राजनीतिक संक्रमण से बढ रही हैं समस्याएं

Baburam Paudel

बाबुराम पौड्याल

बाबुराम पौड्याल:आखिरकार दलों द्वारा संविधान बनाने के लिए स्वयं घोषित  समय माघ ८ अर्थात् जनवरी २२ भी दलों के बीच असहमति के चलते विना संविधान के ही निकल चुका है । एमाओवादी और मधेशी मोरचे ने  अनिवार्य रूप से र्सवसम्मति से संविधान बनाने की मांग करते हुये माघ ८ की समय-सीमा को लांघने की रणनीति अपनाई थी तो सत्तापक्षीय गठबन्धन, जिस के पास संविधान पारित करने के लिए आवश्यक दो तिहाई से ज्यादा सदस्य संख्या संविधानसभा में है, ने काफी कोशिशों के बावजूद भी विवादित मुद्दों पर र्सवसम्मति न हो पाने के कारण मतदान के लिए नियम अनुसार प्रक्रिया को आगे बढÞाने के लिए सभामुख पर दवाव डाल रखा था । सभामुख ने विपक्ष के कई दिन के अवरोध के वावजूद भी प्रश्नावली समिति का ऐलान किया । इस लेख को लिखने तक इस प्रस्तावित समिति पर विपक्ष अपने सदस्यों को न भेजने की मनःस्थिति पर है । प्रधानमंत्री कोईराला औपचारिक वार्ता की अपील कर रहे हैं । एमाओवादी के नेतृत्व में मधेशी मोर्चा, संविधानसभा चुनाव को बहिष्कार करने वाली वैध माओवादी और जातिवादी जैसे अन्य छोटे दलों के सप्तरंगी गठबन्धन के भीतर भी दरारें आने लगी हैं । वैद्य माओवादी संविधानसभा से एमाओवादी और मधेशी दलों को बहुत जल्द संविधान सभा से बाहर लाने के उसके मनसूबों पर पानी फेरता देखकर गठबन्धन से बाहर होने की खबर है और कुछ छोटे दल भी आन्दोलन से संविधान बनाने की आवश्यकता को प्राथ्ामिकता देते हुये गठबन्धन छोडÞÞने की खबरे आ रही हैं । इस समय सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच दूरी फिर से बढÞ गई है । परन्तु सभी पक्षों के ऊपर संविधान बनाने के लिए भारी दबाव बना हुआ है । आरोप-प्रत्यारोप के बीच भले ही संवादहीनता की स्थिति है फिर भी संवाद में आने के अलावा दलों के पास दूसरा विकल्प नहीं है ।
इससे पहले १९ जनवरी की आधी रात को संविधानसभा के अन्दर  विपक्षी सभासदों की तोडÞ फोडÞÞ और हाथापाई के दृश्यों को देखकर तो लगा कि हम अभी भी लोकतन्त्र से सैकडÞों साल दूर मध्ययुगीन कबीला जमाने से आगे नहीं बढÞ सके हैं । दाताओं से सहयोग मांगकर खरीदी गई कर्ुर्सर्ीीमाईक और टेलिभीजन तोडÞकर कोई हर समय क्रान्तिकारी कहलाने का हकदार नहीं होता । विरोध के नाम पर नेपाल बन्द का आयोजन और संविधानसभा में एक पक्षीय रूप से हर्ुइ तोडÞफोडÞ ने विपक्षी गठबन्धन विशेषकर एमाओवादी के कद को जरुर धक्का लगा । अब भी जनयुद्धकालीन प्रोपगण्डा का प्रयोग विशेषकर एमाओवादी के लिए प्रत्युत्पादक हो सकता हैं । सिर्फध्वंश करना अपराध है, जब ध्वंश के साथ वैचारिक और भौतिक निर्माण भी साथ-साथ आगे बढेÞ तो उसे क्रान्ति कहा जाता है ।
जनता की मुक्ति के नाम पर दस साल तक चला माओवादी जनयुद्ध और उसके बाद का संयुक्त शान्तिपर्ूण्ा आन्दोलन, मधेश आन्दोलन, जनजाति आन्दोलन, अखण्ड पश्चिमाञ्चल और सुदूर पश्चिमान्चल आन्दोलन के माध्यम से परिवर्तन चाहती जनता को अबतक राजनीतिक जमीनदारी में पिसने के सिवाय और कुछ नसीब नहीं हुआ है । पहली संविधानसभा जो जनआन्दोलनों के तत्काल बाद बनी थी और उसी का प्रतिबिम्ब थी, उसी ने कई सौ सालों से चली आ रही राजसंस्था के नेतृत्ववाले सामन्तवाद का अन्त कर दिया । देश गणतन्त्र हो गया परन्तु सामन्तवाद के जाते-जाते यहां अग्रगमन और प्रतिगमन के नाम पर कई तरह के छोटे बडेÞ सामन्तवादी शक्ति केन्द्र खडेÞ हो गये हैं । जिनका बुनियादी चरित्र गरीब मेहनतकश जनता को अधिकार सम्पन्न करना नहीं बल्कि अबतक की केन्द्रीकृत सामन्तवादी सत्ता को मात्र विकेन्द्रित करना है । विगत में सिंहदरबार की सत्ता द्वारा पालित वर्ग को देश और जनता की खुशहाल भविष्य की चिन्ता से कहीं अधिक घोर क्रान्तिकारी दिखने की फिक्र है । क्योंकि क्रान्ति का बाजार अब आर्थिक वर्गवाद से कहीं अधिक जाति और क्षेत्रों के नाम पर गर्म हो चला है । इसका मकसद मेहनतकश नेपाली जनता की महान एकता जिस ने राणाशाही और राजाशाही को जमीनदोज कर दिया उसे जाति, धर्म और क्षेत्र के नाम पर खण्डित कर कमजोर करना है ।
