राजनीतिक संक्रमण के बुरे असर से प्रभावित नेपाली समाज

बाबुराम पौड्याल
नेपाल तकरीवन बीते दो दशक से भी अधिक समय से निरन्तर राजनीतिक संक्रमण ही नहीं झेल रहा बल्कि पारम्परिक उत्पादन प्रणाली और उसके श्रम सम्बन्धों में भारी बदलाव के कारण सांस्कृतिक और सामाजिक संक्रमण के दौर से भी गुजर रहा है । पुराने को छोड़ने और नये को अपनाने में होनेवाली दुविधा की स्थिति को ही संक्रमण कहा जा सकता है । मतलब, पारम्परिक उत्पादन प्रणाली के असपास घूमता मुल्यों का चक्र और नये परिवर्तन से स्थापित होनेवाले मुल्यों के बीच का द्वन्द ही संक्रमण है । संक्रमण, देश की आगे बढ़ने की चाह और उसकी गति का आयाम भी है । परन्तु जिस देश में यह द्वन्द स्वस्थ्य और व्यवस्थित तौर से आगे नही बढ़ पाता वहां दुरावस्था अरसे तक चलता दिखाई देता है । नये उत्पादन सिस्टम, श्रम के साथ उसके रिश्ते और लोगों की जीविका पर पड़नेवाले प्रभाव को आंकलन और संबोधन किये वगैर ही अगर राजनीतिक क्रान्ति सम्पन्न हो भी जाये तो भी उचित परिणाम आने की संभावना बहुत कम होती है । विकास और परिवर्तन के दौरान संक्रमण का होना एक स्वभाविक क्रिया है । लेकिन देश और समाज का लम्बे समय तक इसी स्थिति में जकडेÞ रहना हर किसी भी दृष्टि से घातक है । लम्बे अरसे तक चलनेवाले संक्रमण को झेलने की आदत सी हो जाये और देश के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जेहन में उतर जाये तो बात और भी गंभीर हो जाती है । जनता के चाह के मुताबिक परिवर्तन प्रभावी न हो जाये तो देश को फिर से यथास्थिति में लौटने का खतरा उत्पन्न हो जाता है ।
नेपाल के सन्दर्भ में चाहिए था कि उत्पादन और उसके श्रम सम्बन्धों के बीच के अन्तरविरोधों को सही रूप में पहचान किया जाये और उसे समाधान की दिशा में काम हो । ऐसा न होने पर जनता के सामने सिवा निराशा के कोई विकल्प शेष नहीं बचता । क्योंकि अबतक उसने परिवर्तन और क्रान्ति और उसके नेतृत्व पर विश्वास किया है और बहुत सारी कुर्बानी दी है । परन्तु उसको अब तक बद्हाली के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा । कई उम्मीदों की इमारत जमिंदोज हो चुकी है । असल में ऐसा तब होता है जब बदलाव का मकसद और उत्पादन प्रणाली में श्रम का सम्बन्ध और तद्जनित स्थिति को अनदेखा कर दिया जाता है । इसका विश्लेषण, आम लोगों को सुचित और कार्यान्वयन करने का काम प्रमुख रूप से परिवर्तन में भूमिका निभानेवाले ताकतों और विद्वानों का है । परन्तु यहां इस ओर किसी का ध्यान नहीं है । यही नेपाल की वर्तमान समस्या है ।
किसी भी देश के लिए राजनीतिक संक्रमण का समय बहुत संवेदनशील होता है । इस समय विधि का शासन कमजोर होने की संभावनाएं अधिक रहती है । विधि का कमजोर होने का मतलव है असामाजिक, आपराधिक और मुनाफाखोरी करनेवालों के लिए अनुकूल स्थिति का होना । यह खेमा संक्रमण को लम्बे समय तक रखने के लिए समूची राजनीति को अपनी छतरी के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास करता है । इनकी पैठ सत्ता से सड़क के छोटे बडेÞ आन्दोलनों तक में देखने को मिलता है । ऐसी हरकतों का मतलव है आम लोगों की बुनियादी अधिकाराें को मसल दिया जाना । देश के अर्थतन्त्र में सापेक्षित विकास के बगैर लम्बे समय तक अकेले राजनीति से सम्पूर्णता पाने की सोच आखिरकार उन्हीं असामाजिक, आपराधिक और मुनाफखोरों की सेवा करता है । ऐसे में राजनीति करनेवाले कभी जनता के अपने लगते हैं तो कभी जनता के विरोधियों से सीनाजोरी करते लगते हैं । यह कितना भ्रम है और कितना सच है पहचान करना मुश्किल है । आम लोगों के सामने फिलहाल यही बड़ी समस्या है । फिर भी इतना तो यकीन है कि समस्या और कहीं नहीं राजनीति के आसपास ही है । नेपाली समाज अभी भी जमीन और अविकसित कृषि की उत्पादन प्रणाली और अकुशल श्रम सहभागिता से निर्धारित मुल्यों पर संचालित है । संभवतः इन मूल्यों के अवयवों का सूत्रपात राणाकाल से भी पहले के उत्पादन और श्रम के सम्बन्धों से हुआ था । राणाकाल, पंचायती राजाशाही, संवैधानिक बहुदल और अब गणतन्त्र, कुल मिलाकर डेढ़ सौ से भी अधिक सालों में पांच बार शासनतन्त्र को क्रान्ति के नाम पर सत्तावृत से बाहर फेका जा चुका है । खूनखराबा, आन्दोलन, नेपालबन्द, नाकाबन्दी, निहत्थों पर गोली, सार्वजनिक सम्पत्ति पर तोड़फोड़ और भिन्न विचारवालों पर अत्याचार जैसे वारदातों का अंजाम यह हुआ कि पुरानी जर्जर उत्पादन प्रणाली के अतिरिक्त दण्डहीनता और अराजकता का अम्बार भी जनता के मत्थे चढ़ा दिया गया है । राजनीति और अर्थनीति के बीच की अन्योन्याश्रितता को समझने की कोशिश नेपाल में कभी नहीं की गयी । ऐसे में जनता के नाम पर जो कोई भी जनआन्दोलन और जनक्रान्ति की गाड़ी दौड़ाने का प्रयास करता रहेगा वह जनता को बेवकूफ बनाता रहेगा ।
नेपाल के किस हिस्से में कब से लोगों ने कृषिकर्म को शुरु किया यकीनन कहना कठिन है । मानवशास्त्रियों का मानना है कि पशुपालन से जीवन यापन के समय के बाद ही मानव स्थाई रूप से एक जगह रहना शुरु किया तभी से खेती जीवन के लिए अपरिहार्य बन गया । खेती को बोने सँबारने में जो श्रम लगता था वही अन्तरसंबन्ध के रूप में विकसित हो गया था । प्राचीन नेपाल में संभवतः किरातकाल के बाद ही खेती बाडी का व्यवस्थित अभ्यास शुरु हो गया था । पहाड़ के मुकाबले बहुत पहले हीं गंगा नदी के मैदानी उपजाऊ भूमि पर जब से आबादी की शुरुआत हो गयी थी तब से ही वर्तमान तराई में खेती करना आरम्भ हो गया ।
नेपाल के अधिकांश लोगों का यथार्थ जो भी हो मानसिकता अब भी कृषि पर ही आश्रित है । कृषि के साथ संस्कार और संस्कृति का हमारा गहरा सम्बन्ध है । हमारे त्योहारों और रिवाजों का सीधा सम्बन्ध कृषि व्यवस्था से है । भले ही राजनीतिक सतह पर जाति और कौम के नाम पर भूमि के बटवारे के नारे लगाए जा रहे हैं परन्तु उस पर भी आम लोगों के जीवन को उससे जोड़ने की सोच का अभाव है । पुरातन कृषि के कारण फसलों पर नकारात्मक असर पड़ा है । किसान बीज बोने से उसको सवारने काटने तक लगे श्रम और अन्य आवश्यक चीजों की कीमत तक चुकाने में उत्पादन से असमर्थ होता जा रहा है । कृषि योग्य जमीन की गुणवत्ता का विकास, सिंचाई, आधुनिक प्रविधि का प्रयोग और बाजार प्रबन्धन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर कभी भी गंभीरता से नहीं सोचा गया । नतीजा यह हुआ कि कृषि पुराने ही ढर्रो पर चलती रही । ऐसी स्थिति में श्रम भी वाध्यात्मक बोझ बना और किसानों को अपने कृषिकर्म से विकर्षण पैदा होना स्वभाविक हो गया । इस तरह विस्थापित श्रम को देश में सेवा और औद्योगिकीकरण के विकास के अभाव में खाड़ी और दुनिया के अन्य श्रम बाजार में विस्थापित होना पड़ा है ।
कृषि के प्रति विकर्षण से अब लोगों का पलायन गांव से शहर की ओर तेजी से हो रहा है । कुछ पहाड़ के लोगो का आकर्षण तराई के शहरो के आसपास बढ़ गया है । इस पलायन का सीधा प्रभाव केवल अर्थतन्त्र पर ही नही पड़ा है बल्कि संस्कृति पर भी पड़ा है ।ं सांस्कृतिक सम्पन्नता उन्हीं लोग व समुदायों में होती है जो पीढ़ियों से निश्चित भूमि पर स्थाई रूप से बसोवास करते आ रहे है । नेपाल मेंं सांस्कृतिक रूप से नेवारी और मैथिली संस्कृति को इसलिए सम्पन्न माना जाता है । अपने जमीन के आसपास अपनी फसल की रक्षा हेतु कई देवी देवताओं की पूजा की जाती है । अच्छी फसल के लिए बारिश की आवश्यकता होती है उसके लिए जल के देवता इन्द्र की आराधाना की जाती है । अन्य त्यौहार के समय भी फसल को ताक मे रखकर तय किया गया है । गाँव से लोगों का पलायन से ऐसे सभी रिवाजों को लोप हो रहा है । मतलब गांव की पारम्परिक खुशी को छीना जा रहा है ।
