राजनीति और स्वार्थ के गर्भ से उत्पन्न हुआ है रक्षाबन्धन : कैलाश महतो

कैलाश महतो,परासी, १८ अगस्त |
मैं न तो कोई विद्रोही हूँ न नास्तिक या फिर न किसी विचार या विश्वास का विरोधी । मैंने बस्, सिर्फ यह जानना चाहा है कि जिस पर्व के बारे में हमारे पूर्खों ने बताया, सिखाया और पालन करने को राह दिखाया, उस पर्व के महत्व, उद्देश्य और इतिहास को खुद से देखने की कोशिश करुँ ।

raksha-b
बचपन से ही हम बडे धुमधाम और शौख से इस त्यौहार को मनाते रहे हैं । हमारे बडों ने सिखाया और हम बिना कोई सवाल इस पर्व को मानते रहे हैं । हजारों भाइ बहनें और शुभकामना देने बाले लोगों द्वारा इस त्यौहार के पावन बेलापर शुभकामनायें दी जा रही हैं ।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, किसीको किसी द्वारा उसके कठिनाइयों के समय में उपलब्ध कराये जाने बाला रक्षा बचन–बन्धन को ही रक्षाबन्धन कहा गया है । जरुरी नहीं कि किसी भाइ द्वारा ही अपनी बहन को दी जाने बाली रक्षा या सुरक्षा हो । हमारे पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भाइ बहन का सम्बन्ध तो इतना पवित्र और सुन्दर है कि किसी बन्धन के बिना ही वे एक दुसरे के रक्षा और विकास के लिए अपने जान तक को कुर्बान कर देते हैं । श्रीमान श्रीमति हो, माँ बेटा हो, पिता बेटी हो, बाप बेटा हो, माँ बेटी हो, भाइ भाइ हो, बहन बहन हो या फिर दो सच्चे मित्र या प्रेमी प्रेमिका ही क्यों न हो–एक दुसरे के रक्षा के लिए अपने सारे संसार को त्याग देते है ।
कोई माँ बाप अपने औलादों के लिए, कोई औलाद अपने मातापिता के लिए, कोई भाइ या बहन एक दुसरे के बचाव या रक्षा के लिए कोई शर्त, बन्धन या कसम लेने देने की आवश्यकता नहीं है । क्यूँकि वह पाकृतिक धारा है जो नैसर्गिक रुप में कायम है ।
रक्षाबन्धन के इतिहास के तरफ झाँकने से यह पता चलता है कि इस परम्परा की शुरुवात आज से तकरीबन ६,००० हजार वर्ष पहले हुई जब आर्यनों ने भारत में वर्ष प्रवेश के साथ अपनी Indus Valley Civilization सभ्यता की शुरुवात की ।
पौराणिक कथा अनुसार मृत्यु सम्राट यमराज की बहन यमुना ने अपने भाइ के कलाई पर एक धागे का सूत बाँध दी, जिससे यम ने अमरत्व प्राप्त की थी ।
स्वर्ग के राजा इन्द्र ने व्रित्रा नाम के असुर द्वारा अपना राज्य हार जाने के बाद उनकी पत्नी सची ने उनके कलाई पर एक रक्षा धागा बाँधते हुए यह विश्वास दिलायी थी कि अगले देवता और असुर के लडाई में उनकी ही जित होगी ।
मध्यकालिन इतिहास के अनुसार चितोड की विधवा महारानी कर्णावती को जब यह लगने लगा कि गुजरात के सम्राट सुल्तान उनके राज्य चितोड पर आक्रमण करने के तैयारी में हैं तो रानी कर्णावती ने सुल्तान हुमायू को एक राखी भेजी, जिसके कारण सम्राट हुमायू ने चितोड आक्रमण को छोड वापस लौट गया ।
