहीं है। सर्वोच्च अदालत के ही संवैधानिक परम्परा, स्थापित नजीर नयाँ प्रतिपादन होने वाले सिद्धान्त ही कानून होता है। अतः सर्वोच्च अदालत के द्वारा दिखाए गए मार्ग पर ही चलना सभी के हित में होगा। राष्ट्रपति महोदय को भी वर्तमान परिस्थिति में सर्वोच्च अदालत से राय लेनी चाहिए। कुछ दल विशेष के उकसाहट पर उन्हें महत्वाकांक्षी नहीं बनना चाहिए। चीन में एक कहावत है- “भले ही आप हजारों मील दूर चले आए हों परन्तु यदि आप का पहला कदम ही गलत रहा तो आप गन्तव्य तक नहीं पहुँच सकते।’ नेपाल की वर्तमान राजनीति भी इसी हालत में है। संविधान और सर्वोच्च अदालत को तकिया बनाकर सोया जा रहा है तथा सहमति को ढूंढÞने का प्रयास हो रहा है।

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