इस संक्रमण का प्रभाव सामाजिक, राजनीतिक में ही नहीं हमारे घर के दहलीज के भीतर भी प्रवेश कर चुका है । पारिवारिक रूप में माँ बाप और बच्चों की नई पीढ़ी के बीच भी जीवन जीने और समझने में बहुत बड़ा फासला दिखाई दे रहा है । जिसके चलते दो पीढ़ियों के बीच समन्वय, समझदारी और पारस्परिकता की गुंजाइश बहुत ढीली पड़ रही है । फलस्वरूप समाज ही नहीं परिवार में भी अन्तरविरोध गहराती दिखाई दे रही है । पिछले दो पीढ़ियों के बीच में जो अन्तरविरोध था उस से कहीं अधिक वर्तमान की दो पीढ़ियों के बीच का अन्तरविरोध तीव्र और गंभीर है । अपने अनिश्चित भविष्य को लेकर निराश नई पीढी को अपने पर ही विश्वास नहीं है तो पुरानी पीढ़ी जो संस्कृति के सहारे जीने को अभ्यस्त होता है, उसके लिए भला कैसे सोच सकता है । नई पीढ़ी का विदेश पलायन का मतलव है हमारे उत्पादन के साथ श्रम का कट जाना जो उसकी सहजता नहीं विवशता है । यह हमारी राजनीतिक विफलता का नतीजा है । दुनिया में बहता वैश्वीकरण का बयार भी नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को बढ़ाने में कारक बना है । देश में ही कृषि के विकल्प में आधार तैयार किए बगैर उसको छोड़ने को बाध्य होने का खामियाजा भुगतने का बुरा वक्त अब हमारे सर पर है ।
वक्त के इस दहलीज से कल को झांकने की कोशिश की जाए तो एक बहुत दर्दनाक स्थिति की तस्वीर दिमाग में आती है । उस के प्रारम्भिक लक्षण तो अभी से ही दिखाई देने लगे हैं । जमीन को बेचकर या फिर कर्जा लेकर विदेशों में गये हमारे कई युवा विदेशों में कमाई करने के वजाये वहीं बद्हाली में जी रहे है । कई तो दर्दनाक मौत का शिकार हो जाते है । कई तो वही रह जाते है । इधर घर में कर्जा का बढ्ता बोझ, बची जमीन पर खेती करने के लिए न तो श्रम उपलब्ध है न बूढेÞ माँ बाप उम्र की लिहाज से परिश्रम करने की स्थिति में होते हैं । अगर किया भी जाये तो उस जमीन के उत्पाद से न ही गुजरबसर का खरचा चल पाता है । उस जमीन को बेचने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता । अब नौबत यहां तक आई है कि बुढ़ापे में लोगों को अपने संतान का सहारा तक नसीब होना मुश्किल होता दिखाई देता है । युवाओं को देश में ही उनकी भविष्य को सुरक्षित करने के लिए राजनीतिक उठापटक नहीं औद्योगिकीकरण, सेवा क्षेत्र मे विकास की आवश्यकता है । इसके लिए वर्तामान में चल रहे संक्रमण का अन्त होना आवश्यक है । नहीं तो नेपाल कुछ साल बाद अकेले वृद्धवृद्धाओं और बच्चों का वासस्थान बन जाने का खतरा है । श्रम से निवृत्त ऐसे लोगों से देश का भविष्य सुखद नहीं हो सकता । जनसाख्यिक हिसाव से संभावित इस असंतुलन को समय रहते ही निपटाने की दिशा में काम करना अब देर हो सकता है ।
राजनीतिक दलों और सचेत नागरिको के लिए यह एक चुनौतिपूर्ण स्थिति है । हरेक बार क्रान्ति का नाम लेकर सामन्तवादी श्रम और उत्पादन प्रणाली के बुनियाद को बदलने का दाव ठोकने वाले, इसे ज्यों का त्यों रखने से बाज नहीं आए । नेपाली युवा अपने पैतृक जमीन पर पुराने तरीके से खेती बाड़ी करना पसन्द नहीं करता । यह अकारण नहीं है । उसने अपने बंजर और सूखी जमीन की उपज को भी गौर किया है । मां बाप को सुबह से देर रात तक काम करते देखा है । जिनकी श्रम को कभी भी अंको में आंकते हुए उसने नहीं सुना । इतने कठिन श्रम के बावजूद भी उनके लिए दो जून की रोटी भी अच्छी तरह नहीं मिलते देखा है, तो उस सन्तान के लिए उस जर्जर परम्परा को अब भी ढोये रहना संभव नही है । व्

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