३०० ई.प में अलेक्जेण्डर ने जब भारत पर आक्रमण किया तो पौरु के राजा से उनकी सामना हुई जिसमें उनकी पसीना छुट गयी । वे पौरु के कारण भारत पर पूनः आक्रमण करने से वे घबरा रहे थे । उनकी हालत देख अलेक्जेण्डर की पत्नी ने राजा पुरु के पास राखी लेकर पहँुची । क्यूँकि उन्हें ज्ञात था कि किसी आर्य के कलाई पर राखी बाँधने के बाद वे उस राखी बाँधने बाली महिला को बहन मानकर उनकी रक्षा हर हाल में करेंगे । राजा पुरु ने उनकी राखी को स्वीकार किया जिससे सम्राट अलेक्जेण्डर को भारत प्रवेश का रास्ता मिला ।
महाभारत के अनुसार भगवान् कृष्ण तथा चेदीराज शिशुपाल के साथ हुए युद्ध में कृष्ण के उंगली बुरी तरह कट जाती है, जिससे निकल रहे लहु को रोकने के लिए द्रौपदी ने अपनी सारी की एक भाग को फाडकर उनकी उंगली को बाँधती है । कृष्ण के प्रति जगी द्रौपदी की प्यार को महशुश कर उन्होंने द्रौपदी के हरेक कष्ट में रक्षा करने का वचन देते हंै । और जब शकुनी के पासो जाल में द्रौपदी की चीर हरण होती है तो अपने वचन अनुसार कृष्ण उनकी रक्षा करते है ।
भगवान् विष्णु के परमभत रहे राक्षसराज बाली के जीवन एवं उनके दरबार रक्षा हेतु भगवान् विष्णु विकन्दम छोडकर बाली के दरबार के तरफ प्रस्थान करते हैं । मगर भगवान् श्री विष्णु की अर्धांङ्गिनी लक्ष्मी विष्णु के विकन्दम छोडने के पक्ष में न होने के कारण वे ब्राम्हिणी के भेष में राजा बाली के दरबार में शरण लेने के कुछ दिन बाद श्रावण पूर्णिमा के दिन ही बाली के कलाई पर राखी बाँधते हुए अपना सही परिचय देती हैं । उनके परिचय एवं अपने उपर प्रदर्शित पे्रम के कारण उन्हें अपनी बहन स्वीकार राजा बाली भगवान् विष्णु से अपने लक्ष्मी के साथ विकन्दम लौट जाने को प्रार्थना करते हैं ।
उपर के सारे घटनाओं से यह प्रमाणित होता है कि राखी बाँधने बाली बहने कोई भी अपने सगे भाइयों को राखी नहीं बाँधी है । भाइ बहन का प्यार तो ईश्वर द्वारा बनाया हुआ एक वह तोहफा है जो दोनों के निश्छल भावना से ओतप्रोत होती है । भाइ बहन के बीच के प्यार और जिम्मेबारी तो करोडों बन्धनों से भी मजबूत होती है जिसका भौतिक कोई बन्धन नहीं हो सकता ।
उपर के इन कहानियों से प्रतित होता है कि दो अन्जाने पुरुष और महिला किसी विशेष परिस्थितिवश एक दूसरे को भाइ और बहन मान लेते हैं या बना लेते हैं । अन्जाने लोगों के बीच बनने बाला भाइ बहन के प्यार ने भी अलौकिक दान, त्याग, सुरक्षा और समर्पण को दिखाया है । सामाजिक रुप लेने के बाद इस पर्व ने एक सुनहरा अवसर तो जरुर निर्माण किया है जिसके वजह से कोशों दुर रहे सगे एवं धर्म भाइयों–बहनोेंं को एक जगह लाने या सन्देश लेने देने का शुभकार्य का माहोल निर्माण करता है ।
संसार के सारे भाइबहनों को इस पावन पर्व के अवसर पर ढेर सारी हार्दिक बधाईयाँ । मेरी सारी बहनों को मेरे तरफ से ओजस्व प्यार ।

Loading...