पिछले आन्दोलनों का उत्तराधिकार का दावा करनेवाली सियासी ताकतों की इन दिनों नेपाल में कोई कमी नहीं है । परन्तु समय रहते उसे संस्थागत करने की दिशा में किसी ने कोई अग्रसरता नहीं दिखाई । क्रान्ति और उसके स्थापन के बीच समय का जो महत्व होता है, उसे नेपाली सियासतदारों विशेष कर क्रान्ति के तरफदारों ने सदा नजरअन्दाज कर दिया है । लम्बे संक्रमणकाल के कारण क्रान्ति की गति में सुस्ती आनी स्वभाविक ही है क्योंकि उसमें बीतते समय के साथ नये अच्छे और बुरे दोनों विचारों का संक्रमण हो जाता है । उस पर भी क्रान्तिकारी कहे जानेवाले शक्तियों के बीच हेा रहे स्वार्थप्रेरित अन्तरद्वन्द्व के चलते वे जितने अलोकप्रिय हो जाते हैं उतना ही घटित क्रान्ति के प्रति आम लोगों में निराशा उत्पन्न हो जाना अस्वाभाविक नहीं  । लम्बे संक्रमणकाल के चलते नेपाल में अब यही सब हो रहा है । वि.सं. २००७ में नेपाल में हुए क्रान्ति के बाद भारत में सम्पर्ूण्ाक्रान्ति के नेता जयप्रकाश नारायण ने नेपाली प्रधानमंत्री वी.पी. कोईराला को समय का महत्व बताते हुये तुरन्त भूमि पर विशेष नीति लाने की सलाह दी थी । उनका मानना था- यह काम बीतते समय के साथ करना असम्भव सा हो जाता है । कोईराला इसे समय पर नहीं कर पाये और यह महत्वपर्ूण्ा काम बाकी रह गया था ।
पहली संविधानसभा जिस गर्मजोशी के साथ बनी थी और उसका जो समीकरण अस्तित्व में आया था, वहीं से अगर संविधान बन गया होता तो व्यवस्थापन पर क्रान्ति का असर स्वाभाविक रूप से पडÞता था । आखिरकार पहली संविधानसभा संविधान दे पाने में असफल हो गई । नेपाली जनता को समृद्ध करनेवाली जादर्ुइ छडÞी के रूप में प्रचारित संविधान सभा ने जिस तूफानी अंदाज में नेपाली राजनीति में प्रवेश किया, उसी अन्दाज में बीतते समय के साथ सुस्त भी पडÞ गई ।  सिर्फगणतन्त्र को छोडÞकर देश और जनता को कुछ खास नहीं मिला । वैसे धर्मनिरपेक्षता को भी कुछ लोग उपलब्धि बताते हैं,  परन्तु वर्तमान प्रधानमंत्री सुशील कोईराला और कांग्रेसी नेता शेखर कोईराला जैसे भी धर्मनिरपेक्षता के सवाल को कहां किसने कैसे संविधानसभा तक पहंुचाया और पारित हो गया, इस बारे में बिल्कुल अनभिज्ञता जाहिर करते हुये आर्श्चर्य भी प्रकट करते पाये जाते हैं । उनका यह भी मानना है कि जनआन्दोलन और उसके आसपास माओवादियों के साथ सम्पन्न किसी भी वार्ता और बातचीत में धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा कभी उठा ही नहीं था ।  कुछ लोग तो यहां तक अट्कलें लगा रहें है कि यूरोपियन यूनियन की ओर से जिस तरह जाति और जनजतियों के नाम सहयोग मिलता रहा, उसी तरह धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में भी मिशनरियों ने नेपाल के कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं को प्रभाव में लिया था । सच में  नेपाली आवश्यकता के बदले कहीं बाहर से आयातित मुद्दों को हम पर थोपा तो नहीं गया है – यह एक गम्भीर सवाल है । इस दृष्टि से तो यह भी  संदेह उत्पन्न हो जाता हैै कि कहीं पहली संविधानसभा यथार्थ से कहीं अधिक महत्वाकांक्षा और भावावेग का भी शिकार तो नहीं हो गई थी –  अगर और उपलब्धियों की बात की जाती है तो मानना ही पडेÞगा कि पहली संविधानसभा के अवसान के साथ यह मुद्दा ही असफल हो चुका था । उस समय ही बुरी तरह से पिट चुके संविधानसभा के मुद्दे के औचित्य पर किसी भी समीक्षक और राजनीतिक दल ने सवाल करना उचित नहीं समdmा । वे यह मानने की भूल कर रहे थे कि जनता  हमेशा केवल मुद्दे के पीछे भागती है । कल जिन मुद्दों के पीछे जनता की भीडÞ दिखती थी, अब उदासीनता है । सच्चाई तो यह थी कि जनता जितने मुद्दे को देखती है, उतना ही मुद्दे की वकालत करनेवालों के आचरण को भी । लम्बे संक्रमणकाल ने अब जनता को राजनीतिक दलों की करतूतों की लम्बी फेहरिस्त भी हाथों में थमा दी थी । जनता ने क्रान्तिकारी नायकी के बल पर दलों के प्रति जो विश्वास का स्तम्भ खडÞा किया था, उसे इन्ही दलों ने  संक्रमणकाल की आडÞ में उखाडÞ फेका ।
फिर बडे तामझाम के साथ दूसरी संविधानसभा का चुनाव कराया गया । दो-दो बार किये गये इन चुनाव में सरकारी आंकडो के मुताबिक तीस अर्ब रुपये खर्च हुए । कुल खर्च तो इससे तकरीवन दुगुनी बताई जाती है । नेपाल जैसे गरीब देश के लिए यह आवश्यकता से कहीं अधिक फिजूलखर्ची है । दूसरे संविधानसभा २०७० के चुनाव में  सभी दलों ने पहले संविधानसभा में उठाए गए अपने मुद्दे को जनता के सामने रखते हुये संविधान बनाने के लिए आवश्यक दो तिहाई मतों की मांग की थी । चुनाव ने जो परिणाम निकाला, वह तो और भी चौंका देनेवाला था । परिवर्तन के दावेदार सियासी ताकतों एनेकपा माओेवादी, मधेशवादी और जातिवादी ताकतों की स्थिति संविधानसभा में बहुत कमजोर हो गई और नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले जैसे लोकतान्त्रिक पर परिवर्तन न चाहने का आरोप झेल रहे दलों की मजबूत स्थिति और राजतन्त्र की वकालत करनेवाली राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टर्ीीेपाल की संविधानसभा के सीटों में अनपेक्षित बढÞत ने सभी को हैरत में डाल दिया था । पहली संविधानसभा दलों के बीच मुद्दों के टकराव के कारण विघटित हो गई थी । यह स्थिति अब भी तकरीबन बरकरार है परन्तु उससे अलग अब वैधानिकता की मात्रा का जटिल विवाद खडा हो गया है । संविधानसभा में कमजोर पर स्वयं को परिवर्तनकारी दावा करनेवाले खेमे का मानना है कि संविधानसभा को जनआन्दोलन के आदेशों के तहत रहना चाहिए जिस के संवाहक वे स्वयं हैं । दूसरी ओर नेपाली कंाग्रेस और एमाले जैसे दलों का सत्ता पक्षीय खेमा, जो स्वयं को अपने मुद्दों को जनता द्वारा नये चुनाव के जरिये अनुमोदित भी मानता है । लम्बे संक्रमण के कारण ऐसी समस्याओं का जन्म हुआ है । अगर इस बार भी संविधानसभा के जरिये  संविधान नहीं बनता है तो निश्चित है देश को पूरी तरह दक्षिणपंथी ताकतों की पकडÞ में जाने से कोई नहीं रोक सकता । दूसरी बात यह है कि दक्षिणपंथ किसी जोर जुुल्म से नहीं वल्कि लोकप्रिय मतों से बहुत आगे होगा । भारत में दक्षिणपंथी राजनीति खेमें से आए मोदी की लोकप्रियता इसका मिसाल है । नेपाल में भी अगर दलों के बीच चलनेवाली मोर्चाें की लडर्Þाई को बन्द नहीं किया तो अब भी परिणाम शून्य होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता ।  एक नेपाली मिडिया को नेपाल के सम्बन्ध के भारतीय जानकार  अशोक मेहता ने हाल ही में कहा कि नेपाल में अभी कोई योग्य नेता नहीं है जो हालातों को संभाल सके । वे आगे कहते है- अभी तक के सभी राजनीतिक संक्रमणकालीन समस्याओं को निपटाने के लिए भारत की मध्यस्थता होती आ रही  है, तो इसबार भी भारत या किसी तीसरे पक्ष को बुला लेना उचित होगा । यह सच है कि विगत में नेपाल की समस्याओं में यही कुछ हुआ है । क्या अब भी नेपाली नेताओं में इतनी समझ नहीं है – वे अपनी समस्याओं को खुद सुलझा पाते हैं या फिर पुरानी लज्जास्पद रास्ता चुनेंगे यह तो समय ही बताएगा ।

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